TM Ground Report: बांस की टोकरी से बुना जीवन, मोतिहारी की डोम बस्ती में टूटी उम्मीदें, छुआछूत-गरीबी में कट रहा जीवन!

बिहार में डोम समुदाय महादलित वर्ग के अंतर्गत आता है और इनकी आबादी राज्य की कुल आबादी में यह समुदाय 0.2 प्रतिशत से भी कम हिस्सेदारी रखता है। यह समुदाय राज्य के शहरी और ग्रामीण दोनों हिस्सों में फैला हुआ है। पारंपरिक रूप से ये बांस का काम, टोकरी-डालियां बनाना, शवदाह और सफाई जैसे पेशों से जुड़े रहे हैं।
TM Ground Report: बांस की टोकरी से बुना जीवन, मोतिहारी की डोम बस्ती में टूटी उम्मीदें, छुआछूत-गरीबी में कट रहा जीवन!
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मोतिहारी। शहर की एक तंग गली में जैसे ही कदम रखते हैं, सामने झोपड़ियों और तिरपाल से ढके घरों की कतारें नज़र आती हैं। यहीं बसी है डोम बस्ती, एक ऐसा समाज, जिसकी पहचान बांस और उससे बने उत्पादों से है। पीढ़ियों से यही उनका पेशा रहा है। यहां कोई बांस छील रहा है, या किसी के हाथ में अधूरी टोकरी हैं, लेकिन इन टोकरी जैसी ही उनकी ज़िंदगी भी है, कहीं से टूटी हुई, कहीं से अधूरी, और रोज़मर्रा की मुश्किलों से भरी।

बस्ती के बाहर के स्कूलों में पढ़ने जाने वाले बच्चे बताते हैं कि उन्हें आज भी अलग लाइन (अन्य जाति के बच्चों से दूर) में बैठाया जाता है। द मूकनायक प्रतिनिधि से बातचीत करते एक 11 वर्षीय छात्रा ने कहा, “मैडम कहती हैं तुम लोग अलग बैठो, तुम डोम हो..।” ये शब्द सुनकर बस्ती के बड़े-बुजुर्ग चुप हो जाते हैं, क्योंकि यह वही पुराना दर्द है जिसे वे पीढ़ियों से झेलते आ रहे हैं। सामाजिक न्याय की बातें कागज़ों में होती हैं, लेकिन इन बच्चों तक उसका कोई असर नहीं पहुंचा है।

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जातिगत भेदभाव के कारण ब्च्चों को अलग लाइन में बैठाया जाता है। द मूकनायक प्रतिनिधि से बातचीत करते एक 11 वर्षीय छात्रा ने कहा, “मैडम कहती हैं तुम लोग अलग बैठो, तुम डोम हो..।”फोटो- अंकित पचौरी, द मूकनायक

बांस का कारोबार अब रोजगार का संकट

डोम समाज की पहचान बांस के कारोबार से रही है। शादियों से लेकर त्योहारों तक, बांस की डालियां, टोकरी और सूप हर जगह ज़रूरी माने जाते थे। लेकिन प्लास्टिक और मशीन से बने सामानों ने उनका बाज़ार छीन लिया।

बस्ती की कच्ची झोपड़ी के बाहर बैठी राजकुमारी अपने हाथों में टोकरी बुन रहीं थीं, वह द मूकनायक से कहती हैं, “कुछ साल पहले हफ़्ते में 500-600 रुपये आसानी से निकल जाते थे, अब तो एक दिन में 50-60 रुपये भी नहीं बन पाते।” उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ़ दिखाई देती हैं। वह बताती हैं कि पहले गांव-शहरों में शादियों से लेकर रोज़मर्रा की ज़रूरत तक हर जगह बांस के सामान की मांग रहती थी, लेकिन अब यह काम धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है।

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घर के बाहर बैठी टोकरी बुनती राजकुमारीफोटो- अंकित पचौरी, द मूकनायक

राजकुमारी आगे कहती हैं, “सुबह से शाम तक बांस चीरते-चीरते हाथ छिल जाते हैं, खून निकल आता है। फिर भी मेहनत का कोई मोल नहीं है। पहले लोग हमारी बनाई हुई डलियां और टोकरियां खरीदते समय तारीफ़ करते थे, अब वही लोग सस्ते प्लास्टिक या फैक्ट्री में बने सामान उठा लेते हैं। हमारा पसीना, हमारी कला सब बेकार हो गई है।” उनकी बातों से साफ़ झलकता है कि यह सिर्फ़ रोज़गार का संकट नहीं, बल्कि उनकी पीढ़ियों से चली आ रही पहचान के मिटने का दर्द भी है।

