नई दिल्ली | देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग (हाथ से मैला ढोने) पर कानूनी प्रतिबंध के बावजूद सफाई कर्मचारियों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच (दासाम) द्वारा 22 मई 2026 को नई दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस गंभीर संकट पर चिंता व्यक्त की गई। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च से मई 2026 के बीच महज तीन महीनों में सीवर और सेप्टिक टैंक साफ करते समय कम-से-कम 36 सफाई कर्मचारियों की दर्दनाक मौत हुई है।
ये मौतें मुख्य रूप से बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में दर्ज की गई हैं। मारे गए अधिकतर कर्मचारी वाल्मीकि व अन्य हाशिये के समुदायों या प्रवासी मजदूरों में से थे। नगर निकायों और सरकारी एजेंसियों की जवाबदेही से बचने के लिए इन कर्मचारियों को अनौपचारिक ठेकेदारी व्यवस्था के तहत काम पर रखा जाता है।
इन घटनाओं में 'रेस्क्यू-चेन फेटैलिटी' का एक भयावह पैटर्न दिखा है। ऑक्सीजन सिलेंडर, गैस डिटेक्टर और सुरक्षा पोशाक के बिना जब एक कर्मचारी जहरीली गैस से बेहोश होकर गिरता है, तो उसे बचाने उतरे अन्य कर्मचारी भी जान गंवा बैठते हैं। यह बुनियादी सुरक्षा प्रोटोकॉल की पूरी अनुपस्थिति को उजागर करता है।
हालिया घटनाओं में बिहार के वैशाली में एक ही परिवार के चार सदस्यों और छत्तीसगढ़ के रायपुर के एक अस्पताल में तीन कर्मचारियों की सेप्टिक टैंक में मौत शामिल है। इसके अलावा मध्य प्रदेश के इंदौर में बचाव कार्य के दौरान और दिल्ली के सीमापुरी में एक खुले नाले की सफाई करते हुए संविदा कर्मचारियों ने जान गंवाई। हरियाणा, राजस्थान, यूपी, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में भी औद्योगिक ड्रेनेज टैंकों में बिना सुरक्षा काम करते हुए कई मजदूरों की जान गई है।
केंद्र सरकार ने स्वयं संसद में बताया था कि 2017 से 2026 की शुरुआत तक 21 राज्यों में 622 सफाई कर्मचारियों की मौत हुई, जिनमें 317 मौतें 2021 से 2025 के बीच हुईं। अप्रैल 2026 तक 'नमस्ते' योजना के तहत 89,248 कर्मचारियों की प्रोफाइलिंग की गई। सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद 52 प्रभावित परिवारों को अब तक 30 लाख रुपये का अनिवार्य मुआवजा नहीं मिला है। असली मौतों का आंकड़ा इससे अधिक होने की आशंका है, क्योंकि कई मामलों को सामान्य दुर्घटना के रूप में दर्ज कर लिया जाता है।
म्युनिसिपल वर्कर्स लाल झंडा यूनियन (सीटू) के अध्यक्ष धर्मेंद्र भाटी ने कहा कि मशीनीकरण के सरकारी दावों की जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। पहले हर महीने 10 से 13 मौतें होती थीं, जो अब बढ़कर 15 से 20 हो गई हैं। उन्होंने दिल्ली जल बोर्ड में घटते स्थायी कर्मचारियों का जिक्र करते हुए कहा कि न्यूनतम वेतन और स्वास्थ्य जांच के अभाव में कर्मचारी महज 400 से 500 रुपये के लिए जान जोखिम में डालते हैं।
वकील कवलप्रीत कौर ने कहा कि तीन महीनों में औसतन 12 मौतों का यह आंकड़ा पूरी तरह अस्वीकार्य है। उन्होंने सवाल उठाया कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद ऐसी कौन सी परिस्थितियां हैं जो कर्मचारियों को मौत के कुएं में उतरने को मजबूर करती हैं। उन्होंने इन कर्मचारियों को फ्रंटलाइन वर्कर का दर्जा देते हुए जीवन-निर्वाह योग्य वेतन और स्थायी रोजगार देने की मांग की।
अखिल भारतीय निगम मजदूर अधिकार यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव पालिवाल ने इस स्थिति को स्वतंत्रता के 78 वर्षों बाद भी दलितों के साथ गुलामों जैसा व्यवहार करार दिया। उन्होंने प्रशासन से वैधानिक कानूनों को सख्ती से लागू करने और प्रभावित परिवारों के त्वरित पुनर्वास के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय अभियान शुरू करने की अपील की।
दासाम की राष्ट्रीय समन्वयक मोहसिना अख्तर ने कहा कि ये मौतें अलग-थलग दुर्घटनाएं नहीं हैं, बल्कि संरचनात्मक जातिगत भेदभाव और संस्थागत लापरवाही का नतीजा हैं। उन्होंने कर्मचारियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले गंभीर दीर्घकालिक प्रभावों का भी उल्लेख किया, जिनमें श्वसन रोग, त्वचा संक्रमण और न्यूरोलॉजिकल जटिलताएं शामिल हैं, जिनकी चिकित्सीय जांच और बीमा कवरेज लगभग नदारद है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मंच ने स्पष्ट मांग रखी कि मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट का सख्ती से पालन हो और ठेकेदारों व अधिकारियों की आपराधिक जवाबदेही तय की जाए। इसके साथ ही सीवर सफाई का सार्वभौमिक मशीनीकरण, सुरक्षा प्रोटोकॉल का अनिवार्य क्रियान्वयन, समयबद्ध मुआवजा और स्थायी वैकल्पिक आजीविका सुनिश्चित की जानी चाहिए। इन मौतों को संरचनात्मक जातिगत हिंसा के रूप में मान्यता देने की मांग भी जोर-शोर से उठाई गई।
दासाम ने केंद्र व राज्य सरकारों, न्यायपालिका और नागरिक समाज से अपील की कि इस अमानवीय प्रथा को तत्काल खत्म किया जाए। यह सुनिश्चित होना चाहिए कि भविष्य में किसी भी इंसान को अपनी आजीविका कमाने के लिए सीवर या सेप्टिक टैंक के जहरीले अंधेरे में न उतरना पड़े।
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