मोतिहारी- चंपारण की ऐतिहासिक धरती मोतिहारी में एक समुदाय की आवाज़ गूंजती है, जो अपनी ही विरासत से कट गया है। निषाद समुदाय, जिसे जल संस्कृति का असली वाहक माना जाता था, आज अपने ही तालाबों और नदियों में पराया हो चुका है। ठेका प्रणाली की मार ने न सिर्फ उनकी रोज़ी-रोटी छीनी है, बल्कि पीढ़ियों के गौरव और आत्मसम्मान को भी तोड़ दिया है। आज उनकी नावें किनारे सड़ रही हैं और उम्मीदों के जाल खाली हैं। बिहार चुनाव की आहट के बीच सवाल यह है कि क्या इस बार कोई उनके इस दर्द को सुनने आएगा, या फिर यह समुदाय वादों के जाल में एक बार फिर उलझकर रह जाएगा?
मोतिहारी के मल्लाह टोले के 70 वर्षीय गोपाल अपनी टूटी उम्मीदों और संघर्षों की दास्तान द मूकनायक प्रतिनिधि को सुनाते हुए कहते हैं, “हमारा पुश्तैनी धंधा मछली पकड़ना रहा है। लेकिन अब नदी-तालाबों पर हमारा हक नहीं। सरकार समितियों और बड़े लोगों को ठेका दे देती है। गरीब मल्लाह मजदूरी करने पर मजबूर हो जाता है।” गोपाल की यह बात अकेले उनकी नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की पीड़ा है। पीढ़ियों से नाव और जाल इनके जीवन का सहारा रहे हैं, लेकिन अब वही नाव किनारे पड़ी सड़ चुकी है।
कभी यही नावें इन परिवारों के लिए आजीविका का साधन थीं। तालाब और नदियों में मछली पकड़कर पेट पालने वाली मल्लाह समुदाय की जिंदगी अब ठेका प्रणाली की भेंट चढ़ चुकी है। जिन तालाबों पर इनकी परंपरागत निर्भरता थी, वहाँ आज समितियों और बड़े कारोबारियों का कब्जा है। मल्लाहों के हाथ से काम छिन गया और वे दूसरों के यहाँ मजदूरी करने को विवश हो गए। इस बदलाव ने न सिर्फ उनकी रोज़ी-रोटी छीनी बल्कि उनके आत्मसम्मान और पीढ़ियों से जुड़े सांस्कृतिक धरोहर को भी कमजोर कर दिया है।
टोले में जाने कितने ही लोग हैं, जिनकी नाव धूप-पानी से जर्जर होकर अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी है। इन नावों पर कभी बच्चों की हंसी, घर की रौनक और पेट भरने की उम्मीद टिकी रहती थी। मगर अब ठेका प्रणाली ने इस पूरे समुदाय की परंपरागत जीविका को तोड़ दिया है। मल्लाहों का कहना है कि सरकार योजनाएं तो घोषित करती है, लेकिन असल में वे उनके जीवन तक नहीं पहुँच पातीं। उनका दर्द साफ है, नदी-तालाबों से दूर कर दिए जाने के बाद उनके पास सिर्फ संघर्ष, गरीबी और बेबसी ही बची है।
गाँव और कस्बे के तालाब, झील और यहाँ तक कि नदियाँ भी अब स्थानीय समितियों या बड़े उद्योगपतियों को पट्टे पर दे दी जाती हैं। ये ठेकेदार अपने मजदूर रखते हैं और मछली उत्पादन को व्यवसाय बना देते हैं। निषाद समुदाय के असली मछुआरे, जिनकी रोज़ी-रोटी इसी जल पर निर्भर थी, वे खुद पानी के हक से वंचित होकर दिहाड़ी मजदूर बन जाते हैं।
टोले की महिलाएँ बताती हैं कि पहले वे घर-परिवार के साथ छोटी नाव से मछली पकड़ने से लेकर बेचने तक में मदद करती थीं। बच्चे जाल डालना सीखते थे और पुरुष बाजार में बेचने जाते थे। इससे घर का खर्च चलता था। पर अब जब तालाब ही ठेकेदार के कब्जे में है, तो उन्हें बाहर से खरीदी मछली बेचनी पड़ती है या फिर मजदूरी करनी पड़ती है।
मल्लाह टोले की 60 वर्षीय बच्ची देवी द मूकनायक से बातचीत में अपनी पीड़ा साझा करती हैं। वे कहती हैं, “हमारा पुश्तैनी काम तो छिन चुका है, और अब न घर है, न आजीविका के लिए कोई काम। सिर्फ मजदूरी से ही परिवार का पेट बड़ी मुश्किल से पल पा रहा है।” बच्ची देवी की यह व्यथा उस पूरे समुदाय की हकीकत है, जिसकी पीढ़ियां कभी नाव और जाल पर निर्भर रहती थीं, लेकिन अब उनका जीवन संघर्ष और बेबसी के सहारे कट रहा है।
