
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में लाखों गरीबों और किसानों के राशन पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। मंगलवार, 23 जून को सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर मामले पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ताओं को कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख करने की सलाह दी है। यह पूरा विवाद राज्य सरकार के 4 जून के उस आदेश से जुड़ा है, जिसके तहत स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के बाद वोटर लिस्ट से हटाए गए लाखों लोगों को सब्सिडी वाले राशन और पोषण से वंचित कर दिया गया है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष यह मामला पश्चिम बंग खेत मजदूर समिति ने उठाया। कृषि मजदूरों, सीमांत किसानों और बटाईदारों के इस स्वतंत्र ट्रेड यूनियन ने अदालत को बताया कि एसआईआर के नतीजों को राज्य की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) और अन्नपूर्णा योजना के कामकाज से सीधे तौर पर जोड़ दिया गया है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली एक ऐसी महत्वपूर्ण कल्याणकारी व्यवस्था है जिसका मकसद आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को जरूरी खाद्यान्न उपलब्ध कराना है। यह पूरी योजना राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के ढांचे के तहत काम करती है और आर्थिक तंगी का सामना कर रहे परिवारों को बुनियादी भरण-पोषण सुनिश्चित करती है। वहीं, अन्नपूर्णा योजना आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए बनाई गई है।
किसान समूह की ओर से पेश हुए वकील प्रसन्ना एस. ने जोरदार दलील दी कि कमजोर वर्गों की खाद्य सुरक्षा एसआईआर जैसी पूरी तरह से असंबंधित और चुनावी प्रक्रियाओं पर निर्भर नहीं होनी चाहिए।
जस्टिस जॉयमाल्या बागची की सदस्यता वाली इसी पीठ के समक्ष मौखिक उल्लेख में वकील ने कहा कि 4 जून का आदेश अन्य राज्यों में भी उभर रहे एक चिंताजनक पैटर्न को दर्शाता है। यह पैटर्न चुनावी डेटा और कल्याणकारी योजनाओं को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रहा है जिससे कई लोग लाभ से वंचित हो सकते हैं।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि 4 जून के आदेश में अधिकारियों को एसआईआर के दौरान बनी श्रेणियों के आधार पर लाभार्थियों की पहचान करने, उनकी जांच करने और नाम काटने का स्पष्ट निर्देश दिया गया है। यह कदम खाद्य सुरक्षा ढांचे में उन चीजों को शामिल कर रहा है जिनका राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के मूल उद्देश्यों से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है।
सीधे शब्दों में कहें तो यह आदेश चुनावी स्थिति और मतदाता सूची में नाम होने को ही खाद्य सुरक्षा लाभों की पात्रता का इकलौता पैमाना मान रहा है। इस विवादित आदेश के जरिए चुनावी वर्गीकरण को पात्रता का संकेतक बनाया जा रहा है जो गरीबों के हित में नहीं है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत में यह तर्क दिया है कि एसआईआर और खाद्य सुरक्षा योजनाओं के बीच इस तरह के अनुचित जुड़ाव से राज्य में करीब 35 लाख और 60 लाख लोगों के राशन कार्ड निष्क्रिय हो सकते हैं।
वकील ने अदालत को बताया कि केवल एसआईआर के आधार पर पीडीएस और अन्नपूर्णा योजना से नाम हटाने का सीधा मतलब यह होगा कि प्रभावित लोगों को अपना पक्ष रखने का कोई मौका ही नहीं मिलेगा। राज्य सरकार का यह रवैया संविधान के तहत उसके कल्याणकारी स्वरूप के बिल्कुल खिलाफ जाता है।
याचिकाकर्ता ने इस बात पर जोर दिया कि गैर-प्रतिगमन (नॉन-रेट्रोग्रेशन) के सिद्धांत के तहत, राज्य द्वारा एक बार दिया गया कोई भी कल्याणकारी लाभ इस तरह मनमाने ढंग से वापस नहीं लिया जा सकता।
इन सभी दलीलों को सुनने के बाद पीठ ने एक अहम टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने कहा कि सबसे पहले यह तय किया जाना जरूरी है कि इस याचिका का मूल कारण वास्तव में एसआईआर की प्रक्रिया है, जैसा कि याचिकाकर्ता दावा कर रहे हैं, या इसके पीछे कुछ अन्य नीतिगत कारण शामिल हैं। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल याचिकाकर्ता से आग्रह किया है कि वे इस मामले की सुनवाई के लिए सबसे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएं।
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