
भोपाल। इंदौर में सीवर की जहरीली गैस ने दो सफाईकर्मियों की जिंदगी छीन ली और एक बार फिर उस कड़वी हकीकत को सामने ला दिया, जिसे कानून और आदेशों के बावजूद खत्म नहीं किया जा सका है। बीते सोमवार (2 मार्च) शाम करीब 6:30 बजे चोइथराम अस्पताल के पास देवी अहिल्याबाई होलकर फल एवं सब्जी मंडी के सामने सीवर की सफाई के दौरान नगर निगम के दो कर्मचारी जहरीली गैस की चपेट में आ गए और दम घुटने से उनकी मौत हो गई। यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है जहां मैनुअल स्कैवेंजिंग पर कानूनी प्रतिबंध और सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बावजूद सफाईकर्मियों को सीवर में उतरने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन कर्मचारियों को सीवर लाइन में उतरने के लिए किसने कहा था और बिना सुरक्षा उपकरणों के ऐसा खतरनाक काम करने की अनुमति किसने दी। जब मशीनों से सफाई अनिवार्य करने और मानव श्रम से सीवर में उतरने पर रोक के स्पष्ट नियम मौजूद हैं, तब भी ऐसी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि जमीनी स्तर पर नियमों का पालन कितना कमजोर है और इसकी कीमत हर साल सफाईकर्मियों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है।
इंदौर में हुई इस झकझोर देने वाली घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस और प्रशासन मौके पर पहुंचा। मामले का संज्ञान लेते हुए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दोनों मृतक कर्मचारियों के परिवारों को 30-30 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। यह मुआवजा सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार दिया जाएगा।
पुलिस के मुताबिक नगर निगम द्वारा चलाए जा रहे सफाई अभियान के दौरान सीवर सक्शन मशीन का एक पाइप टूटकर चैंबर में गिर गया था। पाइप को निकालने के लिए नगर निगम का एक कर्मचारी चैंबर में नीचे उतरा।
जैसे ही वह कर्मचारी सीवर के अंदर पहुंचा, वहां मौजूद जहरीली गैस की चपेट में आकर बेहोश हो गया। उसे बचाने के लिए एक अन्य कर्मचारी भी तुरंत नीचे उतर गया, लेकिन वह भी जहरीली गैस के कारण बेहोश हो गया।
दोनों कर्मचारियों को बाहर निकालने की कोशिश की गई, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। जहरीली गैस के कारण दम घुटने से करण यादव, अजय डोडिया दोनों की मौत हो गई।
अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त सुमित केरकट्टा ने बताया कि राज्य आपदा राहत बल (SDRF) की टीम की मदद से दोनों कर्मचारियों के शवों को बाहर निकाला गया। पुलिस उपायुक्त श्रीकृष्ण लालचंदानी ने मृतकों की पहचान करण यादव और अजय डोडी के रूप में की है।
घटना के बाद सुरक्षा मानकों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। एक प्रत्यक्षदर्शी ने दावा किया कि दोनों सफाई कर्मचारी बिना किसी सुरक्षा उपकरण के ही सीवर चैंबर में उतर गए थे।
प्रत्यक्षदर्शी अमन ने मीडिया से बातचीत में कहा कि जब दोनों कर्मचारी सीवर में उतरे तो उनके पास न तो गैस मास्क था और न ही अन्य सुरक्षा उपकरण। उनका आरोप है कि घटना के बाद भी लंबे समय तक प्रशासनिक मदद नहीं पहुंची।
प्रत्यक्षदर्शी अमन के अनुसार, घटना के लगभग दो घंटे बाद पुलिस, नगर निगम कर्मचारी और एम्बुलेंस मौके पर पहुंचे। इस दौरान वहां मौजूद राहगीरों ने ही दोनों सफाईकर्मियों को बाहर निकालने की कोशिश की, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।
आज देश चंद्रमा और मंगल तक पहुंचने की बात कर रहा है, लेकिन विडंबना यह है कि आज भी हमारे पास सीवर की सुरक्षित सफाई के लिए पर्याप्त और प्रभावी तकनीक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कई जगहों पर सफाई कर्मियों को सीवर में उतरकर काम करना पड़ता है, जो उनकी जान के लिए बेहद खतरनाक है। यह स्थिति तब है जब देश में उन्नत तकनीक होने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं।
असल में कई बार सीवर की सफाई के लिए इस्तेमाल होने वाली प्रेशर पाइपलाइन बड़े पत्थरों या कचरे के कारण फंस जाती है, जिससे जाम पूरी तरह नहीं खुल पाता। ऐसी स्थिति में पत्थरों या अवरोध को हटाने के लिए सफाई कर्मियों को सीवर में उतरना पड़ता है, जहां जहरीली गैस के कारण हादसे हो जाते हैं। सवाल यह है कि इतनी तकनीकी प्रगति के बावजूद अब तक ऐसी मशीनें या सिस्टम क्यों विकसित नहीं किए जा सके, जिनसे सीवर की सफाई बिना किसी इंसान को अंदर उतारे ही सुरक्षित तरीके से हो सके।
घटना पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने गहरा शोक व्यक्त किया है। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से जारी जानकारी के अनुसार दोनों मृतक कर्मचारियों के परिजनों को 30-30 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी।
यह मुआवजा सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश के अनुरूप है जिसमें सीवर या नालियों की सफाई के दौरान होने वाली मौतों के मामलों में मृतक के परिवार को 30 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया गया है। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को मामले की जांच करने और आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए हैं।
मध्यप्रदेश कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता प्रवीण धौलपुरे ने इंदौर सीवर हादसे में मृत सफाई कर्मचारियों के परिवारों को न्याय दिलाने की मांग की है। द मूकनायक से बातचीत में उन्होंने कहा कि मृतक कर्मचारियों के परिजनों को तत्काल 1-1 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता दी जाए और परिवार के एक सदस्य को स्थायी शासकीय नौकरी प्रदान की जाए।