बच्ची देवी बताती हैं कि उन्होंने शासकीय जमीन पर एक छोटी-सी झोपड़ी बना रखी है। लेकिन उनकी यह झोपड़ी भी सुरक्षित नहीं है। “हर दो-चार महीनों में प्रशासन के लोग आते हैं और कहते हैं कि यहाँ से चले जाओ। अब बताइए, हम कहाँ जाएं? हमारे पास तो न कोई जमीन है, न कोई स्थायी मकान। बस इसी झोपड़ी में गुज़ारा कर रहे हैं,” वे कहती हैं। उनके शब्दों से साफ झलकता है कि छीन लिए गए पुश्तैनी काम के बाद उनके पास न तो स्थायी आवास का सहारा है और न ही भविष्य की कोई गारंटी।
सरकारी योजनाओं के बारे में बात करते हुए बच्ची देवी कहती हैं कि उन्हें सिर्फ राशन मिल पाता है। इसके अलावा किसी भी योजना का लाभ उनके परिवार तक नहीं पहुँच पाया। “सरकार कहती है गरीबों के लिए योजनाएं हैं, लेकिन हमें तो सिर्फ राशन मिलता है। बाकी कोई मदद नहीं मिलती,” बच्ची देवी का कहना है कि अगर सरकार सच में गरीब और वंचित समुदायों के लिए कुछ करना चाहती है तो उसे रोजगार और आवास की गारंटी देनी चाहिए, वरना उनके जैसे परिवार दर-दर भटकने को मजबूर रहेंगे।
टोला की गलियों में चलते हुए यह साफ दिखाई देता है कि यहाँ शिक्षा और स्वास्थ्य सबसे बड़ा संकट बने हुए हैं। बांस और त्रिपाल से बनी झोपड़ियां न केवल इनके रोजमर्रा के जीवन को कठिन बनाती हैं बल्कि बच्चों के लिए पढ़ाई और बुज़ुर्गों के लिए इलाज जैसी बुनियादी ज़रूरतों तक पहुँचना भी मुश्किल कर देती हैं।
टोले के बच्चे सरकारी स्कूलों में दाखिला तो लेते हैं, लेकिन गरीबी, संसाधनों की कमी के कारण उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है। कई बच्चे पढ़ाई छोड़कर मछली बेचने, खेतिहर मज़दूरी या ईंट-भट्टों पर काम करने के लिए मजबूर हो जाते हैं ताकि परिवार का खर्चा चल सके। लड़कियों के मामले में स्थिति और भी गंभीर है, क्योंकि अक्सर उन्हें छोटी उम्र में घरेलू कामों में लगा दिया जाता है या विवाह करवा दिया जाता है।
गरीबी के कारण लोग निजी अस्पतालों या दवाओं का खर्च नहीं उठा पाते और कई बार बिना इलाज कराए ही बीमारियों को झेलते रहते हैं। स्वच्छ पेयजल और साफ़-सफाई की कमी के कारण यहाँ बच्चों में कुपोषण, खून की कमी (एनीमिया) और त्वचा रोग आम हैं। गर्भवती महिलाओं और बुज़ुर्गों की देखभाल के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव और भी चिंता का विषय है।
मल्लाह टोला का यह सच दिखाता है कि शिक्षा और स्वास्थ्य से वंचित रहकर यह समुदाय लगातार गरीबी और हाशिए पर धकेले जाने के चक्र में फँसा हुआ है।
यहां के लोगों के लिए आजीविका का सबसे बड़ा सहारा अब कृषि मजदूरी और ईंट-भट्टों पर काम ही रह गया है। यहाँ के पुरुष अक्सर शहरों में जाकर दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, जहां उन्हें रोज़गार तो मिलता है लेकिन न तो काम स्थायी होता है और न ही मजदूरी इतनी कि घर का खर्चा आराम से चल सके। ईंट-भट्टों पर काम करने वालों की हालत और भी दयनीय है, क्योंकि यह काम मौसमी होता है और मजदूरी भी बिचौलियों के हाथ में बंधी होती है।
