'इस नौकरी में एक पैसा नहीं बचता': 862 रुपये की दिहाड़ी और डीटीसी बस ड्राइवरों की बेबसी, हड़ताल का तीसरा दिन

862 रुपये की दिहाड़ी, बिना छुट्टी की नौकरी और ट्रैफिक का तनाव... दिल्ली में डीटीसी बस ड्राइवरों की हड़ताल तीसरे दिन भी जारी, जानिए इनका दर्द।
DTC bus strike
दिल्ली में DTC बस ड्राइवरों की हड़ताल तीसरे दिन भी जारी है। सिर्फ 862 रुपये की दिहाड़ी और बिना छुट्टी की नौकरी में ड्राइवरों का क्या हाल है?फोटो साभार- इंटरनेट
Published on

नई दिल्ली: 862 रुपये, दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) का एक बस ड्राइवर दिन भर में बस इतनी ही कमाई कर पाता है। कई ड्राइवरों के लिए तो महीना खत्म होने से काफी पहले ही यह रकम खत्म हो जाती है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जोगिंदर सिंह जैसे कुछ लोगों के लिए, काम पर जाने का खर्च ही इस आय का एक बड़ा हिस्सा निगल जाता है। वहीं अन्य लोगों का वेतन घर के खर्चों, कर्ज और रोजमर्रा की जरूरतों के बीच बंटकर रह जाता है।

यह गणित गुरुवार को दिल्ली के लगभग सभी बस डिपो में देखने को मिला। अपनी मांगों को लेकर दस हजार से अधिक ड्राइवर लगातार तीसरे दिन हड़ताल पर रहे। इसके चलते डीटीसी की 6,840 सार्वजनिक बसें डिपो में ही खड़ी रहीं और सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा।

हड़ताल पर बैठे इन ड्राइवरों की मांग है कि उनकी सेवा शर्तों में सुधार किया जाए। इसमें 2,000 रुपये की न्यूनतम दैनिक मजदूरी, सालाना बोनस, सरकारी छुट्टियों पर काम करने का भुगतान और चिकित्सा बीमा जैसी बुनियादी चीजें शामिल हैं।

परिवहन मंत्री पंकज सिंह ने गुरुवार को बयान दिया कि वेतन वृद्धि को छोड़कर ड्राइवरों की अन्य सभी मांगें मान ली गई हैं।

उन्होंने बताया कि उनकी ड्राइवरों से मुलाकात हुई है। चिकित्सा सुविधाओं, छुट्टी, अतिरिक्त किलोमीटर चलाने के मुआवजे या किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना की स्थिति में परिवार के सदस्य को रोजगार देने जैसी मांगों को कंसेशनेयर ने स्वीकार कर लिया है।

परिवहन मंत्री ने यह भी भरोसा दिलाया कि श्रम विभाग से परामर्श करने के बाद वेतन वृद्धि पर भी उचित फैसला लिया जाएगा।

हालांकि, डीटीसी कर्मचारी एकता यूनियन के अध्यक्ष ललित चौधरी ने इस दावे को खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार के साथ बातचीत में ड्राइवरों की एक भी मांग पूरी नहीं हुई है, इसलिए शुक्रवार को भी हड़ताल जारी रहेगी।

वजीरपुर डिपो के हालात भी कुछ ऐसे ही थे, जहां 150 बसें खड़ी थीं और ड्राइवर बाहर गद्दे बिछाकर बैठे थे। इन्हीं में 36 वर्षीय जोगिंदर सिंह भी शामिल थे, जो पिछले तीन साल से डीटीसी के लिए गाड़ी चला रहे हैं।

वह हर दिन झज्जर से दिल्ली आते हैं, जिस पर रोज 80 रुपये का खर्च आता है। सिंह बताते हैं कि उन्हें अपने दो बच्चों की परवरिश करनी है, जिनकी स्कूल फीस 2,500 से 3,000 रुपये प्रति माह है। हर दिन काम पर जाने का सफर भी उनके मासिक बजट पर भारी पड़ता है।

वजीरपुर और नंद नगरी के बीच तीन चक्कर लगाते हुए सिंह रोज लगभग 105 किलोमीटर बस चलाते हैं। उनका कहना है कि महीने के अंत तक उनके हाथ खाली हो जाते हैं और अपनी मोटरबाइक की ईएमआई चुकाने के लिए उन्हें दोस्तों से पैसे मांगने पड़ते हैं।

जीटी करनाल डिपो का नजारा भी अलग नहीं था। वहां 121 बसें खड़ी थीं और ड्राइवर बाहर धरने पर थे।

28 वर्षीय आशु पांचाल हर दिन अपनी बाइक से सोनीपत से काम पर आते हैं। वह बताते हैं कि उनके सफर में ही 150 से 200 रुपये का पेट्रोल लग जाता है, और इतनी लंबी यात्रा बाइक के रखरखाव का खर्च भी बढ़ा देती है।

