कभी चुनाव नहीं लड़े पेरियार, फिर भी तमिलनाडु की हर राजनीतिक पार्टी क्यों जपती है उनका नाम?

डीएमके, एआईएडीएमके से लेकर बीजेपी तक... तमिलनाडु की हर पार्टी क्यों करती है पेरियार की विचारधारा का दावा? जानिए उनके सियासी प्रभाव की पूरी कहानी।
पेरियार
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पेरियार ई.वी. रामासामी का प्रभाव आज भी तमिलनाडु की सियासत में गहराई से पैठा हुआ है। राज्य के तमाम राजनीतिक दल अपनी प्रासंगिकता और ऐतिहासिक जुड़ाव साबित करने के लिए उनके नाम का सहारा लेते हैं।

हालांकि, कई पार्टियां उनके सामाजिक सिद्धांतों को तो अपनाती हैं, लेकिन उनके नास्तिकता और कट्टर विचारों से दूरी बनाए रखती हैं। इसके बावजूद, सामाजिक न्याय और आरक्षण को लेकर उनकी वकालत आज भी राजनीति का एक मुख्य आधार बनी हुई है और समानता से जुड़े उनके सवाल आज भी व्यापक रूप से गूंजते हैं।

पेरियार ई.वी. रामासामी ने अपने जीवन में कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा। फिर भी, उनके निधन के पांच दशक बाद, तमिलनाडु के हर चुनाव में उनका नाम प्रमुखता से उभरकर सामने आता है।

राजनीतिक विचारधारा के हर छोर पर खड़ी पार्टियां, जिनके बीच शायद ही कोई समानता हो, सार्वजनिक तौर पर इस तर्कवादी नेता को अपना आदर्श बताती हैं।

जब कुछ साल पहले सी. जोसेफ विजय ने अपनी पार्टी 'टीवीके' (TVK) लॉन्च की, तो उन्होंने पेरियार को पार्टी के 'वैचारिक मार्गदर्शक' के रूप में पेश किया। डीएमके (DMK) और एआईएडीएमके (AIADMK) भी हमेशा यह दावा करती आई हैं कि उनकी मूल विचारधारा पेरियार से ही प्रेरित है। वहीं, सीपीआई (CPI) पेरियार के सामाजिक सुधार आंदोलन, विशेषकर अंतरजातीय विवाह पर उनके विचारों का पुरजोर समर्थन करती है।

चाहे उनके विचारों को ढालना हो या अपनाना, उनका समर्थन करना हो या चुनौती देना, हर दल इस तर्कवादी नेता की विरासत पर अपना दावा ठोकता है। लेकिन यह सब वे अपनी खुद की राजनीतिक शर्तों पर करते हैं।

जून में विधानसभा के भीतर विजय ने यह स्पष्ट किया कि टीवीके ने पेरियार के सामाजिक सिद्धांतों को जरूर अपनाया है, लेकिन वे उनके नास्तिकता वाले विचारों से सहमत नहीं हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि उन्होंने पेरियार की शिक्षाएं ली हैं, लेकिन साथ ही वे भगवान में विश्वास भी रखते हैं।

मार्च में, भाजपा की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तमिलिसाई सुंदरराजन ने मदुरै में एनडीए की एक बैठक के प्रवेश द्वार से पेरियार की तस्वीर हटाए जाने को सही ठहराया था। फिर भी, वह महिलाओं को आज मिली आज़ादी का श्रेय पेरियार के महिला अधिकार आंदोलनों को ही देती हैं।

तमिलिसाई का कहना है कि उनकी पार्टी 'पेरियार मन्न' (पेरियार की मिट्टी) वाक्यांश को स्वीकार नहीं करती। उनके अनुसार, यह पेरियालवार (दक्षिण भारत के 12 अलवर संतों में से एक) और अंदाल (एकमात्र महिला तमिल संत) की भी मिट्टी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सामाजिक न्याय जितना ही महत्व धर्म और आध्यात्मिकता का भी है।

राजनीतिक इतिहासकार और पेरियार के जीवनी लेखक आर. कन्नन के मुताबिक, पेरियार आज भी एक 'स्थायी वैचारिक मानदंड' बने हुए हैं। कन्नन कहते हैं कि पेरियार कभी वोट बटोरने वाला नाम नहीं हो सकते, क्योंकि उन्होंने कभी चुनावी पद नहीं चाहा।

हालांकि, सी.एन. अन्नादुरई ने पेरियार के आंदोलन में लंबा समय बिताया था। उन्होंने ही उस सामाजिक सुधार की राजनीति को डीएमके के जरिए चुनावी लामबंदी का रूप दिया। कन्नन आगे बताते हैं कि पेरियार का नाम जपने का मतलब उनकी पूरी विचारधारा को अपनाना नहीं है, बल्कि पार्टियां सिर्फ यह स्थापित करना चाहती हैं कि उनकी राजनीति तमिलनाडु के इतिहास का अहम हिस्सा है।

ठीक वैसे ही जैसे कांग्रेस गांधी का नाम लेती है, तमिलनाडु की पार्टियां पेरियार को एक ऐसे प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करती हैं, जो उनकी राजनीतिक पहचान और 'तमिल-प्रथम' की वैधता को मजबूती देता है। इसी कारण से चुनावी राजनीति में आने के बाद भी पेरियार का आंदोलन एक वैचारिक संदर्भ बिंदु बना रहा।

