
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इंटरसेक्स व्यक्तियों को एक अलग और विशिष्ट वर्ग के रूप में मान्यता देने की मांग वाली याचिका पर शुक्रवार, 17 जुलाई 2026 को केंद्र तथा राज्य सरकारों से जवाब तलब किया है। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने इस बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण मसले पर नोटिस जारी किया है।
यह जनहित याचिका अधिवक्ता शमश्रविश रीन द्वारा दायर की गई है। इसमें केंद्र सरकार को छह महीने के भीतर अलग वैधानिक दिशानिर्देश बनाने का निर्देश देने की मांग की गई है। इसका मुख्य उद्देश्य जन्मजात यौन भिन्नताओं वाले व्यक्तियों, जिन्हें इंटरसेक्स या डीसडी (डिफरेंस ऑफ सेक्स डेवलपमेंट) कहा जाता है, को समाज में एक अलग पहचान, सुरक्षा और सकारात्मक समर्थन प्रदान करना है।
याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने स्पष्ट किया कि इंटरसेक्स होना जन्म से जुड़ी एक जैविक सच्चाई है, न कि बाद में विकसित होने वाली कोई लैंगिक पहचान। उन्होंने बताया कि कुछ लोग किशोरावस्था के बाद अपने जन्म के समय तय किए गए लिंग से अलग पहचान चुनते हैं। वहीं दूसरी ओर इंटरसेक्स बच्चों में जन्म के समय ही क्रोमोसोम या अंगों की भिन्नता के कारण उन्हें स्पष्ट रूप से पुरुष या महिला की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
इन बच्चों को समाज में कई तरह की दर्दनाक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसमें जन्म के बाद जबरन चिकित्सा हस्तक्षेप का दबाव, सामाजिक बहिष्कार और पहचान दस्तावेजों का भारी अभाव शामिल है। इसके अलावा, समाज के कड़े स्त्री-पुरुष ढांचे के कारण इन्हें शिक्षा, रोजगार और पैतृक संपत्ति के अधिकारों से भी लंबे समय तक वंचित रहना पड़ता है।
याचिका में सरकार से तीन महीने के भीतर इंटरसेक्स देखभाल के लिए एक राष्ट्रीय चिकित्सा प्रोटोकॉल समिति गठित करने का आग्रह किया गया है। इसके साथ ही, इंटरसेक्स शिशुओं और बच्चों पर होने वाली ऐसी सभी अनावश्यक और अपरिवर्तनीय सर्जिकल या हार्मोनल प्रक्रियाओं पर देशव्यापी रोक लगाने की मांग की गई है, जो जानलेवा न हों।
अधिवक्ता रीन ने शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण, विरासत कानूनों में स्पष्टता और जन्म तथा पहचान दस्तावेजों में प्रशासनिक समावेशन को कानूनी सुरक्षा का अहम हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि सम्मानजनक शब्दावली के जरिए इस वर्ग को भाषाई मान्यता देना भी बेहद जरूरी है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, इस श्रेणी को स्पष्ट रूप से मान्यता न देना सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का गंभीर उल्लंघन है। यह समानता के अधिकार, भेदभाव के खिलाफ अधिकार और गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता व पहचान के मौलिक अधिकारों को नकारने जैसा है।
याचिका में इस बात पर जोर दिया गया कि भारत का संविधान केवल स्त्री-पुरुष तक सीमित कोई बाइनरी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक परिवर्तनकारी चार्टर है। इंटरसेक्स व्यक्ति कोई विसंगति नहीं हैं जिन्हें सुधारा जाए, बल्कि वे इस देश के नागरिक हैं जिन्हें संरक्षण की आवश्यकता है। उन्हें भी संविधान के तहत पूर्ण गरिमा का अधिकार प्राप्त है, इसलिए उनकी मान्यता सटीक और समानता सार्थक होनी चाहिए।
याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय से इस मामले में कुछ अंतरिम राहत की भी गुहार लगाई है। इनमें इंटरसेक्स शिशुओं की चिकित्सकीय रूप से अनावश्यक जननांग सर्जरी को तुरंत निलंबित करना, जन्म पंजीकरण में अस्थायी तटस्थ प्रविष्टि की अनुमति देने का निर्देश और एक सूचित सहमति प्रोटोकॉल का निर्माण करना शामिल है।
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