
भोपाल। मध्यप्रदेश में बच्चों को कुपोषण, एनीमिया और अन्य गंभीर बीमारियों से बचाने के उद्देश्य से चलाया जा रहा स्वास्थ्य विभाग का महत्वाकांक्षी दस्तक अभियान अपेक्षित गति से आगे बढ़ता नजर नहीं आ रहा है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि विटामिन-ए अनुपूरण और एनीमिया फॉलोअप जैसे महत्वपूर्ण घटकों में प्रदेश के अधिकांश जिले लक्ष्य से काफी पीछे हैं। खास बात यह है कि प्रदेश के प्रमुख महानगर भी इस अभियान में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाए हैं, जिससे अभियान की प्रभावशीलता और कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के 51 जिलों में से केवल चार जिले ही 60 प्रतिशत से अधिक उपलब्धि हासिल कर पाए हैं, जबकि अधिकांश जिलों में प्रगति बेहद धीमी है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह अभियान बच्चों के स्वास्थ्य से सीधे जुड़ा हुआ है और यदि इसमें लापरवाही बरती गई तो इसका असर आने वाले वर्षों में बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ सकता है। दस्तक अभियान के तहत स्वास्थ्य विभाग की टीम घर-घर जाकर बच्चों की स्वास्थ्य स्थिति की जांच करती है, उन्हें जरूरी दवाएं और पोषण संबंधी सहायता प्रदान करती है तथा गंभीर रूप से बीमार या कुपोषित बच्चों को इलाज के लिए स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाने का काम करती है। लेकिन वर्तमान आंकड़े बताते हैं कि जमीनी स्तर पर अभियान की गति उतनी प्रभावी नहीं है जितनी अपेक्षित थी।
बड़े शहर भी पिछड़े
चिंताजनक बात यह है कि प्रदेश के बड़े शहर भी इस अभियान में अपेक्षित प्रगति नहीं कर पाए हैं। राजधानी भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे प्रमुख शहरों में भी विटामिन-ए अनुपूरण और एनीमिया फॉलोअप की रफ्तार धीमी रही है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार इन शहरों में बड़ी आबादी और व्यापक क्षेत्र होने के कारण अभियान को पूरी तरह लागू करने में चुनौतियां सामने आ रही हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर संसाधनों और स्वास्थ्य ढांचे के बावजूद महानगरों में कमजोर प्रदर्शन होना चिंता का विषय है।
इन शहरों में स्वास्थ्य विभाग की टीमों को घर-घर सर्वे, बच्चों की पहचान और समय पर पोषण व उपचार उपलब्ध कराने का जिम्मा दिया गया है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि लक्ष्य के मुकाबले उपलब्धियां काफी कम हैं। इससे यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या अभियान की निगरानी और क्रियान्वयन में कहीं न कहीं लापरवाही हो रही है।
ग्वालियर में लक्ष्य बड़ा, लेकिन उपलब्धि सीमित
ग्वालियर जिले में बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए बड़े स्तर पर लक्ष्य तय किया गया था, लेकिन जमीनी स्तर पर अभियान की प्रगति संतोषजनक नहीं है। विटामिन-ए अनुपूरण के तहत जिले में 2 लाख 27 हजार 90 बच्चों को खुराक देने का लक्ष्य रखा गया था। इसके मुकाबले अब तक केवल 76 हजार 710 बच्चों को ही विटामिन-ए की खुराक दी जा सकी है, जो कुल लक्ष्य का 33.78 प्रतिशत है।
यह आंकड़ा बताता है कि अभियान की गति काफी धीमी है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कई स्थानों पर फील्ड में काम तो हुआ है, लेकिन पोर्टल पर डेटा एंट्री समय पर नहीं हो पाने के कारण उपलब्धि कम दिखाई दे रही है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अभियान सही तरीके से चल रहा होता तो आंकड़ों में इतनी बड़ी कमी नजर नहीं आती।
एनीमिया फॉलोअप में सबसे खराब स्थिति