राजकुमारी आगे कहतीं हैं, “हालात दिन-ब-दिन खराब होते जा रहे हैं। पेट भरना भी मुश्किल है, बच्चों की पढ़ाई तो दूर की बात है। अगर हमारी मेहनत को सही दाम मिलता, तो शायद हम भी सम्मान से जी सकते। लेकिन अब लगता है कि जैसे हमें बस छोड़ दिया गया है। सरकारें बस वादे करती हैं, लेकिन हमारे हिस्से में सिर्फ़ ग़रीबी और छुआछूत आता है।”

यहां के लोग मानते हैं कि बांस का काम धीरे-धीरे खत्म हो रहा है, और इसके साथ ही उनका रोज़गार भी। बहुत से लोग अब सफाई कर्मचारी के रूप में नगर निगम में काम करते हैं, लेकिन वहां भी उनकी मेहनत का उचित मान नहीं मिलता। उसने बताया, “महीनों तक वेतन अटका रहता है, और मिलता भी है तो इतना कम कि परिवार का गुज़ारा मुश्किल है,”

साइकिल पर झाड़ू बांधे धूप में गुजर रहे एक सफाईकर्मी से हमने बात की। उन्होंने अपना नाम रंजन बताया। माथे पर पसीना और चेहरे पर थकान थी। रंजन ने कहा, “सुबह चार बजे से काम शुरू कर देते हैं। शहर की गंदगी साफ करनी पड़ती है, लेकिन महीने का वेतन सिर्फ 13 हजार मिलता है, इतने कम वेतन में परिवार का गुज़ारा मुश्किल है। कई बार तो महीनों तक तनख्वाह भी अटक जाती है।”

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सफाईकर्मी रंजन फोटो- अंकित पचौरी, द मूकनायक

उन्होंने आगे कहा, “हम शहर को साफ रखते हैं, लेकिन लोग हमें गंदा कहते हैं। सम्मान तो दूर, हमें नफरत की नज़र से देखा जाता है। बच्चे पूछते हैं कि पापा, लोग हमें नीचा क्यों समझते हैं? लेकिन मेरे पास जवाब नहीं होता। बस यही सोचता हूं कि शायद कभी हालात बदलेंगे।”

गरीबी के साथ अशिक्षा की जकड़न

झोपड़ियों में रहने वाले इस समाज के पास रोज़ दो वक्त की रोटी जुटाना ही बड़ी चुनौती है। जब परिवार का पेट भरना ही कठिन हो, तो बच्चों की पढ़ाई कहां से संभव हो पाएगी। हालांकि कुछ बच्चे स्कूल तक पहुंचते हैं, लेकिन भेदभाव और ग़रीबी दोनों मिलकर उनकी पढ़ाई अधूरी ही छोड़ देते हैं।

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मोतिहारी की डोम बस्ती फ़ोटो- अंकित पचौरी, द मूकनायक

एक महिला, सावित्री देवी बताती हैं, “हम चाहकर भी बच्चों को किताब-कॉपी नहीं दिला पाते। कई बार बच्चे स्कूल छोड़कर बांस चीरने और डालियां बनाने में लग जाते हैं।”

बदहाल स्वास्थ्य सुविधाएं

बस्ती में स्वास्थ्य की स्थिति बेहद चिंताजनक है। कोई छोटा बच्चा बीमार पड़ जाए तो परिवार के लिए मुशीबत बन पड़ती है। सरकारी अस्पताल अव्यवस्थाएं किसी से नहीं छुपी है, और जब बात गरीब और अशिक्षित वर्ग की हो तो हालात और भी नाजुक हो जाते हैं। लेकिन वहां भी अनदेखी झेलनी पड़ती है। बस्ती की एक महिला ने बताया “हमारे लोग अगर डॉक्टर के पास जाते हैं, तो कह देते हैं सरकारी दवा ले लो, ज्यादा ध्यान नहीं देते,”

खराब खान-पान और गंदगी के बीच पलने वाले बच्चों का स्वास्थ्य हमेशा संकट में रहता है। कई घरों में कुपोषण साफ नज़र आता है। लेकिन मजबूरी में ज़िंदगी बिता रहे डोम समुदाय के लोग इसे झेल रहे हैं।