राजनीतिक रणनीतिकारों का मानना ​​है कि पेरियार का यह प्रभाव 20वीं सदी की शुरुआत के उस जातिगत पदानुक्रम से जुड़ा है, जब सरकारी नौकरियों, शिक्षा और प्रशासन में भारी असमानता थी। इस असंतुलन को दूर करने की नींव 1916 में बनी जस्टिस पार्टी ने रखी थी।

बाद में इस आंदोलन का समर्थन करने वाले पेरियार ने 1925 में 'आत्म-सम्मान आंदोलन' शुरू करके इसे एक कदम और आगे बढ़ा दिया। इस आंदोलन ने जाति, पितृसत्ता और धार्मिक रूढ़िवाद को सीधी चुनौती दी थी।

जस्टिस पार्टी ने 1921 में पहला सांप्रदायिक सरकारी आदेश (GO) पारित किया था, जिसका मकसद प्रांतीय सरकारी सेवाओं में गैर-ब्राह्मण समुदायों की हिस्सेदारी बढ़ाना था। जब 1950 में सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया, तो पेरियार ने इसे बहाल करने की मांग को लेकर बड़े आंदोलन का नेतृत्व किया।

इसी भारी राजनीतिक दबाव के कारण 1951 में पहला संवैधानिक संशोधन हुआ, जिसमें अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया। इससे सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों, ईसाइयों, मुसलमानों, दलितों और आदिवासी समुदायों के लिए आरक्षण का रास्ता साफ हो सका।

डीके (DK) के कोषाध्यक्ष वी. कुमारेशन के लिए, यही ऐतिहासिक उपलब्धि वह मुख्य कारण है जिससे राजनीतिक पार्टियां पेरियार से बच नहीं सकतीं। उनके अनुसार, जो बात सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व से शुरू हुई थी, वह सामाजिक न्याय में बदल गई। इसके बाद, जो भी पार्टी सत्ता में आई, वह सामाजिक न्याय को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठा सकती थी।

राजनीतिक इतिहासकार राजन कुरै कृष्णन बताते हैं कि इस तर्कवादी नेता का प्रभाव केवल नीतिगत मांगों तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने राजनीतिक मांगें रखने की भाषा ही बदल दी थी। कृष्णन कहते हैं कि पेरियार का मानना था कि आत्म-सम्मान और सवाल करना एक ही बात है। पेरियार ने सिखाया कि हर इंसान बराबर है, जो बाद में एक बड़ा राजनीतिक मूल्य बन गया।

डीएमके आज भी खुद को पेरियार के सिद्धांतों के करीब मानती है, लेकिन अन्य दलों की तरह वह भी उन्हें स्वीकारने के लिए नास्तिकता की शर्त नहीं थोपती। डीएमके प्रवक्ता टी.के.एस. इलंगोवन कहते हैं कि वे पेरियार की समानता और समभाव की विचारधारा पर चलते हैं। वे सिर्फ नास्तिकता का प्रचार नहीं करते, भले ही पार्टी के कुछ नेता व्यक्तिगत रूप से नास्तिक हों।

एआईएडीएमके खुद को सामाजिक न्याय और समानता के जरिए पेरियार से जोड़ती है, जबकि धर्म के मामले में वह अन्नादुरई के रुख का पालन करती है। पार्टी प्रवक्ता डी. जयकुमार बताते हैं कि पेरियार ने नास्तिकता को बढ़ावा दिया था, लेकिन अन्ना ने 'ओंद्रे कुलम, ओरुवाने देवन' (एक समुदाय, एक भगवान) की वकालत की।

पीएमके (PMK) के लिए पेरियार की विरासत जाति-आधारित डेटा और आरक्षण के उनके अभियान में बसती है। पार्टी अध्यक्ष अंबुमणि रामदास कहते हैं कि पेरियार आरक्षण को जातिगत असमानताओं को दूर करने का एक महत्वपूर्ण जरिया मानते थे और उनकी पार्टी भी सालों से जातिगत जनगणना की मांग कर रही है।

सीपीआई पेरियार के सामाजिक सुधार आंदोलन के एक अलग पहलू से खुद को जोड़ती है। पार्टी के दक्षिण चेन्नई जिला सचिव एस.के. शिवा कहते हैं कि वे पेरियार के अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाहों पर दिए गए विचारों में विश्वास करते हैं। उनकी पार्टी ने जाति-आधारित अपराधों के खिलाफ सख्त कानून बनाने की सिफारिश भी की है।

डीएमके और एआईएडीएमके के साथ काम कर चुकीं राजनीतिक सलाहकार जेनी एस. कहती हैं कि पेरियार ने वह शब्दावली गढ़ी जिसके इर्द-गिर्द राज्य की राजनीति विकसित हुई, इसलिए हर दल उनका आह्वान करना चाहता है। हालांकि, वह मानती हैं कि सिर्फ नाम लेने से हर पार्टी 'पेरियारवादी' नहीं बन जाती।

जेनी कहती हैं कि पेरियार द्वारा उठाए गए सवाल आज भी बेहद अहम हैं। प्रतिनिधित्व किसे मिले? जातिगत असमानता को कैसे दूर किया जाए? और समानता व गरिमा की रक्षा कैसे हो? इन्ही अनसुलझे सवालों के बीच 17 सितंबर, 2026 को पेरियार की 147वीं जयंती तमिलनाडु की राजनीति में उनके अमिट प्रभाव की गवाही देती है।

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