भोपाल में न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर BJP कार्यालय पहुंचे कर्मचारी, 3 से 8 हजार में काम कराने का आरोप

‘न्यूनतम वेतन दिलाओ उपवास आंदोलन’ के तहत कर्मचारियों ने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष को दिलाई 2003 की घोषणा की याद, 11 वर्गों के कर्मचारी आंदोलन में शामिल
भोपाल में न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर BJP कार्यालय पहुंचे कर्मचारी, 3 से 8 हजार में काम कराने का आरोप
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भोपाल। न्यूनतम वेतन की मांग को लेकर मध्य प्रदेश के अस्थायी, अंशकालीन, चौकीदार और ठेका श्रमिक सोमवार को भोपाल स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय पहुंचे। कर्मचारियों ने कार्यालय परिसर में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिमा के सामने धरना देकर नारेबाजी की। कर्मचारियों ने अपने आंदोलन को ‘न्यूनतम वेतन दिलाओ उपवास आंदोलन’ नाम दिया है। आंदोलनकारियों का कहना है कि प्रदेश में बड़ी संख्या में कर्मचारियों से बेहद कम मानदेय पर काम कराया जा रहा है, जबकि सरकार की ओर से घोषित न्यूनतम मजदूरी इससे कहीं अधिक है।

12,425 से 16,769 रुपये न्यूनतम मजदूरी, हजारों में भुगतान का दावा

अस्थायी, आउटसोर्स कर्मचारी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष वासुदेव शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार ने अलग-अलग श्रेणियों के लिए न्यूनतम मजदूरी 12,425 से 16,769 रुपये प्रति माह तक निर्धारित की है। उनका आरोप है कि इसके बावजूद सरकार के विभिन्न विभागों में कर्मचारियों से 3 से 5 हजार रुपये प्रतिमाह तक में काम कराया जा रहा है। शर्मा के मुताबिक औद्योगिक क्षेत्रों में भी कई ठेका श्रमिकों को निर्धारित न्यूनतम मजदूरी का पूरा भुगतान नहीं किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि कम वेतन के कारण अस्थायी, अंशकालीन और ठेका कर्मचारियों में लगातार असंतोष बढ़ रहा है। आंदोलन की पूर्व सूचना भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल को पत्र के माध्यम से दी गई थी।

11 वर्गों के कर्मचारी आंदोलन में शामिल

वासुदेव शर्मा के अनुसार आंदोलन में करीब 11 अलग-अलग वर्गों के कर्मचारी शामिल हैं। इनमें ग्राम पंचायतों के चौकीदार, पंप ऑपरेटर, भृत्य, सफाईकर्मी और लोकल यूथ सर्वेयर शामिल हैं। उनका दावा है कि कुछ कर्मचारियों को महज 2 से 3 हजार रुपये प्रतिमाह का भुगतान किया जा रहा है।

शिक्षा विभाग और जनजातीय कार्य विभाग के स्कूलों तथा छात्रावासों में काम करने वाले अंशकालीन और अस्थायी कर्मचारी भी आंदोलन में शामिल हैं। शर्मा का आरोप है कि इन कर्मचारियों से 10 से 12 घंटे तक काम लिया जाता है, लेकिन इसके बदले उन्हें करीब 4 से 5 हजार रुपये महीना ही मिलता है।

अलग-अलग विभागों में कम वेतन का दावा

आंदोलनकारियों के अनुसार स्कूलों, छात्रावासों और आयुष विभाग में काम करने वाले अंशकालीन और अस्थायी कर्मचारियों को 4 से 5 हजार रुपये प्रतिमाह मिलते हैं। ग्राम पंचायतों के चौकीदार, पंप ऑपरेटर, भृत्य और सफाईकर्मियों को 3 से 4 हजार रुपये, जबकि स्वास्थ्य विभाग के चतुर्थ श्रेणी आउटसोर्स कर्मचारियों को 7 से 8 हजार रुपये महीने का भुगतान किए जाने का दावा किया गया है।

राजस्व विभाग में काम करने वाले लोकल यूथ सर्वेयर को करीब 1 हजार रुपये, आदिवासी पंचायतों में कार्यरत पेसा मोबिलाइजर को 4 हजार रुपये और कोटवारों को 2 से 5 हजार रुपये प्रतिमाह मिलने की बात कही गई है। आंदोलनकारियों का यह भी आरोप है कि कोटवारों की सेवा भूमि वापस ली जा रही है।

इसके अलावा स्कूलों में मध्याह्न भोजन से जुड़े कार्यकर्ताओं को करीब 4 हजार रुपये, मनरेगा के तहत काम करने वाले मेट श्रमिकों को 2 हजार रुपये से भी कम, जबकि योग सहायकों और प्रशिक्षकों को करीब 4,500 रुपये प्रतिमाह मिलने का दावा किया गया है। आंदोलनकारियों ने कहा कि कुछ स्वच्छताग्राहियों को बिना वेतन भुगतान किए ही हटा दिया गया है।

औद्योगिक क्षेत्रों के ठेका श्रमिक भी उठाएंगे आवाज

आंदोलनकारियों ने औद्योगिक क्षेत्रों, पावर प्लांट और सीमेंट उद्योगों में काम करने वाले ठेका श्रमिकों का मुद्दा भी उठाया। उनका आरोप है कि इन क्षेत्रों में भी श्रमिकों को निर्धारित न्यूनतम मजदूरी का पूरा भुगतान नहीं किया जा रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि न्यूनतम वेतन के साथ रोजगार की स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को पत्र लिखकर 2003 की घोषणा याद दिलाई

वासुदेव शर्मा ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल को भेजे पत्र में वर्ष 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती की ओर से की गई न्यूनतम वेतन संबंधी घोषणा का हवाला दिया है। पत्र में कहा गया है कि प्रदेश की मेहनतकश जनता वर्ष 2003 से लगातार भाजपा सरकार को चुनती आ रही है, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में कर्मचारियों को स्थायी रोजगार और सम्मानजनक वेतन नहीं मिल सका है।

पत्र में दावा किया गया है कि पिछले 23 वर्षों में चपरासी तक की स्थायी सरकारी नौकरियां पर्याप्त संख्या में नहीं दी गईं। आंदोलनकारियों का आरोप है कि तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की कई नौकरियों को अस्थायी और आउटसोर्स व्यवस्था में बदल दिया गया है।

गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के युवाओं के लिए थीं ये नौकरियां

आंदोलनकारियों ने अपने पत्र में कहा है कि तृतीय और चतुर्थ श्रेणी की सरकारी नौकरियां गरीब, मजदूर, दलित, आदिवासी, ओबीसी और मध्यमवर्गीय परिवारों के युवाओं के लिए रोजगार का महत्वपूर्ण माध्यम थीं। उनके मुताबिक अस्थायी और आउटसोर्स व्यवस्था में कर्मचारियों को रोजगार की स्थिरता, सेवा सुरक्षा और सम्मानजनक वेतन नहीं मिल पा रहा है।

कर्मचारियों ने भाजपा नेतृत्व से मांग की है कि न्यूनतम वेतन के प्रावधान को प्रभावी तरीके से लागू कराया जाए और सरकारी विभागों के साथ-साथ ठेका व्यवस्था में काम कर रहे श्रमिकों को भी निर्धारित मजदूरी का भुगतान सुनिश्चित किया जाए।

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