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डोम बस्ती में हरतरफ बसरी गंदगीद मूकनायक

झोपड़ी तिरपाल में कट रहा जीवन

बस्ती में ज्यादातर मकान झोपड़ी नुमा है, कुछ अन्य जाति समाजों के घर है लेकिन वह पक्के मकान हैं। डोम समुदाय के ज्यादातर परिवार तिरपाल और झोपड़ियों में रहते हैं। बरसात आते ही ये घर टपकने लगते हैं।

बस्ती की सपना देवी द मूकनायक से बात करते हुए अपने घर की ओर इशारा करती हैं। उनके घर की दीवारें टीन, और बांस टाट-तिरपाल से ढकी हुई हैं। वह बताती हैं, “हमारा घर कच्चा और झोपड़ी का है। पानी बरसता है तो लगता है जैसे हम बाहर ही बैठे हैं।” बरसात का मौसम उनके लिए सबसे बड़ा डर है, क्योंकि छत से टपकते पानी से घर का आधा समान भीग जाता है।

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बारिश में टपकती है छत फ़ोटो- अंकित पचौरी, द मूकनायक

सपना आगे कहती हैं, “छोटे-छोटे बच्चे भीग जाते हैं, कपड़े और बिस्तर सब गीले हो जाते हैं। कई बार तो बीमारी फैल जाती है। रातभर नींद नहीं आती, बस यही सोचते रहते हैं कि कब बरसात खत्म होगी।” उनकी बातों से झलकता है कि गरीबी सिर्फ़ भूख तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सिर पर सुरक्षित छत का न होना भी उतना ही बड़ा दर्द है।

सपना देवी का कहना है कि सरकार ने अब तक कई योजनाओं के नाम पर घर बनाने का वादा किया, लेकिन बस्ती के हालात जस के तस हैं। “नेता आते हैं, लिस्ट बनाते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और फिर कभी लौटकर नहीं आते। हम लोग आज भी तिरपाल और झोपड़ी में जी रहे हैं। शायद हमारी तकलीफ़ किसी को दिखाई ही नहीं देती।”

मूलभूत सुविधाओं से वंचित

डोम बस्ती की सबसे बड़ी समस्या बुनियादी सुविधाओं की कमी है। यहां बिजली-पानी की व्यवस्था सिर्फ़ नाम की है। कई बार हैंडपंप खराब हो जाते हैं तो लोग मजबूरी में गंदे तालाब से पानी भरकर पीते हैं। गंदे पानी से बीमारियां फैलती हैं, लेकिन विकल्प न होने के कारण पूरे परिवार को उसी पर निर्भर रहना पड़ता है।

झोपड़ी के बाहर बना चूल्हा
झोपड़ी के बाहर बना चूल्हाद मूकनायक

बस्ती में बच्चों के खेलने के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं है। संकरी गलियों और गंदगी भरे रास्तों के बीच ही वे बड़े होते है। हालात ऐसे हैं कि महिलाएं आज भी खुले में शौच जाने को मजबूर हैं, जिससे उनकी सुरक्षा और सेहत दोनों पर खतरा मंडराता रहता है। यह सब देखकर साफ़ लगता है कि बस्ती अब भी विकास और इंसानी गरिमा से बहुत दूर है।

सरकार से नाराज़गी!

बस्ती के लोगों का कहना है कि हर सरकार चुनावों के समय यहां आती है, वादे करती है कि उन्हें घर मिलेगा, रोज़गार मिलेगा, बस्ती विकसित होगी। लेकिन चुनाव ख़त्म होते ही नेता भी ग़ायब हो जाते हैं।

बस्ती की महिला सविता देवी द मूकनायक से बात करते हुए कहती हैं, “हम तो जैसे वोट देने के लिए ही बने हैं। उसके बाद कोई हमारी सुध लेने नहीं आता।”

वह बताती हैं कि चुनाव के दिनों में नेता गली-गली घूमते हैं, झोपड़ियों के सामने कुर्सी डालकर वादों की झड़ी लगा देते हैं, पक्के घर, साफ पानी, नौकरी और बेहतर ज़िंदगी का भरोसा देते हैं। लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होता है, सब कुछ हवा हो जाता है। न घर मिलता है, न रोज़गार, न ही कोई सरकारी योजना का सही लाभ। “नेता सिर्फ़ हमारी ग़रीबी और मजबूरी पर राजनीति करते हैं,” सविता की बातों से साफ़ झलकता है कि विश्वास अब पूरी तरह टूट चुका है।