साथ ही घटना में घायल सफाई कर्मचारियों को पूर्णतः निःशुल्क उपचार उपलब्ध कराया जाए और उन्हें 25-25 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाए।
धौलपुरे ने यह भी मांग की कि इस हादसे के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 304A सहित अन्य प्रासंगिक धाराओं में आपराधिक प्रकरण दर्ज कर कठोर कार्रवाई की जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि पीड़ित परिवारों को शीघ्र न्याय और उचित मुआवजा नहीं दिया गया, तो इस मामले को मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से उठाया जाएगा।
गौरतलब है कि बीते साल अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली मौतों के मामलों में मुआवजा तीन सप्ताह के भीतर दिया जाए।
इससे पहले 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि हाथ से मैला ढोने जैसी अमानवीय प्रथा को पूरी तरह खत्म करने के लिए हरसंभव कदम उठाए जाएं। अदालत ने ऐसे मामलों में मुआवजे की राशि 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दी थी।
इन निर्देशों के बावजूद देश के कई हिस्सों में सीवर की सफाई के दौरान मजदूरों की मौत के मामले लगातार सामने आ रहे हैं, जिससे प्रशासनिक लापरवाही और सुरक्षा उपायों की कमी पर सवाल उठते रहे हैं।
इंदौर नगर निगम की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि सेप्टिक टैंक खाली करने के बाद नगरपालिका के वाहन से जल निकासी लाइन के चैंबर में पानी छोड़ा जा रहा था। इसी दौरान दोनों सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई। हालांकि प्रत्यक्षदर्शियों के दावे और नगर निगम के बयान में अंतर दिखाई दे रहा है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर कर्मचारियों को सीवर में उतरने की नौबत क्यों आई और क्या सुरक्षा नियमों का पालन किया गया था या नहीं।
देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग यानी हाथ से मैला ढोने की प्रथा पर पहली बार 1993 में प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बाद वर्ष 2013 में “मैनुअल स्कैवेंजर्स के रोजगार का प्रतिषेध और पुनर्वास अधिनियम” लागू किया गया, जिसके तहत इस प्रथा को पूरी तरह अवैध घोषित किया गया।
इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को सीवर या सेप्टिक टैंक में बिना सुरक्षा और मशीनों के भेजना प्रतिबंधित है। यदि किसी आपात स्थिति में सफाईकर्मी को सीवर के अंदर भेजना पड़े तो इसके लिए 27 प्रकार के सुरक्षा नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
इसके बावजूद कई जगहों पर इन नियमों का पालन नहीं किया जाता, जिसके कारण सीवर सफाई के दौरान श्रमिकों की मौत की घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं।
इंदौर में सीवर की सफाई के दौरान दो सफाई कर्मचारियों की मौत के मामले को लेकर मध्यप्रदेश राज्य सफाई कर्मचारी आयोग ने संज्ञान लिया है। आयोग के अध्यक्ष प्रताप करोसिया ने नगर निगम आयुक्त इंदौर को पत्र लिखकर घटना के संबंध में विस्तृत जांच प्रतिवेदन तत्काल प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। पत्र में कहा गया है कि 2 मार्च 2026 को नगर निगम सीमा क्षेत्र में सीवर/चेंबर की सफाई के दौरान दो सफाई कर्मियों की दर्दनाक मौत अत्यंत गंभीर और चिंताजनक है।
द मूकनायक से बातचीत में आयोग के अध्यक्ष करोसिया ने कहा की हमने अपने पत्र में यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि संबंधित कार्य के दौरान किन-किन सुरक्षा मानकों का पालन किया गया, साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों या ठेकेदारों के खिलाफ की गई अथवा प्रस्तावित कार्रवाई की जानकारी भी दी जाए। इसके अलावा मृतक सफाई कर्मचारियों के परिजनों को दी गई या प्रस्तावित 30-30 लाख रुपये की अनुग्रह राशि तथा उनके पुनर्वास संबंधी कार्यवाही का विवरण भी आयोग को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।
भारत में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली मौतों की घटनाएं हर साल सामने आती रहती हैं। केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार 2019 से 2023 के बीच देशभर में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान करीब 377 लोगों की मौत हुई है। इस आधार पर औसतन हर साल लगभग 70 से 80 सफाईकर्मियों की जान सीवर में जहरीली गैस या दम घुटने से चली जाती है। हालांकि सामाजिक संगठनों का कहना है कि वास्तविक संख्या इससे ज्यादा हो सकती है, क्योंकि कई मामलों की आधिकारिक रिपोर्टिंग नहीं हो पाती।
हाल के वर्षों में भी ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक 2024 में ही सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान कम से कम 100 से अधिक मौतों के मामले दर्ज किए गए। जांच में यह भी पाया गया है कि इन घटनाओं में बड़ी संख्या में सफाईकर्मी बिना सुरक्षा उपकरणों के ही सीवर में उतार दिए जाते हैं। गैस मास्क, ऑक्सीजन सिलेंडर और अन्य सुरक्षा उपकरणों की कमी के कारण जहरीली गैस की चपेट में आकर दम घुटने से उनकी मौत हो जाती है।
इंदौर जैसे स्वच्छता में देशभर में अव्वल शहर में यदि सफाई कर्मियों को ही सुरक्षित काम करने की गारंटी नहीं मिल पा रही है, तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर क्यों आज भी सफाई कर्मचारियों को बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के सीवर में उतरने के लिए मजबूर होना पड़ता है? क्या उनकी जान की कीमत सिर्फ शहर की चमक तक ही सीमित है?
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