ग्वालियर जिले में एनीमिया फॉलोअप की स्थिति और भी ज्यादा चिंताजनक है। एनीमिया यानी खून की कमी से जूझ रहे बच्चों की नियमित निगरानी इस अभियान का अहम हिस्सा है। जिले में 98 हजार 84 बच्चों के फॉलोअप का लक्ष्य तय किया गया था, लेकिन अब तक केवल 12 हजार 75 बच्चों का ही फॉलोअप किया जा सका है। यह कुल लक्ष्य का केवल 12.31 प्रतिशत है, जो बेहद कम माना जा रहा है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार एनीमिया बच्चों में सबसे आम स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। यदि समय पर इसकी पहचान और उपचार न किया जाए तो इससे बच्चों के विकास, पढ़ाई और प्रतिरोधक क्षमता पर गंभीर असर पड़ सकता है। ऐसे में एनीमिया फॉलोअप में इतनी कम प्रगति होना चिंता का विषय है।
इस मामले में जिला कार्यक्रम प्रबंधक (डीपीएम) विजय भार्गव का कहना है कि पोर्टल पर डेटा एंट्री को लेकर अब विशेष जोर दिया जा रहा है और जो आंकड़े छूट गए हैं उन्हें जल्द अपडेट कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि कई स्थानों पर फील्ड में काम हो चुका है, लेकिन तकनीकी कारणों से डेटा पोर्टल पर अपडेट नहीं हो पाया।
प्रदेश में केवल चार जिले 60 प्रतिशत से ऊपर
प्रदेश के 51 जिलों के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो केवल चार जिले ही 60 प्रतिशत से अधिक उपलब्धि हासिल कर पाए हैं। इनमें उमरिया 86.44 प्रतिशत उपलब्धि के साथ प्रदेश में पहले स्थान पर है। इसके अलावा भिंड 63.15 प्रतिशत, रीवा 63.01 प्रतिशत और शहडोल 62.83 प्रतिशत उपलब्धि के साथ अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं।
इसके अलावा कुछ जिलों का प्रदर्शन संतोषजनक माना गया है, जिनमें आगर मालवा (64.73 प्रतिशत), मंडला (63.76 प्रतिशत) और शाजापुर (62.26 प्रतिशत) शामिल हैं। हालांकि, इन जिलों को छोड़कर बाकी अधिकांश जिलों की स्थिति कमजोर बनी हुई है।
कागजों पर काम, पोर्टल पर एंट्री नहीं
स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस कमजोर प्रदर्शन पर नाराजगी जताई है। विभाग का कहना है कि कई जिलों में फील्ड स्तर पर काम तो किया जा रहा है, लेकिन पोर्टल पर डेटा समय पर अपडेट नहीं किया जा रहा है, जिसके कारण उपलब्धि कम दिखाई दे रही है।
भोपाल स्तर से जिला कार्यक्रम प्रबंधकों (डीपीएम) और जिला टीकाकरण अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि छूटे हुए आंकड़ों की बैकलॉग एंट्री जल्द से जल्द पूरी की जाए। अधिकारियों का कहना है कि यदि पोर्टल पर समय पर डेटा दर्ज नहीं होगा तो न केवल जिलों की रैंकिंग प्रभावित होगी बल्कि जरूरतमंद बच्चों की सही पहचान करना भी मुश्किल हो जाएगा।
क्यों महत्वपूर्ण है दस्तक अभियान
विटामिन-ए अनुपूरण: यह बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विटामिन-ए की कमी से बच्चों में रतौंधी (नाइट ब्लाइंडनेस) और अंधेपन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। नियमित रूप से विटामिन-ए की खुराक देने से इन समस्याओं से बचाव किया जा सकता है।
एनीमिया फॉलोअप: खून की कमी से पीड़ित बच्चों की नियमित निगरानी बेहद जरूरी है। यदि समय पर इलाज और पोषण नहीं मिला तो इसका असर बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ सकता है। इसलिए दस्तक अभियान के तहत एनीमिया से ग्रसित बच्चों की पहचान कर उनका इलाज और पोषण सुनिश्चित करने पर जोर दिया जाता है।
निगरानी बढ़ाने की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि दस्तक अभियान का उद्देश्य बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी सफलता पूरी तरह से जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन और निगरानी पर निर्भर करती है। यदि समय पर सर्वे, उपचार और पोर्टल पर डेटा अपडेट नहीं किया गया तो यह अभियान अपने उद्देश्य को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाएगा।
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