नई दिल्ली: तमिलनाडु के वेल्लोर में सोमवार को 400 से अधिक दलित ईसाई समुदाय के लोगों ने 'ब्लैक डे' मनाया। इन प्रदर्शनकारियों ने दलित ईसाइयों और मुसलमानों के लिए अनुसूचित जाति (एससी) के दर्जे की मांग करते हुए एक राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया। इसके साथ ही उन्होंने 1950 के उस राष्ट्रपति आदेश को तुरंत रद्द करने की मांग की, जिसके तहत एससी का दर्जा विशेष रूप से केवल हिंदुओं तक सीमित कर दिया गया था।
यह विशाल विरोध प्रदर्शन वेल्लोर कैथोलिक डायोसिस की एससी/एसटी समिति, सीएसआई चर्च-वेल्लोर डायोसिस और ऑल माइनॉरिटीज फेडरेशन द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था।
सोमवार को अन्ना कलईअरंगम के पास एकजुट हुए इन प्रदर्शनकारियों का समर्थन करने के लिए वेल्लोर के कैथोलिक बिशप एम्ब्रोस पिचाईमुथु और वेल्लोर सीएसआई के बिशप शर्मा नित्यानंदम भी वहां पहुंचे। उनके साथ जिले भर के 20 से अधिक फादर और पादरियों ने भी इस जन आंदोलन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
गौरतलब है कि 10 अगस्त को साल 2009 से हर वर्ष 'ब्लैक डे' के रूप में मनाया जाता है। दरअसल, 1950 में इसी दिन वह राष्ट्रपति आदेश पारित किया गया था, जिसमें गैर-हिंदू धर्मांतरित लोगों को अनुसूचित जाति के अधिकारों और सुरक्षा की सूची से बाहर रखा गया था।
अपने प्रदर्शन के दौरान लोगों ने रंगनाथ मिश्रा आयोग (2007) जैसी कई रिपोर्टों और उनके सुझावों का हवाला दिया, जिनकी सिफारिशें आज तक जमीनी स्तर पर लागू नहीं की जा सकी हैं।
मिश्रा आयोग की रिपोर्ट में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया था कि भेदभाव से बचने के लिए जिन ईसाइयों को सुरक्षात्मक कानून की सबसे ज्यादा जरूरत है, वे अनुसूचित जाति से धर्मांतरित हुए लोग हैं। इसी कारण से उन्हें तत्काल संवैधानिक सुरक्षा मिलनी चाहिए।
रेवरेंड पास्टर इसहाक कादिरवेल ने व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह कितनी बड़ी विडंबना है कि सरकार अपने ही बनाए आयोग की सिफारिशों को लागू करने में हिचक रही है। उन्होंने समुदाय का दर्द बयां करते हुए कहा कि गांवों में उनके लोग आज भी एससी हैं और उनके घर अब भी चेरी या मलिन बस्तियों में स्थित हैं। विवाह और अन्य सामाजिक मामलों में भी उनके साथ दलितों की तरह ही भेदभाव होता है। उन्होंने सीधा सवाल दागा कि आखिर केंद्र सरकार को उन्हें एससी का दर्जा देने से कौन रोक रहा है।
मिश्रा आयोग की रिपोर्ट इस बात की भी पुष्टि करती है कि एससी मूल के धर्मांतरित ईसाई और मुस्लिम आज भी गहरी जड़ें जमा चुकी जाति व्यवस्था का शिकार हैं। वे उन लोगों के समान ही गहरे सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ेपन का सामना कर रहे हैं, जिन्हें पहले से एससी का दर्जा प्राप्त है।
आयोग ने इस गंभीर मुद्दे की ओर भी इशारा किया कि दलित ईसाइयों और मुसलमानों को अनगिनत प्रकार के अत्याचारों का सामना करने के बावजूद नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत कोई कानूनी सुरक्षा सुलभ नहीं है।
तिरुवन्नामलाई के विकर फोरेन, बोपथी लूर्दुसामी ने कहा कि दलित ईसाइयों को राजनीतिक रूप से और यहां तक कि हमारी कानूनी न्याय प्रणाली में भी दबाया जा रहा है। उन्होंने इसे एक घोर अन्याय करार देते हुए कहा कि जिस तरह कॉकरोच जनता पार्टी के युवाओं ने अपना कड़ा विरोध और असहमति दर्ज कराई है, ठीक उसी तरह पूरे भारत के दलित ईसाइयों को भी अपने संवैधानिक अधिकारों को पाने के लिए एकजुट होना चाहिए।
इस विरोध प्रदर्शन के दौरान 1997 के मेलवलावु और 1968 के कीझवेनमनी जनसंहारों की याद में क्रांतिकारी गीत भी गाए गए। इस मौके पर दलित सुब्बैया द्वारा रचित गीत 'पनिधु पोगा माटोम, इवानुकुम बायंधु वाझा माटोम' ने आंदोलनकारियों में नया जोश भर दिया।
भीड़ ने सरकार से मांग दोहराते हुए कहा कि जिस प्रकार 1956 में सिखों और 1990 में बौद्धों को अनुसूचित जाति में शामिल किया गया था, ठीक उसी तर्ज पर दलित ईसाइयों और दलित मुसलमानों को भी यह अधिकार दिया जाना चाहिए।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में आरक्षण, शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय में सभी के लिए समान पहुंच सुनिश्चित करना शामिल है। एक प्रदर्शनकारी ने दृढ़ता के साथ कहा कि अगले कदम के तौर पर वे अपनी यह मांग मुख्यमंत्री विजय और प्रधानमंत्री मोदी तक ले जाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, क्योंकि उन्हें अनुसूचित जाति में शामिल करने का वैधानिक अधिकार केंद्र सरकार के पास ही है।
आंदोलनकारियों ने चेतावनी देते हुए कहा कि वे पिछले 76 वर्षों से इस अधिकार के लिए लड़ रहे हैं। यदि अगले साल तक उनकी जायज मांगें नहीं मानी गईं, तो वे 'चलो दिल्ली' के नारे के साथ राष्ट्रीय राजधानी की ओर कूच करेंगे।
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