इसी बातचीत के दौरान बस्ती के एक बुज़ुर्ग महिला भी पास बैठे थीं, उन्होंने ग़ुस्से में कहा, “नेताओं के लिए हम बस एक नंबर हैं, वोट की गिनती। हमारे बच्चे स्कूल में अलग बिठाए जाते हैं, हम गंदगी में जीते हैं, बीमार पड़ने पर इलाज तक नहीं मिलता। सरकार और नेता दोनों जानते हैं, लेकिन किसी को फर्क नहीं पड़ता। जैसे हम इंसान ही नहीं हैं।”

उनके चेहरे पर नाराज़गी के साथ-साथ गहरी बेबसी भी दिखाई देती थी। यह साफ़ करता है कि डोम बस्ती का दर्द सिर्फ़ ग़रीबी का नहीं, बल्कि उस उपेक्षा का है जो उन्हें बार-बार यह एहसास दिलाती है कि इस लोकतंत्र में वे सिर्फ़ ‘वोट देने वाले लोग’ हैं, नागरिक नहीं!

बिहार सरकार के राज्य महादलित आयोग के पूर्व सदस्य तूफान राम भी डोम समाज से आते हैं। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा समाज के उत्थान के लिए संघर्ष में लगाया और लगातार आवाज़ उठाते रहे।

तूफान राम ने द मूकनायक से कहा कि डोम समुदाय की बदहाल स्थिति सबके सामने है। जातिव्यवस्था, छुआछूत और हीनभावना ने इन्हें बराबरी से जीने नहीं दिया। शिक्षा, रोज़गार और सम्मान की कमी सबसे बड़ी चुनौतियां हैं।

उन्होंने कहा, “हमारा संघर्ष अभी जारी है। जब तक डोम समाज को समान अवसर और सामाजिक-आर्थिक न्याय नहीं मिलेगा, तब तक यह आंदोलन थमने वाला नहीं है।”

सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से दूर

बिहार में डोम समुदाय महादलित वर्ग के अंतर्गत आता है और इनकी आबादी राज्य की कुल आबादी में यह समुदाय 0.2 प्रतिशत से भी कम हिस्सेदारी रखता है। यह समुदाय राज्य के शहरी और ग्रामीण दोनों हिस्सों में फैला हुआ है। पारंपरिक रूप से ये बांस का काम, टोकरी-डालियां बनाना, शवदाह और सफाई जैसे पेशों से जुड़े रहे हैं। ग़रीबी, अशिक्षा और छुआछूत ने इन्हें मुख्यधारा से दूर रखा है। आज भी अधिकांश परिवार झोपड़ियों और तिरपाल के घरों में रहते हैं और बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।

सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर डोम समुदाय की आवाज़ बेहद कमजोर रही है। महादलित वर्ग में शामिल होने के बावजूद इन्हें योजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पाया। राजनीति में भी इस समाज का प्रतिनिधित्व नगण्य है, हालांकि हाल के वर्षों में कुछ सामाजिक कार्यकर्ता और नेता इनके अधिकारों और सम्मान के लिए आवाज़ उठा रहे हैं। फिर भी वास्तविक बराबरी और न्याय की राह अभी लंबी और कठिन दिखाई देती है।

सामाजिक न्याय कहाँ?

संविधान की किताब में बराबरी, सम्मान और न्याय की बात लिखी है, लेकिन डोम समाज कहता है कि उन्होंने इन्हें कभी महसूस नहीं किया। बच्चों से लेकर बुज़ुर्ग तक, हर कोई अपने हिस्से के भेदभाव को ढो रहा है। समाज से अलग-थलग, रोज़गार से वंचित और सरकार से ठगा हुआ यह समाज अभी भी उसी छुआछूत की जंजीरों में बंधा है, जिसे खत्म करने का दावा सालों पहले किया गया था।

मोतिहारी की डोम बस्ती की कहानी सिर्फ़ बांस की टोकरी और डालियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक और आर्थिक अन्याय की तस्वीर है जिसे देश के सबसे पिछड़े तबके आज भी झेल रहे हैं।

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