सिर्फ खून की जांच से फैटी लिवर की गंभीरता पता चलेगी, AIIMS भोपाल के वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि

इस नई तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह सुरक्षित है और मरीज के लिए बेहद आसान भी।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), भोपाल
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), भोपाल
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भोपाल। भागदौड़ भरी जिंदगी, जंक फूड, शारीरिक श्रम की कमी और घंटों एक जगह बैठकर काम करने की आदतों ने फैटी लिवर को तेजी से फैलने वाली बीमारी बना दिया है। पहले यह बीमारी लंबे समय तक बिना लक्षणों के रहती है, लेकिन धीरे-धीरे यही फैटी लिवर सिरोसिस और लिवर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का रूप ले सकता है। सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि अब तक इसकी गंभीरता जानने के लिए लिवर बायोप्सी करानी पड़ती थी, जो दर्दनाक होने के साथ-साथ जोखिम भरी भी मानी जाती है।

अब इस दिशा में एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल के वैज्ञानिकों ने फैटी लिवर की गंभीरता पहचानने की एक नई और आसान तकनीक विकसित की है। इस तकनीक की मदद से अब मरीज को बायोप्सी जैसी तकलीफदेह जांच से गुजरने की जरूरत नहीं होगी और केवल खून की सामान्य जांच से ही बीमारी की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

एम्स भोपाल के जैव रसायन विभाग की डॉ. दीपा रोशनी ने डॉ. सुखेस मुखर्जी के मार्गदर्शन में इस विषय पर शोध किया है। शोध के दौरान खून में मौजूद तीन ऐसे बायोमार्कर की पहचान की गई है, जो लिवर की हालत के बारे में सटीक जानकारी देते हैं। इन बायोमार्कर के नाम एड्रोपिन, आइरिसिन और साइटोकेराटिन-18 हैं।

शोध में सामने आया है कि जैसे-जैसे फैटी लिवर की बीमारी गंभीर होती जाती है, वैसे-वैसे शरीर में ऊर्जा संतुलन बनाए रखने वाले हार्मोन एड्रोपिन और आइरिसिन का स्तर कम होने लगता है। इसके उलट, लिवर की कोशिकाओं को होने वाले नुकसान का संकेत देने वाला साइटोकेराटिन-18 बढ़ने लगता है। इन तीनों बायोमार्कर की एक साथ जांच करने पर डॉक्टर यह सटीक रूप से बता सकेंगे कि मरीज का लिवर किस हद तक खतरे में है।

इस नई तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह सुरक्षित है और मरीज के लिए बेहद आसान भी। इससे न केवल महंगी जांचों से छुटकारा मिलेगा, बल्कि बीमारी की शुरुआती अवस्था में ही गंभीर खतरे को पहचानना संभव हो सकेगा। समय रहते फैटी लिवर की पहचान होने से आगे चलकर लिवर कैंसर जैसी घातक बीमारी के खतरे को काफी हद तक रोका जा सकता है।

एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक डॉ. माधवानंद कर का कहना है कि यह तकनीक फैटी लिवर के इलाज और जांच के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव लाने वाली है। इससे डॉक्टरों को मरीज की स्थिति समझने में मदद मिलेगी और आम लोगों के लिए समय पर इलाज कराना आसान हो जाएगा। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, बदलती जीवनशैली के दौर में यह शोध आने वाले समय में लाखों लोगों के लिए जीवनरक्षक साबित हो सकता है।

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