पांचाल आजादपुर और नेहरू प्लेस के बीच रूट नंबर 442 पर बस चलाते हैं। उन्होंने बताया कि दोपहर के भोजन और चाय-नाश्ते पर उनका रोज 100 रुपये खर्च होता है। इसके अलावा घर के लिए सब्जियां और राशन खरीदने में 200 से 300 रुपये और लग जाते हैं।

महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय से स्नातक पांचाल घर लौटते समय एक गिग राइड प्लेटफॉर्म पर भी काम करते हैं। वह जल्द ही एक ई-कॉमर्स व्यवसाय शुरू करने की योजना बना रहे हैं और काम जमते ही इस नौकरी को छोड़ने का मन बना चुके हैं।

राजघाट डिपो 1 पर मौजूद 36 वर्षीय इमरान अल्वी पिछले पांच वर्षों से डीटीसी बस चला रहे हैं। वह सवाल करते हैं कि आज के दौर में 862 रुपये की क्या अहमियत है। बाजार में थोड़ा सा भी सामान खरीदने जाओ, तो 1,500 रुपये से ज्यादा का बिल बन जाता है।

अल्वी मयूर विहार 3 और लाडो सराय के बीच गाड़ी चलाते हैं, जो दिल्ली की सबसे व्यस्त सड़कों में से एक है।

उनका कहना है कि बस में मामूली सी खरोंच या नुकसान की कीमत भी ड्राइवरों को ही चुकानी पड़ती है। बड़ी बसें और दिल्ली की भीड़भाड़ के बीच अगर कोई पीछे से टक्कर मार दे या शीशा टूट जाए, तो वेतन से सीधे 500 रुपये काट लिए जाते हैं।

इसी डिपो में करीब 50 ड्राइवर मंगलवार से अपने विश्राम कक्ष में डेरा डाले हुए हैं।

दो दशकों से अधिक समय से सार्वजनिक बसें चला रहे 56 वर्षीय सुनील कुमार ने शादीपुर डिपो में काम करने की खराब परिस्थितियों पर अपनी बात रखी।

कुमार ने कहा कि दिल्ली में बस चलाना बेहद तनावपूर्ण है और इसके लिए असली कौशल की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद उनके साथ दिहाड़ी मजदूरों जैसा व्यवहार किया जाता है।

उन्हें न तो कोई छुट्टी मिलती है और न ही काम पर न आने वाले दिन का वेतन। दुर्घटना या बीमारी की स्थिति में कोई बीमा भी नहीं है। अगर किसी ड्राइवर की जान चली जाती है या वह घायल हो जाता है, तो सभी साथी पैसे इकट्ठा करके उसके इलाज का खर्च उठाते हैं।

कुमार ने अपने दो बेटों की शिक्षा के लिए कर्ज लिया है, जिनमें से एक स्कूल में है और दूसरा बीटेक कर रहा है। ईएमआई चुकाने के लिए उन्हें दोस्तों और परिवार से उधार लेना पड़ता है और उन्हें नहीं पता कि वे इसे कैसे चुकाएंगे। उनका दर्द भी यही है कि यह नौकरी उनके पास एक पैसा भी नहीं छोड़ती।

उन्होंने बताया कि प्रोत्साहन राशि (इंसेंटिव) कमाना भी बेहद मुश्किल है। ड्राइवरों को सभी निर्धारित स्टॉप पर रुकना होता है और एक निश्चित समय के भीतर रूट पूरा करना होता है। दिल्ली के ट्रैफिक में यह बिल्कुल असंभव है।

सुबह की शिफ्ट वालों को समय सीमा पूरी करने पर 50 रुपये और शाम की शिफ्ट वालों को 100 रुपये मिलते हैं। कुमार के मुताबिक, ज्यादातर ड्राइवर इस लक्ष्य को कभी हासिल ही नहीं कर पाते हैं।

DTC bus strike
कभी चुनाव नहीं लड़े पेरियार, फिर भी तमिलनाडु की हर राजनीतिक पार्टी क्यों जपती है उनका नाम?
DTC bus strike
2027 के रण में दौड़ लगाने को तैयार अखिलेश यादव का ‘पीडीए रथ’, नए अवतार में लखनऊ पहुंचा
DTC bus strike
मणिपुर तनाव: कुकी-ज़ो काउंसिल का केंद्र को सख्त अल्टीमेटम, 10 अक्टूबर तक मांगें न मानीं तो होगा उग्र आंदोलन

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

द मूकनायक को सब्सक्राइब करें

'द मूकनायक' जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है। अगर आप भी चाहते हैं कि 'द मूकनायक' हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहें तो सब्सक्राइब करें।

यहां सब्सक्राइब करें
The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com