
नई दिल्ली: निकोबार द्वीप समूह की विभिन्न आदिवासी परिषदों ने स्थानीय प्रशासन के उस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है, जिसमें चुनाव आयोग के जरिए मतदान कराने की बात कही गई है। इन आदिवासी समुदायों का मानना है कि इस नई व्यवस्था से उनके शांत समाज में चुनावी दुश्मनी, विभाजन और आपसी संघर्ष पैदा हो सकता है।
परिषदों ने स्पष्ट किया है कि उनकी मौजूदा स्व-शासन प्रणाली लोकतांत्रिक मूल्यों के अधिक करीब है। उन्होंने नई प्रणाली को अपनी हजारों साल पुरानी और सर्वसम्मति पर आधारित पारंपरिक व्यवस्था में सीधा हस्तक्षेप बताया है।
आदिवासियों के इस कड़े विरोध के बीच, अंडमान और निकोबार प्रशासन ने आगामी 30 जून को श्री विजयापुरम में एक अहम सार्वजनिक बैठक बुलाई है। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य निकोबारी आदिवासी परिषदों के चुनाव के लिए बनाए गए ड्राफ्ट नियमों पर चर्चा करना है।
लिटिल और ग्रेट निकोबार, कामोर्टा (नानकौड़ी) तथा कत्चल द्वीप की आदिवासी परिषदों ने प्रशासन के इस कदम पर अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। बीते महीने प्रशासन द्वारा प्रकाशित किए गए इन ड्राफ्ट नियमों को वापस लेने की पुरजोर मांग इन आदिवासी समुदायों द्वारा की जा रही है।
प्रशासन द्वारा पेश किए गए नए ड्राफ्ट का उद्देश्य निकोबारी गांवों को अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में बांटना है। इसमें परिसीमन, मतदाता सूची तैयार करना और महिलाओं के लिए नेतृत्व के पदों पर आरक्षण की व्यवस्था शामिल है। इसके तहत ग्राम और आदिवासी परिषदों के लिए हर पांच साल में चुनाव कराने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके अलावा, इस ड्राफ्ट में चुनाव कराने की प्रक्रिया, नामांकन, नाम वापसी और चुनाव के प्रशासनिक ढांचे के नियम भी तय किए गए हैं।
गौरतलब है कि ये ड्राफ्ट नियम 15 मई को 2009 के राष्ट्रपति के एक नियमन (Presidential Regulation) के तहत अधिसूचित किए गए थे। इसका मूल उद्देश्य निकोबारी समुदाय को अधिक स्वायत्तता देना था, लेकिन यह जिला प्रशासन को आदिवासी या ग्राम परिषद के किसी भी फैसले पर निरपेक्ष वीटो का अधिकार भी देता है। आपत्तियों और सुझावों के लिए दी गई 30 दिन की समय सीमा अब समाप्त हो चुकी है। इस दौरान प्रशासन को आदिवासी परिषदों के साथ-साथ द्वीप की कांग्रेस पार्टी की ओर से भी विरोध पत्र प्राप्त हुए हैं।
लिटिल और ग्रेट निकोबार की आदिवासी परिषद ने इस कदम को अपनी पारंपरिक और समय की कसौटी पर खरी उतरी व्यवस्था में दखलअंदाजी करार दिया है। ग्रेट निकोबार आदिवासी परिषद ने याद दिलाया कि 15 अगस्त 1947 से ही भारत सरकार के अधिकारी उन्हें यह भरोसा दिलाते रहे हैं कि उनके जीवन जीने के तरीके में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा और केंद्र सरकार उनकी परंपराओं व रीति-रिवाजों की रक्षा करेगी।
इसी कड़ी में कत्चल और कामोर्टा (नानकौड़ी) की परिषदों ने कहा कि उनकी पारंपरिक व्यवस्था ने प्राचीन काल से ही उनके लोगों, संस्कृति और सामाजिक सौहार्द को बचाए रखा है। उनका कहना है कि आज भी उनके गांव आपसी विश्वास और सामूहिक निर्णय लेने की अपनी पुरानी समझ के कारण पूरी तरह से एकजुट हैं।
ग्रेट निकोबार आदिवासी परिषद ने अपनी बात को और मजबूती से रखते हुए कहा कि वे सैकड़ों वर्षों से कप्तानों और परिषदों का चुनाव एक ऐसी प्रक्रिया के जरिए कर रहे हैं, जिसे उन्होंने खुद समय के साथ परिष्कृत किया है। उन्होंने साफ कहा कि न तो उन्होंने कभी ऐसे नए नियमों की मांग की थी और न ही उन्हें इनकी कोई जरूरत है। उनका यह भी आरोप है कि चुनाव की पूरी प्रक्रिया नौकरशाहों के हाथ में सौंपने से आदिवासी परिषदों का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।
इन परिषदों ने इस बात पर भी निराशा जताई कि ड्राफ्ट नियमों में निकोबारी समाज के मुख्य आधार को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है। निकोबारी समाज का यह आधार उनके संयुक्त परिवार और रिश्तेदारी के ढांचे हैं, जिन्हें 'तुहेत' (tuhets), 'होकगनोंक्स' (hokgnonks) या 'कोमनैच' (komanaich) कहा जाता है। इसके साथ ही उन्होंने इन नए ड्राफ्ट नियमों को बेहद जटिल बताते हुए कहा कि निकोबार के लोगों के पास पहले से ही एक ऐसी बेहतरीन प्रणाली है जो उनके लिए बिल्कुल सही काम करती है।
ग्रेट निकोबार की आदिवासी परिषद ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि इस ड्राफ्ट का ज्यादातर हिस्सा निकोबारी समाज की समझ के बिना ही तैयार कर लिया गया है। आदिवासियों के अनुसार यह नए नियम द्वीप समूह में मौजूदा शासन प्रणाली में कोई सुधार नहीं लाते हैं। आदिवासी परिषदें इसे भारतीय संविधान द्वारा उनकी पारंपरिक स्व-शासन प्रणाली को मान्यता देकर दी गई स्वायत्तता को कम करने के एक सीधे प्रयास के रूप में देख रही हैं।
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