
भोपाल। भोपाल डिक्लेरेशन को 25 वर्ष पूरे होने से पहले देशभर के दलित और आदिवासी संगठनों ने एक बार फिर इतिहास दोहराने की तैयारी शुरू कर दी है। सोमवार को राजधानी भोपाल में 'भोपाल डिक्लेरेशन-2' को लेकर पहला औपचारिक ड्राफ्टिंग सत्र आयोजित हुआ, जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, नीति विशेषज्ञ और राजनीतिक प्रतिनिधि एक मंच पर जुटे। इस बैठक का उद्देश्य सिर्फ एक नया दस्तावेज बनाना नहीं, बल्कि पिछले 25 वर्षों के अनुभवों से सीख लेते हुए दलित-आदिवासी वर्ग के लिए एक ऐसा साझा एजेंडा तैयार करना है, जो आने वाले समय में सामाजिक न्याय की दिशा तय कर सके।
इस विशेष सत्र में पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह, वरिष्ठ नेता फूल सिंह बरैया, टएसटी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया, कांग्रेस विधायक सज्जन सिंह वर्मा, ओमकार सिंह मरकाम सहित देश के कई राज्यों से आए सामाजिक चिंतक और संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। ड्राफ्टिंग सत्र के बाद आयोजित प्रेस वार्ता में “भोपाल डिक्लेरेशन-2” की जरूरत, उसकी प्रक्रिया और आगे की रणनीति को सार्वजनिक किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे दिग्विजय सिंह ने कहा कि आज देश ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा खतरा मंडरा रहा है। महंगाई, बेरोजगारी और असमानता का सबसे ज्यादा असर अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि 2002 में जब भोपाल डिक्लेरेशन-1 बना था, तब उसका लक्ष्य था कि SC-ST वर्ग को शिक्षा, रोजगार और संसाधनों तक वास्तविक पहुंच मिले। अब 25 साल बाद फिर वही सवाल खड़े हैं, बल्कि कई मामलों में हालात और भी कठिन हो गए हैं।
दिग्विजय सिंह ने बताया कि भोपाल डिक्लेरेशन-1 को “दलित एजेंडा” कहा गया, लेकिन उसमें दलित और आदिवासी दोनों समुदायों के मुद्दे शामिल थे। इसका मूल उद्देश्य था कि जो युवा पढ़-लिखकर रोजगार के योग्य हो चुके हैं, उन्हें नौकरियां मिलें, शासकीय खरीद में आरक्षण मिले और जमीन से वंचित परिवारों को पट्टे दिए जाएं। उन्होंने अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी सरकार ने SC-ST वर्ग के डिग्री और डिप्लोमा धारकों को बिना टेंडर के सरकारी काम देने की नीति शुरू की थी, जिससे हजारों युवाओं को ठेके मिले। तीन लाख से अधिक लोगों को पट्टे बांटे गए और सरकारी जमीनों पर दबंगों के कब्जे हटाकर गरीब दलित-आदिवासियों को जमीन दी गई।
उनका कहना था कि भोपाल डिक्लेरेशन सिर्फ मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे देश में इसकी चर्चा हुई और कई राज्यों ने इसे अपनाया भी। हालांकि, सरकार बदलते ही कई योजनाएं या तो बंद कर दी गईं या कमजोर पड़ गईं। उन्होंने कहा कि अब वक्त आ गया है कि एक नया, ज्यादा व्यापक और भविष्य को ध्यान में रखकर बनाया गया “भोपाल डिक्लेरेशन-2” सामने आए।
पूर्व मंत्री सज्जन वर्मा ने कहा कि 2002 में लागू हुआ भोपाल डिक्लेरेशन एक नेक इरादे से बनाया गया था, लेकिन उसे जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी जिन अफसरों के पास थी, वहीं सबसे बड़ी चूक हुई। उनके मुताबिक, दलित-आदिवासी परिवारों को जहां वे पीढ़ियों से रह रहे थे, वहीं जमीन का मालिक बनाने की योजना थी, मगर कई जगह पट्टे पैसे लेकर बांटे गए और असली हकदार आज भी मालिकाना हक से वंचित हैं। उन्होंने साफ कहा कि अगर दलित एजेंडा ईमानदारी से लागू हो जाता, तो उसका असर सिर्फ समाज पर नहीं, बल्कि राजनीति पर भी पड़ता और शायद 2003 में सरकार भी दोबारा बन जाती।