महिलाओं की स्थिति और भी कठिन है। टोले की महिलाएँ आसपास के शहरी क्षेत्रों में घरों में काम करती हैं, झाड़ू-पोंछा और बर्तन मांझने से लेकर बच्चों की देखभाल तक के छोटे-मोटे काम उन्हें करने पड़ते हैं। कई महिलाएँ सब्ज़ी बेचकर या छोटी-मोटी ठेलियों से कमाई करती हैं। इसके बावजूद घर का गुज़ारा बेहद मुश्किल से हो पाता है।
बेरोज़गारी और गरीबी से परेशान बड़ी संख्या में युवक पंजाब, दिल्ली, कर्नाटक और गुजरात जैसे राज्यों में पलायन कर चुके हैं। ये युवक वहाँ दिहाड़ी मजदूरी, फैक्टरियों में काम या निर्माण स्थलों पर मज़दूर की भूमिका निभाते हैं।
मल्लाह टोला की गुड़िया देवी, द मूकनायक से अपनी व्यथा बताते हुए कहती हैं कि टोले की गलियों में हर तरफ गंदगी फैली रहती है। बरसात का मौसम आते ही उनकी मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं। बारिश होने पर पानी सीधे घरों के भीतर घुस जाता है। “रात-रात भर जागकर पानी निकालना पड़ता है, वरना घर का सारा सामान भीग जाता है। बांस और त्रिपाल से बनी झोपड़ियों में रहना वैसे ही कठिन है, ऊपर से गंदगी और पानी भरने की समस्या हमें चैन की नींद तक नहीं लेने देती।”
जब हमने उनसे चुनाव को लेकर सवाल किया तो उन्होंने बेबाकी से जवाब दिया कि नेता सिर्फ वोट मांगने के समय ही टोले में आते हैं। “चुनाव खत्म होते ही वे पाँच साल के लिए गायब हो जाते हैं। कोई हमारी सुध लेने वाला नहीं है। चाहे बीमारी हो या रोज़गार की समस्या, हमें अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है। सरकार को हमारी कोई परवाह ही नहीं है,” गुड़िया देवी ने नाराज़गी जताई। उनकी बातों से यह साफ झलकता है कि समुदाय के भीतर व्यवस्था और राजनीति के प्रति गहरा अविश्वास बैठ चुका है।
गुड़िया देवी आगे बताती हैं कि टोले से बड़ी संख्या में लोग रोज़गार के लिए बाहर पलायन कर रहे हैं, क्योंकि स्थानीय स्तर पर काम के अवसर लगभग न के बराबर हैं। उन्होंने कहा,- “यहाँ मजदूरी इतनी कम है कि घर चलाना मुश्किल हो जाता है। मजबूरी में युवा पंजाब, दिल्ली और गुजरात जैसे राज्यों में जाते हैं। कई लोग ईंट-भट्टों और खेतों में काम करके किसी तरह पेट पाल रहे हैं।
बिहार में मल्लाह-निषाद समुदाय लगभग पूरे राज्य में फैला हुआ है, लेकिन इनकी सबसे अधिक आबादी गंगा, गंडक, बागमती, कोसी और सोन जैसी नदियों के किनारे बसे जिलों में है। पटना, सारण, वैशाली, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, सहरसा, सुपौल, खगड़िया, भागलपुर, कटिहार, पूर्णिया और मुंगेर जैसे जिले इनके प्रमुख केंद्र माने जाते हैं। मल्लाह-निषाद परंपरागत रूप से नाव चलाने, मछली पकड़ने और जल परिवहन से जुड़े रहे हैं, इसलिए इनकी बसावट प्रायः नदियों और तालाबों के किनारे मिलती है। जनगणना में इस समुदाय की अलग से गिनती नहीं होती, लेकिन सामाजिक अध्ययन और जातिगत सर्वेक्षणों के अनुसार बिहार में इनकी आबादी लगभग 8 से 10 प्रतिशत के आसपास बताई जाती है, जो इन्हें राज्य की बड़ी पिछड़ी जातियों में शामिल करती है।
बिहार सरकार ने मछुआरा समुदाय और मल्लाह-निषादों के लिए कई योजनाएँ शुरू की हैं, लेकिन मल्लाह टोला में इन योजनाओं का असर दिखाई नहीं देता।
- जल-जीवन-हरियाली योजना के अंतर्गत तालाबों के जीर्णोद्धार की बात कही जाती है।
- निषाद विकास योजना के तहत नाव, जाल, और मछली पालन के लिए ऋण व अनुदान की घोषणा हुई।
- अति पिछड़ा वर्ग छात्रवृत्ति और कुशल युवा कार्यक्रम से शिक्षा व रोजगार देने की बात है। मगर इन योजनाओं का व्यापक असर नहीं दिखाई देता!
