किताबों के पन्नों में दर्ज भारत के क्वीयर समुदाय की दास्तान: पहचान, संघर्ष और समानता की एक अधूरी लड़ाई

भारत में एलजीबीटीक्यूआईए+ (LGBTQIA+) समुदाय के कानूनी संघर्ष, निजी अनुभवों और समानता की अधूरी लड़ाई की पूरी कहानी, मशहूर किताबों के नजरिए से।
किताबों के पन्नों में दर्ज भारत के क्वीयर समुदाय की दास्तान: पहचान, संघर्ष और समानता की एक अधूरी लड़ाई
Credit- The Indian Express
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नई दिल्ली: भारत में एलजीबीटीक्यूआईए+ (LGBTQIA+) जीवन की जमीनी हकीकत तेजी से बदल रही है। फिक्शन और नॉन-फिक्शन किताबों का एक शानदार संग्रह इस समुदाय के इर्द-गिर्द बुने गए कानूनी दायरों, निजी यादों, पारिवारिक रिश्तों और कार्यस्थलों के माहौल की गहरी समझ पेश करता है। ये किताबें दिखाती हैं कि कैसे कानूनी ढांचे, निजी अनुभव और पीढ़ियों के बीच आए बदलाव किसी इंसान की पहचान को आकार देते हैं।

हर साल जून का महीना दुनियाभर में 'प्राइड मंथ' के रूप में मनाया जाता है। इसकी शुरुआत साल 1969 में न्यूयॉर्क शहर में हुए ऐतिहासिक स्टोनवॉल दंगों से जुड़ी है। अमेरिका के ग्रीनविच विलेज स्थित स्टोनवॉल इन में पुलिस की छापेमारी के विरोध में इस समुदाय ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किए थे। यह घटना आधुनिक एलजीबीटीक्यूआईए+ अधिकारों के आंदोलन का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई।

भारत में भी इस समुदाय के अधिकारों की लड़ाई बेहद सक्रिय रही है और कई अहम कानूनी जीत भी हासिल हुई हैं। हालांकि, हाल ही में आए 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026' ने कानूनी मान्यता और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को फिर से उजागर कर दिया है।

इस नए कानून में अपनी पहचान खुद तय करने के अधिकार को खत्म कर दिया गया है। साथ ही, मेडिकल बोर्ड के प्रमाणन, नौकरशाही के सत्यापन और 'राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर रजिस्ट्री' में शामिल होने की अनिवार्यता को भी लागू कर दिया गया है।

चिकित्सीय प्रमाणन की यह अनिवार्यता किसी भी इंसान की गरिमा, स्वायत्तता, निजी स्वतंत्रता और निजता का सीधा उल्लंघन है। जब तक समाज में मिलने वाली मान्यता को शर्तों की बेड़ियों में बांधकर रखा जाएगा, तब तक समानता का सपना अधूरा ही रहेगा।

अधिवक्ता जयना कोठारी अपनी चर्चित किताब 'ट्रांसफॉर्मिंग राइट्स: हाउ लॉ शेप्स ट्रांसजेंडर लाइव्स, आइडेंटिटी एंड कम्युनिटी इन इंडिया' में इसी गंभीर मुद्दे को उठाती हैं। वह कानून और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की वास्तविक जिंदगी के बीच के गहरे संबंध को विस्तार से समझाती हैं।

निबंधों का यह प्रभावशाली संग्रह भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों में आए बदलावों की बारीकी से पड़ताल करता है। इसमें जेंडर चुनने की आजादी और समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने से लेकर, हाल ही में अधिकारों को वापस लेने वाले विवादित कानून तक की विस्तार से चर्चा की गई है।

भले ही हमारी अदालतों ने कानून के तहत समान सुरक्षा का एक मजबूत ढांचा तैयार कर दिया हो, लेकिन ट्रांस समुदाय आज भी सामाजिक बहिष्कार और भेदभाव का दंश झेल रहा है। वे शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और सुरक्षित आश्रय जैसे बुनियादी अधिकारों के लिए आज भी संघर्षरत हैं।

