
हरियाणा: अखिल भारतीय फेडरेशन के आह्वान पर सोमवार को पूरे हरियाणा में मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (आशा वर्कर्स) ने अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरकर जोरदार प्रदर्शन किया। ये महिलाएं बेहतर वेतन, नौकरी की सुरक्षा और सम्मानजनक काम के हालात सुनिश्चित करने की मांग कर रही हैं।
फरीदाबाद सहित राज्य के कई अन्य जिलों में आशा वर्कर्स यूनियन, हरियाणा की सदस्यों ने अपना भारी रोष व्यक्त किया। इस दौरान उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के नाम एक ज्ञापन भी सौंपा, जिसमें उनकी सभी प्रमुख समस्याओं और मांगों का विस्तार से जिक्र किया गया है।
यूनियन के नेताओं ने याद दिलाया कि लाखों आशा वर्कर्स ने कोविड-19 महामारी के दौरान अपनी जान की परवाह किए बिना दिन-रात अग्रिम मोर्चे पर रहकर समाज की सेवा की थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी उनके इस अतुलनीय योगदान को सराहा था।
इतने महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद, उन्हें नियमित वेतन के बजाय मात्र मामूली मानदेय दिया जाता है। इस कारण वे लगातार आर्थिक असुरक्षा और शोषण का शिकार हो रही हैं।
प्रदर्शनकारियों ने केंद्र और राज्य की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली सरकारों पर तीखा प्रहार किया। उनका कहना था कि जब महिला स्वास्थ्य कर्मियों को ही खराब वेतन और असुरक्षित रोजगार का सामना करना पड़ रहा है, तो ऐसे में 'बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ' का नारा पूरी तरह से खोखला साबित होता है। इस बड़े आंदोलन को सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) ने भी अपना पूर्ण समर्थन दिया है।
अपनी मांगों को लेकर यूनियन ने आगामी 21 जुलाई को पंचकूला में राज्य स्तरीय विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया है। इसके साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे 10 अगस्त को एक बड़ा 'जेल भरो' आंदोलन शुरू करेंगी।
इस पूरे विरोध प्रदर्शन के केंद्र में 11 सूत्रीय मांग पत्र है। कार्यकर्ताओं की सबसे प्रमुख मांग यह है कि केंद्र सरकार द्वारा साल 2025 में आशा वर्कर्स के लिए घोषित की गई 1,500 रुपये की प्रोत्साहन राशि में वृद्धि को तुरंत लागू किया जाए।
उन्होंने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) को एक स्थायी कार्यक्रम बनाने की भी पुरजोर वकालत की है। उनका तर्क है कि इससे आशा वर्करों को आसानी से सरकारी कर्मचारी का दर्जा मिल सकेगा।
इसके अलावा, पूरे देश में एक समान कार्य परिस्थितियां लागू करने की मांग उठी है। महिलाओं ने छह महीने का सवैतनिक मातृत्व अवकाश, 20 दिन की वार्षिक छुट्टी और सभी आशा वर्करों के लिए मुफ्त चिकित्सा देखभाल की सुविधा मांगी है।
यूनियन ने मनमाने ढंग से नौकरी से निकाले जाने के खिलाफ कड़े सुरक्षा उपायों की भी मांग की है। उनका कहना है कि पेंशन के योग्य होने से पहले किसी भी कर्मचारी को सेवा से न हटाया जाए और सेवानिवृत्ति की आयु 65 वर्ष तय की जाए।
सौंपे गए ज्ञापन में सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति को लेकर व्यापक चिंताएं भी जताई गई हैं। सरकार से आग्रह किया गया है कि वह सरकारी अस्पतालों सहित सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे के निजीकरण पर तुरंत रोक लगाए। इसके बजाय, देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को और अधिक मजबूत किया जाना चाहिए।
यूनियन ने मजदूर विरोधी करार देते हुए चार श्रम संहिताओं को रद्द करने की मांग भी उठाई है। उन्होंने आशा वर्करों को भी श्रम कानूनों के दायरे में पूरी तरह शामिल करने की वकालत की।
यूनियन नेताओं ने सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि यदि उनकी इन जायज मांगों पर जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो आने वाले हफ्तों में यह आंदोलन और भी उग्र रूप ले लेगा।
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