- जलाशय पट्टा नीति में यह प्रावधान है कि स्थानीय मछुआरों को प्राथमिकता दी जाएगी। लेकिन यहाँ के ज्यादातर गरीब मल्लाह समिति में शामिल नहीं है।
बिहार में निषाद समुदाय को आधिकारिक रूप से अति पिछड़ा वर्ग (EBC) की श्रेणी में रखा गया है, लेकिन सामाजिक स्तर पर यह समुदाय अब भी उपेक्षा और भेदभाव का शिकार है। शिक्षा और संसाधनों की कमी ने इन्हें राजनीति और व्यवस्था दोनों से दूर कर दिया है। नतीजतन, यह समुदाय विकास की मुख्यधारा से जुड़ने के बजाय लगातार हाशिये पर धकेला जा रहा है।
निषाद समुदाय को जल संस्कृति का असली वाहक माना जाता है। नदियों, तालाबों और जलस्रोतों से इनका गहरा रिश्ता रहा है। पीढ़ियों से यह लोग मछली पकड़ने, नाव चलाने और जल-संसाधनों पर आधारित जीवन यापन करते आए हैं। लेकिन ठेका प्रणाली लागू होने के बाद बड़े ठेकेदारों और समितियों ने इनके परंपरागत अधिकारों पर कब्ज़ा कर लिया। इससे उनकी पीढ़ियों को मजबूरन मजदूरी और पलायन की ओर धकेल दिया गया।
सरकारी योजनाओं का भी इस समुदाय को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया। योजनाएँ कागज़ों पर तो बड़ी-बड़ी घोषणाओं के साथ आती हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर निषाद समाज तक उनका असर बहुत कम पहुँचता है। चाहे शिक्षा हो, रोज़गार हो या स्वास्थ्य सुविधाएँ, हर जगह निषाद समुदाय को संघर्ष करना पड़ता है। यही कारण है कि आज यह समाज परंपरागत पहचान खोते हुए सिर्फ़ मेहनत-मजदूरी करने वाले समुदाय के रूप में देखा जाने लगा है।
बिहार में मल्लाह-निषाद समुदाय राजनीतिक रूप से एक मजबूत वोटबैंक माना जाता है। लगभग 8–10 प्रतिशत आबादी के साथ यह समुदाय कई विधानसभा और लोकसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है, खासकर गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे बसे जिलों में। इस समुदाय का प्रभाव मुख्य रूप से छोटे किसान, मजदूर और नदी आधारित आजीविका से जुड़ा है, लेकिन राजनीति में इन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है। राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह अक्सर इस समुदाय के सवाल उठाते रहे हैं, जबकि बिहार की राजनीति में मुकेश सहनी (विकासशील इंसान पार्टी – वीआईपी) को मल्लाह-निषाद समुदाय का बड़ा चेहरा माना जाता है, जिन्होंने “सन ऑफ मल्लाह” का नारा देकर राजनीतिक पहचान बनाई। इसके अलावा राजेंद्र निषाद और कई स्थानीय स्तर के नेता विभिन्न पार्टियों से जुड़े हैं। महागठबंधन और एनडीए दोनों ही इस समुदाय को साधने की कोशिश करते हैं, क्योंकि कई सीटों पर इनकी एकजुटता हार-जीत तय करने की क्षमता रखती है।
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