
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद मतदाता सूची का जो पहला ड्राफ्ट सामने आया है, उसके आंकड़े बेहद दिलचस्प हैं। इन आंकड़ों से पता चलता है कि राज्य के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में ठीक वैसी ही गिरावट दर्ज की गई है, जैसी राज्य के अन्य हिस्सों में देखने को मिली है। यानी, नाम कटने का अनुपात हर जगह एक समान है।
अल्पसंख्यक बहुल जिलों का गणित
पूरे उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी का हिस्सा लगभग 19.26% माना जाता है। लेकिन, राज्य के 10 ऐसे जिले हैं जहां यह समुदाय कुल आबादी का 33% से 50% के बीच है। इन जिलों में रामपुर (50.57%), मुरादाबाद (47.12%), बिजनौर (43%), सहारनपुर (41.95%), मुजफ्फरनगर (41.3%), अमरोहा (40.78%), बलरामपुर (37.51%), बरेली (34.54%), मेरठ (34.43%) और बहराइच (33.53%) शामिल हैं।
हैरानी की बात यह है कि मतदाता सूची के पहले ड्राफ्ट के बाद इन 10 जिलों में वोटरों की संख्या में औसतन 18.75% की गिरावट आई है। यह आंकड़ा पूरे उत्तर प्रदेश के औसत यानी 18.70% के बिल्कुल करीब है।
सबसे ज्यादा नाम कटने वाले जिले
अगर हम उन जिलों पर नजर डालें जहां पूरे यूपी में सबसे ज्यादा नाम हटाए गए हैं, तो इस लिस्ट में लखनऊ (30%), गाजियाबाद (28.83%), कानपुर (25.50%), मेरठ (24.65%), प्रयागराज (24.64%), गौतम बुद्ध नगर (23.98%), आगरा (23.25%), हापुड़ (22.30%) और शाहजहांपुर (21.76%) शामिल हैं।
गौर करने वाली बात यह है कि सबसे ज्यादा विलोपन (deletions) वाले इन जिलों में केवल सहारनपुर और मेरठ ही ऐसे हैं जहां मुस्लिम आबादी राज्य के औसत से काफी ज्यादा है। बाकी जिले सामान्य श्रेणी में आते हैं।
चुनाव आयोग का क्या कहना है?
अब तक जिन 13 राज्यों (बिहार सहित) और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया पूरी हुई है, उनमें उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा नाम हटाए गए हैं। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि नाम कटने की मुख्य वजह मतदाताओं का निधन होना, उनका दूसरी जगह शिफ्ट हो जाना, अनुपस्थित रहना या फिर एक से अधिक जगहों पर नाम दर्ज होना है। आयोग का यह भी कहना है कि शिकायत और समाधान के चरण के बाद हटाए गए नामों की संख्या में कमी आने की उम्मीद है।
बलरामपुर का अनोखा मामला
नेपाल सीमा से सटा बलरामपुर जिला उन 10 मुस्लिम बहुल जिलों में तीसरे स्थान पर है, जहां बड़ी संख्या में नाम कटे हैं। यहाँ SIR शुरू होने से पहले मतदाता सूची में 15.83 लाख नाम थे। पहले ड्राफ्ट के बाद यहाँ 25.98% नाम हटा दिए गए, जिससे अब लिस्ट में 11.71 लाख वोटर ही बचे हैं।
बलरामपुर बाकी 9 मुस्लिम बहुल जिलों से इसलिए अलग है क्योंकि यह मुख्य रूप से एक ग्रामीण क्षेत्र है, जबकि अन्य जिले शहरी हैं। पूरे यूपी में ज्यादा नाम कटने का रुझान मुख्य रूप से शहरी इलाकों में देखा गया है, लेकिन बलरामपुर इसका अपवाद है। चुनाव आयोग के अनुसार, यहाँ बड़ी संख्या में नाम इसलिए हटाए गए क्योंकि उनके सत्यापन फॉर्म (enumeration forms) "अनकलेक्टेड" (एकत्र नहीं किए जा सके) रह गए। इसमें से 10% अनुपस्थित/लापता श्रेणी में हैं और 8.43% स्थायी रूप से शिफ्ट हो चुके हैं।
अधिकारियों और नेताओं का तर्क
इंडियन एक्सप्रेस के हवाले से बलरामपुर के आंकड़ों पर एक अधिकारी ने बताया, "SIR शुरू होने से पहले यहाँ की वोटर लिस्ट ठीक से अपडेट नहीं थी। बड़ी संख्या में डुप्लीकेट वोटर थे और शिफ्ट हो चुके लोगों की जानकारी भी अपडेट नहीं की गई थी। बलरामपुर के बहुत से लोग काम के लिए जिले से बाहर रहते हैं। यहाँ तक कि मृत मतदाताओं का रिकॉर्ड भी पहले सही नहीं किया गया था।"
अधिकारी ने अपनी बात साबित करने के लिए इस तथ्य की ओर इशारा किया कि बलरामपुर में मतदान प्रतिशत हमेशा कम रहा है।
बलरामपुर जिले में चार विधानसभा सीटें आती हैं - तुलसीपुर, गैंसड़ी, बलरामपुर और उतरौला। 2022 के विधानसभा चुनावों में तुलसीपुर में 52.81%, गैंसड़ी में 51.94%, उतरौला में 47% और बलरामपुर में 48.3% मतदान हुआ था। जबकि 2022 के चुनावों में राज्य का औसत मतदान 61.03% था।
वहीं, बलरामपुर के एक भाजपा नेता ने अधिकारी द्वारा बताए गए कारणों के अलावा एक और वजह बताई। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में महिला मतदाताओं के फॉर्म जमा नहीं हो पाए। नेता ने कहा, "महिलाएं अपने पैतृक पते का EPIC विवरण प्रस्तुत नहीं कर सकीं। कई मामलों में, महिलाएं अन्य कार्यों में व्यस्त होने के कारण फॉर्म जमा करना भूल गईं।"
भाजपा नेता ने यह भी कहा कि अल्पसंख्यक और अन्य क्षेत्रों में विलोपन का एक समान होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उनका कहना था, "मुस्लिम समुदाय सतर्क था और फॉर्म भरने के लिए उन्होंने अपने दस्तावेज पहले से तैयार रखे थे।"
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