
नई दिल्ली: नई ग्रामीण रोजगार योजना यानी 'विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)' या VB GRAM G को शुरू हुए दो महीने का समय बीत चुका है। इतने समय बाद भी पंजीकृत मजदूरों के ई-केवाईसी सत्यापन का आंकड़ा अभी तक केवल 71 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया है।
सरकार ने पहले ही यह साफ कर दिया था कि जिन मजदूरों का महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत ई-केवाईसी हो चुका है, वे सीधे इस नई योजना में काम पाने के हकदार होंगे।
VB GRAM G को देशभर में लागू करने की पूर्व संध्या पर केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक बड़ा भरोसा दिया था। उन्होंने कहा था कि जब तक नए 'ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्ड' जारी नहीं हो जाते, तब तक पुराने ई-केवाईसी वाले जॉब कार्ड पूरी तरह से मान्य रहेंगे। सरकार की कोशिश थी कि मजदूरों को बिना किसी रुकावट के काम मिले और उनकी मजदूरी का भुगतान समय पर होता रहे।
अगर हम सिर्फ सक्रिय मजदूरों की बात करें, यानी ऐसे लोग जिन्होंने पिछले तीन सालों में कम से कम एक बार काम लिया है, तो उनका ई-केवाईसी सत्यापन दर काफी बेहतर है। यह आंकड़ा 94.88 प्रतिशत दर्ज किया गया है। हालांकि, इतनी अधिक दर के बावजूद करीब 57 लाख सक्रिय मजदूर ऐसे हैं जिनका सत्यापन अभी तक नहीं हो सका है।
मंत्रालय ने उन कुछ चुनिंदा मामलों में छूट दी है जहां जॉब कार्ड का ई-केवाईसी नहीं हो पाया है। सरकार लगातार इस बात पर जोर दे रही है कि किसी भी पात्र मजदूर को पीछे नहीं छोड़ा जाएगा। लेकिन इसके साथ ही, नई योजना के तहत काम पाने के लिए ई-केवाईसी सत्यापन को एक अनिवार्य शर्त भी बना दिया गया है।
ई-केवाईसी से वंचित इन सक्रिय मजदूरों की बड़ी संख्या का सीधा असर रोजगार सृजन पर भी पड़ता दिख रहा है। 9 अगस्त 2026 तक के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2026 में VB GRAM G योजना के तहत केवल 7.67 करोड़ मानव-दिवस (पर्सन-डेज) का ही काम पैदा हो सका। यह पिछले साल इसी महीने में मनरेगा के तहत सृजित 15.33 करोड़ मानव-दिवस की तुलना में 49.94 प्रतिशत कम है। आपको बता दें कि 'मानव-दिवस' एक कार्य दिवस में एक व्यक्ति द्वारा किए गए काम की माप की इकाई होती है।
राज्यों की तरफ से ई-केवाईसी पूरा करने की डेडलाइन कई बार मिस की गई है। 'नेशनल कैंपेन फॉर पीपुल्स राइट टू इंफॉर्मेशन' (एनसीपीआरआई) के चक्रधर बुद्ध द्वारा दायर एक आरटीआई से इस मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। इसके मुताबिक, 30 जनवरी को हुई एक बैठक में ग्रामीण विकास मंत्रालय ने राज्यों को नई प्रणाली में बदलाव के तहत एक हफ्ते के भीतर सभी बचे हुए सक्रिय मजदूरों का ई-केवाईसी पूरा करने को कहा था।
इसके बाद 12 फरवरी को राज्यों को फिर से फरवरी अंत तक इस पूरी प्रक्रिया को निपटाने का निर्देश दिया गया। लगभग सात महीने बीत जाने के बाद भी ताजा आंकड़े बताते हैं कि यह लक्ष्य अभी तक हासिल नहीं किया जा सका है।
जमीनी स्तर पर काम लागू होने की धीमी रफ्तार और मंत्रालय की डेडलाइन के बीच का यह भारी फासला कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। इससे मजदूरों के सामने काम पाने में मुश्किलें आने का डर बना हुआ है क्योंकि एक बड़े वर्ग का सत्यापन अभी भी लटका हुआ है।
मनरेगा के तहत सबसे ज्यादा मजदूरों वाले चार प्रमुख राज्यों की बात करें तो तमिलनाडु का प्रदर्शन दोनों श्रेणियों में सबसे शानदार रहा है। वहां 99.32 प्रतिशत सक्रिय मजदूरों और 84.89 प्रतिशत कुल पंजीकृत मजदूरों का ई-केवाईसी पूरा हो चुका है। इसके बाद राजस्थान (95.66% सक्रिय और 69.45% पंजीकृत), उत्तर प्रदेश (94.21% और 58.89%) और आंध्र प्रदेश (90.4% और 82.32%) का नंबर आता है।
पश्चिम बंगाल में सक्रिय मजदूरों का ई-केवाईसी रेट 97.3 प्रतिशत और पंजीकृत मजदूरों का 85.49 प्रतिशत दर्ज किया गया। वहीं, बड़े राज्यों की सूची में बिहार का प्रदर्शन पंजीकृत मजदूरों के मामले में काफी निचले स्तर पर है। बिहार में 89.19 प्रतिशत सक्रिय मजदूरों का ई-केवाईसी हुआ है, जबकि कुल पंजीकृत मजदूरों के मामले में यह आंकड़ा महज 58.05 प्रतिशत ही है।
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