विदेश में नौकरी करने वाले औसतन 20 भारतीयों की हर दिन जा रही जान, 5 साल में 37 हजार से अधिक मौतों के डराने वाले आंकड़े

विदेश में नौकरी का दर्दनाक सच: पिछले 5 सालों में 37,740 भारतीय कामगारों की मौत, खाड़ी देशों में हालात सबसे ज्यादा खराब।
Indian workers death abroad.
विदेश में नौकरी करने गए 37000+ भारतीयों की पिछले 5 साल में मौत। हर दिन औसतन 20 कामगारों ने गंवाई जान।(Ai Image)
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नई दिल्ली: विदेशों में काम करने वाले भारतीय कामगारों की स्थिति को लेकर बेहद परेशान करने वाले आंकड़े सामने आए हैं। पिछले पांच वर्षों के दौरान हर दिन औसतन 20 से अधिक भारतीयों ने विदेशी धरती पर अपनी जान गंवाई है। इनमें से सबसे ज्यादा मौतें खाड़ी देशों में दर्ज की गई हैं।

विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने 29 जनवरी को राज्यसभा में एक लिखित जवाब में इस बात की आधिकारिक जानकारी दी। उनके द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, साल 2021 से 2025 के बीच विदेशों में कुल 37,740 भारतीय कामगारों की मौत हुई है। हालांकि, इन मौतों के पीछे के स्पष्ट कारणों का कोई विस्तृत ब्यौरा नहीं दिया गया है।

सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो सबसे अधिक मौतें 2021 में हुईं, जब 8,234 भारतीय श्रमिकों की विदेशों में जान चली गई। इसके बाद 2022 में यह आंकड़ा थोड़ा कम होकर 6,614 पर आ गया था।

गिरावट के बाद मौतों की संख्या में फिर से लगातार वृद्धि देखी गई है। यह आंकड़ा 2023 में 7,291, साल 2024 में 7,747 और 2025 में बढ़कर 7,854 तक पहुंच गया।

इन कुल मौतों में से 86 प्रतिशत से अधिक केवल खाड़ी देशों में हुई हैं। इन पांच वर्षों की अवधि में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और सऊदी अरब में सबसे अधिक मौतें दर्ज की गईं। यूएई में 12,380 और सऊदी अरब में 11,757 कामगारों की जान गई।

इसके बाद कुवैत में 3,890, ओमान में 2,821, मलेशिया में 1,915 और कतर में 1,760 भारतीय नागरिकों की मौत हुई।

इसी अवधि के दौरान विदेशों में मौजूद भारतीय मिशनों को दुर्व्यवहार, शोषण और कार्यस्थल से जुड़ी 80,985 शिकायतें मिलीं। साल 2021 से 2025 के बीच सबसे अधिक 16,965 शिकायतें यूएई से दर्ज की गई हैं। इसके बाद कुवैत से 15,234, ओमान से 13,295 और सऊदी अरब से 12,988 शिकायतें प्राप्त हुईं।

कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (सीएचआरआई) द्वारा सूचना के अधिकार (आरटीआई) और संसदीय रिकॉर्ड के विश्लेषण पर आधारित 2018 की एक रिपोर्ट में भी ऐसे ही दावे किए गए थे। उस रिपोर्ट के अनुसार, 2012 से 2018 के मध्य तक खाड़ी क्षेत्र में प्रतिदिन लगभग 10 भारतीय कामगारों की मौत होती थी।

सीएचआरआई के उस विश्लेषण में यह बात सामने आई थी कि उस साढ़े छह साल की अवधि में छह खाड़ी देशों में कम से कम 24,570 भारतीय श्रमिकों ने अपनी जान गंवाई थी। इन देशों में बहरीन, ओमान, कतर, कुवैत, सऊदी अरब और यूएई शामिल थे।

इसकी तुलना में ताजा सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2021 से 2025 के बीच खाड़ी देशों में 32,608 भारतीय कामगारों की मौत हुई। इस आंकड़े में बहरीन शामिल नहीं है क्योंकि राज्यसभा में दिए गए जवाब में वहां के आंकड़े मौजूद नहीं थे।

इस नए आंकड़े का सीधा अर्थ यह है कि पिछले पांच वर्षों में केवल खाड़ी क्षेत्र में ही हर दिन औसतन करीब 18 भारतीय श्रमिकों की मौत हुई है।

खाड़ी क्षेत्र के बाहर भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। मलेशिया और मालदीव में भी श्रम से जुड़े कई मामले दर्ज किए गए हैं। इन दोनों देशों से क्रमशः 8,333 और 2,981 शिकायतें सामने आई हैं।

इस बीच दक्षिण पूर्व एशियाई देशों से मौतों के कम मामले सामने आने के बावजूद बड़ी संख्या में शिकायतें दर्ज की गईं। खास तौर पर साल 2024 और 2025 में इन देशों से मिलने वाली शिकायतों में भारी उछाल देखा गया।

म्यांमार में इन पांच वर्षों में किसी भी कामगार की मौत नहीं हुई, लेकिन वहां से 2,548 शिकायतें जरूर दर्ज की गईं। इनमें से अकेले 2025 में ही 1,863 शिकायतें मिलीं।

इसी तरह कंबोडिया में 31 मौतों के साथ 2,531 शिकायतें आईं, जबकि लाओस में 11 मौतों और 2,416 शिकायतों के मामले सामने आए।

पिछले पांच वर्षों में श्रम संबंधी समस्याओं की रिपोर्ट में लगातार वृद्धि हुई है। साल 2021 में यह आंकड़ा 11,632 था, जो 2024 में बढ़कर 16,263 हो गया। वहीं 2025 में यह लगभग दोगुना होकर 22,479 के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।

मंत्रालय के जवाब के मुताबिक विदेशों में भारतीय मजदूरों को सबसे ज्यादा जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, उनमें वेतन मिलने में देरी या उसका ना मिलना शामिल है। इसके अलावा सेवा समाप्ति के बाद मिलने वाले लाभों का भुगतान ना होना भी एक बड़ी समस्या है।

अन्य आम शिकायतों में नियोक्ताओं द्वारा बिना अनुमति के पासपोर्ट अपने पास रख लेना, छुट्टियां न देना और बिना ओवरटाइम पैसे दिए लंबे समय तक काम कराना शामिल है। कंपनियों के अचानक बंद होने के कारण बेरोजगारी की समस्या भी बड़े पैमाने पर सामने आई है।

मंत्रालय ने दुर्व्यवहार, वैध श्रम अधिकारों से वंचित करने और अनुबंध पूरा होने पर भारत लौटने के लिए एग्जिट वीजा देने से इनकार करने जैसी घटनाओं का भी संज्ञान लिया है।

इस समस्या के समाधान के लिए उठाए गए कदमों का विवरण देते हुए मंत्री ने स्पष्ट किया कि विदेशों में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और भलाई सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

उन्होंने बताया कि संकट में फंसे किसी भी भारतीय नागरिक के बारे में सूचना मिलते ही दूतावास और मिशन तुरंत हरकत में आते हैं। वे संबंधित देश के स्थानीय विदेश मंत्रालय, श्रम विभाग और कानून प्रवर्तन एजेंसियों से तुरंत संपर्क करते हैं।

इसके साथ ही सरकार की तरफ से कानूनी और दूतावास संबंधी सहायता भी प्रदान की जाती है। भारत सरकार ने भारतीय कामगारों के विशेष हितों की रक्षा के लिए कई मेजबान देशों के साथ श्रम और जनशक्ति सहयोग को लेकर महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर भी किए हैं।

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