
नई दिल्ली। विश्व पुस्तक मेला–2026 के तीसरे दिन राजकमल प्रकाशन समूह के स्टॉल पर पाठकों, लेखकों और साहित्य-प्रेमियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी देखने को मिली। हिन्दी साहित्य के साथ-साथ समकालीन विमर्श, इतिहास, समाज और स्त्री-अध्ययन से जुड़ी पुस्तकों में पाठकों की विशेष रुचि दिखाई दी। राजकमल के स्टॉल पर आनंद द्वारा संपादित किताब ‘वे आज़ाद थे’, शिवानी राकेश की किताब ‘सिनेमा के मुद्दे, मुद्दों का सिनेमा’ आदि नई पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। इसके साथ ही राजकमल प्रकाशन समूह के स्टॉल पर आयोजित ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम में निधि अग्रवाल के कहानी-संग्रह ‘प्रेम एक पालतू बिल्ली’, लक्ष्मण प्रसाद गुप्त ग़ज़ल संग्रह ‘ये किससे बोलता हूँ’, हृषीकेश सुलभ के उपन्यास ‘जूठी गली’, अब्दुल बिस्मिल्लाह की ‘स्मृतियों की बस्ती’ किताबों पर चर्चा हुई।
तीसरे दिन आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत आनंद द्वारा संपादित किताब ‘वे आज़ाद थे’ के लोकार्पण के साथ हुई। यह किताब भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में शामिल रहे हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ के सदस्यों द्वारा लिखित आलेखों और निबंधों का संकलन है। किताब पर चर्चा करते हुए आनंद ने कहा कि यह किताब क्रांतिकारियों के विचारों में हुए परिवर्तन को दर्शाती है। विचारों के इस परिवर्तन को देखने के बाद ही क्रांतिकारियों का इतिहास लिखा जा सकता है। इसमें संकलित लेख उनसे संबंधित सभी झूठी अफ़वाहों का खंडन करती है। कार्यक्रम संचालक मनोज कुमार पाण्डेय ने बताया कि इस किताब में क्रांतिकारियों के दुर्लभ चित्र भी प्रस्तुत हैं जो अभी तक कहीं और कम ही प्रकाशित हैं।
दूसरे सत्र में शिवानी राकेश की किताब ‘सिनेमा के मुद्दे, मुद्दों का सिनेमा’ का लोकार्पण हुआ। यह किताब इस बात की पड़ताल करती है कि हिन्दी सिनेमा किस तरह आमजन के मुद्दों से भटककर अभिजन वर्ग का हित करने का साधन बन गया और कैसे वह जातिवाद को पोषित करने और उच्च जाति का गौरवगान करने का माध्यम बन गया।
अगले सत्र में निधि अग्रवाल के कहानी-संग्रह ‘प्रेम एक पालतू बिल्ली’ पर चर्चा हुई। बातचीत के क्रम में निधि अग्रवाल ने कहा कि आप दुनिया को जैसा देखना चाहते हैं वैसी नहीं दिखती है तब आप एक नई दुनिया गढ़ते हैं और मैंने इन कहानियों को लिखते हुए भी ऐसा ही किया है। इस किताब को पढ़कर हमारे अपने जो अंधेरे हैं, हमारे आस-पास के जो अंधेरे हैं, उनसे परिचय होगा। इसे पढ़ने से पता चलेगा कि हमारे अलावा और भी बहुत से लोग हैं जो कष्टों को जीते हैं। जब हम लोगों के अंधेरे, दुःख और पीड़ा को समझेंगे तो शायद हम उसके सुधार की दिशा में प्रयास कर सकेंगे।
कार्यक्रम के चौथे सत्र में लक्ष्मण प्रसाद गुप्त ग़ज़ल संग्रह ‘ये किससे बोलता हूँ’ पर चर्चा हुई। इस दौरान श्रोताओं की फ़रमाइश पर लक्ष्मण प्रसाद गुप्त ने संग्रह से कुछ ग़ज़लें पढ़ीं। संग्रह में ग़ज़लें अपने समय और समाज की हक़ीक़त से परिचय कराती हैं। इस अवसर पर लेखक ने कहा, यह किताब पिछले दस सालों के दौरान लिखी गई ग़ज़लों का चयन है। इसमें मैंने अपने समय और समाज की बात कही है क्योंकि मेरा मानना है कि जो लेखक अपने समय की बात नहीं कह पाएगा तो वह असफल हो जाएगा। चर्चा के दौरान पुस्तक के कथ्य और भाषा पर विस्तार से बात की गई।
पांचवें सत्र में हृषीकेश सुलभ के उपन्यास ‘जूठी गली’ पर बातचीत हुई। मनोज कुमार पाण्डेय से बातचीत के दौरान लेखक ने कहा कि हमारा समाज है बहुपरतीय समाज है और इसमें जो मध्यवर्गीय समाज है वह प्रपंचों से भरा हुआ है। उसे संसार के सभी सुख और वैभव तो चाहिए लेकिन वह मेहनत नहीं करना चाहता है। इस उपन्यास की गलियों में जो बाशिंदे हैं, वे इसी मध्य वर्ग से हैं। उन्हें किसी चीज़ से फ़र्क़ नहीं पड़ता है, वे बस यह देखते हैं कि उनका लाभ किसमें है। ‘जूठी गली’ उपन्यास जीवन के अनुभवों का एक ऐसा लोक है जिसके भीतर वर्तमान की आँधी में इतिहास की धूल और राख उड़ती रहती है।
अंतिम सत्र में अब्दुल बिस्मिल्लाह के संस्मरणों की किताब ‘स्मृतियों की बस्ती’ पर चर्चा हुई। इस किताब में संकलित संस्मरणों के केन्द्र में हिन्दी के वे रचनाकार हैं जिनसे अब्दुल बिस्मिल्लाह की भेंट-मुलाक़ात हुई, जिनसे उन्होंने सीखा और जिन्हें उन्होंने अपने ढंग से समझा। बातचीत के दौरान अब्दुल बिस्मिल्लाह ने सभी रचनाकारों को याद किया और अपने आपसी संबंधों से जुड़ी यादें साझा कीं।
राजकमल प्रकाशन के कार्यकारी निदेशक आमोद महेश्वरी ने बताया कि इस वर्ष भी मेले में युवाओं की उपस्थिति बढ़ रही है। युवाओं में हिन्दी की क्लासिक किताबों के साथ-साथ नई किताबों और कविताओं में भी रुचि बढ़ रही है जो एक अच्छा संकेत है। उन्होंने कहा कि आगामी दिनों में भी राजकमल प्रकाशन समूह के स्टॉल पर नई पुस्तकों के लोकार्पण, लेखक संवाद और पाठकों के लिए विशेष गतिविधियाँ आयोजित की जाएँगी।
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