दलित ईसाइयों के हक में उतरी BRS, जंतर-मंतर से भरी हुंकार; SC दर्जा बहाल करने के लिए केंद्र पर बनाया दबाव

जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में BRS नेताओं ने केंद्र सरकार से भेदभावपूर्ण राष्ट्रपति आदेश रद्द करने की मांग की। साथ ही, चंद्रबाबू नायडू से प्रधानमंत्री पर दबाव बनाने की अहम अपील की गई है ताकि दलित ईसाइयों को उनका हक वापस मिल सके।
BRS demands revocation of order against SC status to Dalit Christians.
दिल्ली के जंतर-मंतर पर BRS ने दलित ईसाइयों के SC दर्जे की बहाली के लिए जोरदार प्रदर्शन किया। संविधान का हवाला देते हुए जानिए क्यों पार्टी नेताओं ने चंद्रबाबू नायडू से इस मामले में तत्काल दखल देने की मांग की है।
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नई दिल्ली: जंतर-मंतर पर सोमवार को ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी ने एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया। इस धरने में भारत राष्ट्र समिति (BRS) के प्रतिनिधियों ने भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। मंच से बोलते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता आर.एस. प्रवीण कुमार और एम. राजीव सागर ने दलित ईसाइयों से अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा छीने जाने को पूरी तरह से असभ्य और अन्यायपूर्ण करार दिया।

विरोध प्रदर्शन को संबोधित करते हुए BRS नेताओं ने केंद्र सरकार से तत्काल उस राष्ट्रपति आदेश को रद्द करने की मांग की, जिसके तहत दलित ईसाइयों को SC दर्जे से वंचित किया गया है। उन्होंने इसे सरासर भेदभावपूर्ण बताते हुए कहा कि धर्म बदलने मात्र से दलितों के साथ होने वाला सामाजिक भेदभाव खत्म नहीं हो जाता।

नेताओं ने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि 1950 में तत्कालीन जवाहरलाल नेहरू सरकार ने पिछले दरवाजे से एक आदेश जारी करवाया था। उस नियम में यह तय कर दिया गया था कि SC का लाभ केवल हिंदू, बौद्ध और सिख धर्म के लोगों को ही मिलेगा।

इस दौरान कांग्रेस पर भी तीखा हमला बोला गया। नेताओं ने स्पष्ट किया कि दलित ईसाइयों पर हमलों की शुरुआत असल में कांग्रेस के शासनकाल में ही हो गई थी। वर्तमान राजनीतिक समीकरणों की ओर इशारा करते हुए BRS नेताओं ने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू से इस संवेदनशील मामले में दखल देने की अपील की।

उनका तर्क था कि केंद्र की मौजूदा भाजपा नीत सरकार मुख्य रूप से नायडू और बिहार के पूर्व सीएम नीतीश कुमार की पार्टियों के समर्थन पर ही टिकी है। ऐसे में चंद्रबाबू नायडू को प्रधानमंत्री से सीधे बात करके इस विवादित आदेश को रद्द करवाना चाहिए, क्योंकि यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 15 और 25 का खुला उल्लंघन है।

दलित ईसाइयों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी पार्टी की प्रतिबद्धता जताते हुए नेताओं ने एक अहम जानकारी भी साझा की। उन्होंने बताया कि BRS ने के.जी. बालकृष्णन समिति को एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपकर इस दर्जे को समाप्त करने का कड़ा विरोध दर्ज कराया है। अपनी बात समाप्त करते हुए उन्होंने केंद्र सरकार के सामने यह प्रमुख मांग रखी कि संसद के मौजूदा सत्र में ही एक विशेष विधेयक लाकर दलित ईसाइयों का अनुसूचित जाति का दर्जा हर हाल में बहाल किया जाए।

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