MP बालाघाट में 10 मुस्लिम परिवारों का सामाजिक बहिष्कार: लेन-देन बंद, रोजगार छिना, डर के साए में जिंदगी

हिंदू सम्मेलन के बयान के बाद बदले गांव के बदले हालात, सामाजिक बहिष्कार का सबसे गहरा असर आजीविका पर पड़ा है।
MP बालाघाट में 10 मुस्लिम परिवारों का सामाजिक बहिष्कार: लेन-देन बंद, रोजगार छिना, डर के साए में जिंदगी
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भोपाल। मध्यप्रदेश के बालाघाट जिला के लांजी थाना क्षेत्र अंतर्गत घोटी-नंदोरा गांव में सामाजिक सौहार्द्र को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। गांव के करीब 10 मुस्लिम परिवारों पर कथित रूप से सामाजिक बहिष्कार थोप दिया गया है। आरोप है कि जनवरी में आयोजित एक हिंदू सम्मेलन में मुस्लिम समाज के खिलाफ दिए गए भड़काऊ बयानों के बाद गांव में उनका लेन-देन पूरी तरह बंद करा दिया गया। इस आह्वान का असर यह हुआ कि रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर रोजगार तक, हर मोर्चे पर मुस्लिम परिवारों को अलग-थलग कर दिया गया।

ग्रामीणों के अनुसार सम्मेलन में खुले मंच से यह कहा गया कि मुस्लिम समाज से खाना-पीना और किसी भी तरह का लेन-देन नहीं किया जाए तथा सभी जरूरतें केवल हिंदू समाज से ही पूरी की जाएं। इसके बाद से गांव की सामाजिक संरचना में अचानक बदलाव दिखने लगा और वर्षों से साथ रह रहे परिवारों के बीच अविश्वास और भय का माहौल बन गया।

रोजगार पर सीधा असर, परिवारों की आजीविका ठप

सामाजिक बहिष्कार का सबसे गहरा असर आजीविका पर पड़ा है। बस चालक आसिफ हुसैन को स्कूल बस चलाने से रोक दिया गया, जिससे उनकी आय का एकमात्र स्रोत बंद हो गया। वहीं, इलेक्ट्रिशियन सादिक हुसैन पिछले सात दिनों से बेरोजगार हैं क्योंकि गांव में उन्हें काम देने से मना किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन पेशों पर ये परिवार निर्भर थे, उन्हें जानबूझकर ठप कर दिया गया है ताकि वे आर्थिक दबाव में गांव छोड़ने को मजबूर हों।

कोटवार से मुनादी, रोजमर्रा की सेवाएं भी बंद

आरोप है कि बहिष्कार की घोषणा को औपचारिक रूप देने के लिए कोटवार से मुनादी कराई गई। इसके बाद किराना दुकानदारों ने मुस्लिम परिवारों को सामान देने से इनकार कर दिया, जबकि नाइयों ने दाढ़ी और बाल काटने से मना कर दिया। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा पर भी सीधा प्रहार मानी जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यह बहिष्कार अनौपचारिक होते हुए भी पूरे गांव में सख्ती से लागू किया जा रहा है।

महिलाओं और बच्चों में भय, स्कूल जाने से डर

गांव की निवासी खैरून निशा ने बताया कि जब वे सम्मेलन में दिए गए बयानों पर बातचीत करने गईं, तब से माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया। उनके अनुसार, गांव में पहले ऐसा कभी नहीं था, सभी समुदाय मिल-जुलकर रहते थे। अब स्थिति यह है कि महिलाएं भय के साए में जी रही हैं और बच्चे स्कूल जाने से डर रहे हैं। सामाजिक बहिष्कार ने न केवल रोजमर्रा की जिंदगी बाधित की है, बल्कि मानसिक दबाव और असुरक्षा की भावना भी पैदा कर दी है।

पूर्व विधायक किशोर समरिते ने बताया संवैधानिक अधिकारों का हनन

इस मामले पर पूर्व विधायक किशोर समरिते ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने घोटी-नंदोरा में हो रहे सामाजिक बहिष्कार को संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का खुला उल्लंघन बताया। समरिते ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से पूरे प्रकरण की जांच कराने, दोनों गांवों में पुलिस फ्लैग मार्च कराने और घटनाक्रम की न्यायिक जांच की मांग की है।

उन्होंने आरोप लगाया कि गांव के सरपंच, सचिव, जनपद और जिला पंचायत के कुछ प्रतिनिधि भी इस बहिष्कार का समर्थन कर रहे हैं। समरिते के अनुसार मंदिरों और चौराहों पर धार्मिक झंडे लगाकर हेट स्पीच दी जा रही है, जिससे तनाव और बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इतनी गंभीर घटना के बावजूद पुलिस और खुफिया एजेंसियों की चुप्पी चिंताजनक है।

कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द्र पर खतरा

किशोर समरिते ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि प्रशासन ने निष्पक्ष और सख्त कार्रवाई नहीं की, तो यह मामला कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द्र के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। सामाजिक बहिष्कार न केवल गैरकानूनी है, बल्कि यह संविधान के समानता, स्वतंत्रता और गरिमा के मूल सिद्धांतों पर भी चोट करता है।

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