जयना कोठारी की इस किताब में विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और समुदाय के सदस्यों की आवाजें शामिल हैं, जो व्यवस्था के इस विरोधाभास पर तीखे सवाल खड़े करती हैं। यह संग्रह वर्षों में हुई प्रगति, लगातार बनी हुई चुनौतियों और जरूरी सुधारों की रूपरेखा पेश करता है।

निजी अनुभवों की मार्मिक दास्तान

कानूनी ढांचा हमें अधिकारों की रूपरेखा को समझने में मदद तो जरूर करता है, लेकिन यह समुदाय की रोजमर्रा की चुनौतियों को पूरी तरह बयां नहीं कर पाता। इन संवेदनशील अनुभवों को सही मायने में निजी कहानियों, संस्मरणों और सामुदायिक किस्सों के जरिए ही आवाज मिलती है।

परंपरागत कहानियों के सांचे से बाहर रहकर जीना क्वीयर समुदाय के लिए कभी आसान नहीं रहा है। उन्हें अक्सर अपनी जगह खुद ही बनानी पड़ती है। एक संस्मरण लिखने का मतलब है, पाठकों के सामने अपनी कमजोरियों को पूरी बेबाकी से खोलकर रख देना।

मिशेलिन-स्टार शेफ सुवीर सरन की किताब 'टेल माय मदर आई लाइक बॉयज़' एक ऐसा ही बेहद निजी और दिल को झकझोर देने वाला संस्मरण है। यह किताब उनके साथ हुए दुर्व्यवहार और एक रसोईघर में उन्हें मिली मानसिक शांति की ईमानदार कहानी पेश करती है।

सरन के लिए खाना पकाना कभी भी सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं था, बल्कि यह उनके लिए यादों को सहेजने और जीवन जीने के संघर्ष से जुड़ा था। उनकी यह कहानी उत्तरी अमेरिका में खुले पहले भारतीय रेस्तरां 'देवी' की शानदार शुरुआत और सफलता के बाद उन्हें मिले गहरे अकेलेपन के बीच झूलती रहती है।

लेखक बताते हैं कि उन्होंने जिंदगी में इतना दिल टूटना सहा है कि अब उन्हें अपनी सच्चाई दुनिया को बताने से डर नहीं लगता। 1970 के दशक में दिल्ली में पले-बढ़े सरन ने उन बच्चों के दर्द को बिल्कुल कम करके नहीं आंका है, जो समाज के तय सांचों में फिट नहीं बैठते। स्कूल में चिढ़ाए जाने, शर्मिंदगी और अंदरूनी दहशत का उनका वर्णन बेहद सटीक और निडर है।

इस किताब में मैनहट्टन में बिताए गए उनके जीवन के उन पलों को भी दर्शाया गया है, जिसमें महत्वाकांक्षा, प्यार, धोखा और बेवफाई शामिल है। भारत लौटने पर उनकी मां ने उनके घावों को भरने में जो मदद की, उसका भी उन्होंने खुलकर और भावुक तरीके से जिक्र किया है। अपनी किताब की प्रस्तावना में सरन लिखते हैं:

"यह किताब कोई इतिहास का पन्ना नहीं है। यह एक मानसून है। यह बरसता है, यह ठहरता है, यह बाढ़ लाता है, यह घटता है और यह फिर लौटकर आता है।"

पीढ़ियों से गुजरती क्वीयर पहचान

सुवीर सरन की कहानी इस व्यापक सवाल को जन्म देती है कि कैसे परिवारों और पीढ़ियों के बीच क्वीयर पहचान अपना आकार लेती है। शांतनु भट्टाचार्य की किताब 'डेवियंट्स' एक ही परिवार के तीन समलैंगिक पुरुषों की एक साहसिक और कई पीढ़ियों को समेटने वाली बेमिसाल कहानी है।