वहीं विधायक फूल सिंह बरैया और एसटी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया ने मौजूदा हालात पर चिंता जताई। बरैया ने कहा कि सरकार बदलते ही भोपाल डिक्लेरेशन-1 की नीतियों को खत्म कर दिया गया, जिससे दलित-आदिवासी समाज फिर से हाशिए पर चला गया। आज आदिवासियों से जल-जंगल-जमीन छीनी जा रही है और दलितों पर अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं। डॉ. भूरिया ने कहा कि SC-ST वर्ग के अधिकार आज भी अधूरे हैं और उनके साथ अन्याय थमा नहीं है। उनके मुताबिक, यह किसी पार्टी की लड़ाई नहीं, बल्कि अधिकारों की लड़ाई है, जिसमें सबको एकजुट होकर नई ताकत के साथ आगे बढ़ना होगा।
दिग्विजय सिंह ने बताया कि मध्यप्रदेश चैप्टर का ड्राफ्ट लगभग तैयार हो चुका है। अगले चरण में 500 से अधिक लोगों के साथ दूसरे सत्र में तय एजेंडे पर चर्चा होगी। इसके बाद अलग-अलग राज्यों में जिला स्तर पर बैठकें होंगी, जहां स्थानीय समस्याओं और जरूरतों के आधार पर सुझाव लिए जाएंगे। इन सभी सुझावों को जोड़कर 13 जनवरी 2027 को अंतिम “भोपाल डिक्लेरेशन-2” जारी किया जाएगा।
उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया में नई पीढ़ी यानी Gen-Z से भी संवाद किया जाएगा, ताकि उनकी सोच, उनकी चुनौतियों और उनके सपनों को समझा जा सके। उनका मानना है कि आज SC-ST वर्ग के लिए एक अलग और मजबूत यूथ पॉलिसी बनाना समय की जरूरत है। उन्होंने साफ कहा कि यह किसी एक पार्टी का कार्यक्रम नहीं है। भाजपा के दलित और आदिवासी नेताओं को भी बुलाया गया था, लेकिन वे शामिल नहीं हुए।
बहुजन इंटेलेक्ट संगठन के मनोज राजे ने कहा कि 2002 में लॉन्च हुआ भोपाल डिक्लेरेशन अपने समय का एक ऐतिहासिक दस्तावेज था। उसके कई प्रावधान लागू हुए और लाखों दलित-आदिवासी परिवारों को उसका लाभ मिला। लेकिन समय के साथ चुनौतियां बदली हैं। आज भूमंडलीकरण, निजीकरण, जल-जंगल-जमीन पर बढ़ता दबाव, शिक्षा और रोजगार में घटते अवसर ये सब नई समस्याएं हैं। इसलिए पुराने ढांचे को जस का तस दोहराने के बजाय, नए हालात के मुताबिक एक नया दस्तावेज जरूरी है।
उन्होंने बताया कि इसी सोच के साथ बहुजन इंटेलेक्ट, आदिवासी सेवा मंडल और डोमा परिषद ने मिलकर भोपाल डिक्लेरेशन-2 बनाने का फैसला किया। चूंकि भोपाल डिक्लेरेशन-1 दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में लागू हुआ था, इसलिए सभी संगठनों ने सर्वसम्मति से उनसे कार्यक्रम की अध्यक्षता करने का आग्रह किया।
ड्राफ्टिंग सत्र के पहले दिन 60 से ज्यादा विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इसमें यह समीक्षा की गई कि 2002 के डिक्लेरेशन के कौन-कौन से बिंदु लागू हुए, कौन से अधूरे रह गए और उनके पीछे क्या कारण थे। इस आत्ममंथन का मकसद यही है कि आगे वही गलतियां दोहराई न जाएं।
कार्यक्रम का संयोजन बहुजन इंटेलेक्ट, आदिवासी सेवा मंडल और डोमा परिषद कर रहे हैं। इनके साथ-साथ देशभर के कई दलित-आदिवासी संगठन इस प्रक्रिया में जुड़े हैं। ड्राफ्टिंग प्रक्रिया के तहत सामाजिक कार्यकर्ता, प्रशासक, नीति-निर्माता, बुद्धिजीवी और राजनीतिक प्रतिनिधियों से चरणबद्ध परामर्श किया जाएगा।
इस सामूहिक मंथन का लक्ष्य सिर्फ बीते दौर की समीक्षा करना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, संवैधानिक मूल्यों की रक्षा, भूमि अधिकार, शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक भागीदारी और आर्थिक सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर एक ऐसा साझा एजेंडा बनाना है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता दिखा सके।
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