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MP में लव मैरिज पर सामाजिक बहिष्कार का फरमान: 'बच्चों ने किया तो माता पिता होंगे सजा के हकदार' जानिए मामला?

कानून विशेषज्ञों का कहना है कि पंचायत या सामूहिक बैठक को किसी के मौलिक अधिकार छीनने का अधिकार नहीं है।
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भोपाल। मध्यप्रदेश के रतलाम के पिपलौदा ब्लॉक के पंचेवा गांव में मंदिर परिसर में आयोजित सामूहिक बैठक में ग्रामीणों ने लव मैरिज को लेकर ऐसा फरमान सुना दिया, जिसने कानून और संविधान दोनों को चुनौती दे दी। बैठक में ऐलान किया गया कि यदि किसी परिवार का बेटा या बेटी घर से भागकर प्रेम विवाह करता है, तो उसके माता-पिता समेत पूरे परिवार का सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा।

शनिवार रात हुई इस बैठक का वीडियो रविवार को सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके बाद प्रशासन हरकत में आया। वीडियो में ग्रामीणों को खुलेआम सामाजिक बहिष्कार की धमकी देते देखा गया, जिससे इलाके में तनाव और भय का माहौल बन गया।

वीडियो वायरल होते ही प्रशासन सक्रिय

वीडियो सामने आने के बाद एसडीएम सुनील जायसवाल ने तत्काल संज्ञान लेते हुए जनपद सीईओ ब्रह्मस्वरूप हंस और पटवारी को गांव भेजा। अधिकारियों ने ग्रामीणों को स्पष्ट समझाइश दी कि सामाजिक बहिष्कार जैसे फैसले कानूनन अपराध हैं और किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं। इस दौरान एसडीओपी संदीप मालवीय ने कहा कि यदि इस तरह के फरमानों या दबाव की शिकायत मिलती है, तो नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी।

कानून क्या कहता है?

भारतीय कानून के अनुसार 18 वर्ष की युवती और 21 वर्ष का युवक अपनी मर्जी से शादी करने के लिए स्वतंत्र हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में साफ किया है कि सामाजिक बहिष्कार, पंचायतों के ऐसे फरमान और ऑनर के नाम पर दबाव अवैध हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रेम विवाह करने वाले वयस्कों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।

पीड़ित परिवार ने कहा, "मदद के बजाय हमें ही दोषी ठहराया”

वीडियो वायरल होने के बाद पीड़ित परिवार ने मीडिया से बातचीत की। पीड़ित पिता ने बताया कि उनकी नाबालिग बेटी को एक युवक भगा ले गया। उन्होंने थाने में रिपोर्ट भी दर्ज कराई, लेकिन समय पर मदद नहीं मिली।

पीड़ित का आरोप है कि प्रशासनिक सहायता के अभाव में मामला उल्टा मोड़ ले गया और ग्रामीणों ने लड़की के परिवार को ही दोषी ठहराते हुए सामाजिक बहिष्कार की धमकी दे दी।

पंचायत के फरमान पर सवाल

कानून विशेषज्ञों का कहना है कि पंचायत या सामूहिक बैठक को किसी के मौलिक अधिकार छीनने का अधिकार नहीं है। सामाजिक बहिष्कार न सिर्फ व्यक्ति की गरिमा पर हमला है, बल्कि यह अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में दोषियों पर IPC और विशेष कानूनों के तहत कार्रवाई संभव है।

विधि विशेषज्ञ अधिवक्ता मयंक सिंह ने द मूकनायक से कहा कि किसी भी वयस्क स्त्री-पुरुष को अपनी मर्जी से विवाह करने का संवैधानिक अधिकार है। सामाजिक बहिष्कार, पंचायत या सामूहिक बैठकों द्वारा इस तरह के फरमान जारी करना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह सीधे-सीधे कानून का उल्लंघन भी है। सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि प्रेम विवाह करने वाले वयस्कों को डराने-धमकाने, उनके परिवार पर दबाव बनाने या सामाजिक रूप से अलग-थलग करने जैसी कार्रवाइयाँ अपराध की श्रेणी में आती हैं।

उन्होंने आगे कहा कि यदि किसी गांव या समुदाय द्वारा सामाजिक बहिष्कार जैसा निर्णय लागू किया जाता है, तो ऐसे लोगों पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई हो सकती है। साथ ही प्रशासन की यह जिम्मेदारी है कि वह पीड़ित परिवार को सुरक्षा प्रदान करे और ऐसे गैरकानूनी फैसलों को तत्काल प्रभाव से रोके। यदि समय रहते सख्ती नहीं बरती गई, तो यह प्रवृत्ति अन्य क्षेत्रों में भी फैल सकती है, जो कानून व्यवस्था और संवैधानिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती है।

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