यह कहानी 1970 के दशक से लेकर आज के आधुनिक दौर तक प्यार और सम्मान के लिए लड़ी गई लड़ाई को बयां करती है। इसमें विवान नाम का एक किशोर मुख्य किरदार है, जो अपने स्मार्टफोन के जरिए प्यार की नई दुनिया खोजता है। उसके माता-पिता उसकी जेंडर पहचान को अच्छी तरह समझते हैं और उसे उनका पूरा और खुला समर्थन हासिल है।

लेकिन उससे 30 साल पहले जन्मे उसके चाचा मैम्ब्रो की स्थिति बिल्कुल अलग थी। मैम्ब्रो को अपने एक पुरुष सहपाठी से उस दौर में प्यार हुआ था, जब समलैंगिकता को अपराध मानने वाले एक क्रूर औपनिवेशिक कानून का हर तरफ खौफ था।

वहीं, मैम्ब्रो के चाचा सुकुमार की दास्तान भी कम दर्दनाक नहीं है। वह एक अन्य युवक से बेइंतहा प्यार करते थे, लेकिन सामाजिक वर्जनाओं के डर से उन्हें अपनी पूरी जिंदगी उस रिश्ते को दुनिया से छिपाकर रखना पड़ा।

भारत में क्वीयर जीवन की इन तीन अलग-अलग आवाजों को एक ही धागे में पिरोते हुए, यह किताब समलैंगिकता के प्रति बदलते कानूनों और समाज के नजरिए की एक स्पष्ट तस्वीर पेश करती है।

संस्थानों और कार्यस्थलों में समावेश की पहल

प्यार और परिवार की कहानियों से इतर, कुछ किताबें ऐसी भी हैं जो संस्थानों और कार्यस्थलों के संदर्भ में इस समुदाय की पहचान को टटोलने का काम करती हैं। परमेश शाहनी की किताब 'क्वीयरिस्तान: एलजीबीटीक्यू इंक्लूजन इन द इंडियन वर्कप्लेस' इस दिशा में एक शानदार और जमीनी हकीकत बताने वाली पहल है।

यह एचआर पेशेवरों और बड़े अधिकारियों के लिए एक तरह का मेनिफेस्टो है। यह किताब सिखाती है कि भारत में सुरक्षित, न्यायसंगत और लाभदायक कॉर्पोरेट माहौल का निर्माण कैसे किया जाए। लेखक ने धारा 377 के हटने के बाद कॉर्पोरेट दुनिया में एक समलैंगिक पुरुष के रूप में अपनी दशक भर लंबी यात्रा के अनुभव बेहद ईमानदारी से साझा किए हैं।

उन्होंने इस किताब के जरिए कार्यस्थलों पर एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय को शामिल करने की मजबूत वकालत की है। इतना ही नहीं, उन्होंने देश में ऑफिस कल्चर को पूरी तरह से बदलने के लिए बेहतरीन दिशा-निर्देश भी तय किए हैं।

इस किताब में गोदरेज, टाटा स्टील, आईबीएम, विप्रो और द ललित ग्रुप ऑफ होटल्स जैसे उद्योग जगत के दिग्गजों के वास्तविक उदाहरण दिए गए हैं। इन बड़ी कंपनियों ने वर्कप्लेस पर विविधता की ताकत को पहचाना और एलजीबीटीक्यूआईए+ के अनुकूल माहौल बनाकर बड़े आर्थिक और सामाजिक फायदे हासिल किए हैं।

संस्मरण, फिक्शन और नॉन-फिक्शन विधाओं में लिखी गई ये तमाम किताबें भारत में क्वीयर जीवन के बदलते स्वरूप को रेखांकित करती हैं। ये किताबें दिखाती हैं कि कैसे एक कठोर समाज में पूरी तरह से स्वीकृति पाने के लिए उनकी लड़ाई आज भी जारी है। इन्हें पढ़कर हम यह आसानी से समझ सकते हैं कि समय के साथ हमारे समाज में कितना कुछ बदल गया है, और कितना कुछ आज भी बिल्कुल वैसा का वैसा ही है।

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