
उत्तर प्रदेश: पंचायत चुनावों की स्थिति को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने बुधवार को इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए पिछड़ा वर्ग आयोग से पंचायत चुनाव के संबंध में उसकी रिपोर्ट तलब की है। इसके साथ ही अदालत ने राज्य चुनाव आयोग (एसईसी) को प्रस्तावित चुनाव कार्यक्रम की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने का भी निर्देश दिया है।
यह महत्वपूर्ण आदेश जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस एके चौधरी की अवकाश पीठ द्वारा एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई के दौरान पारित किया गया। इस याचिका में राज्य सरकार के उस हालिया फैसले को सीधे तौर पर चुनौती दी गई है, जिसमें 26 मई को ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद निवर्तमान प्रधानों को ही प्रशासक के रूप में नियुक्त कर दिया गया था।
अदालत में दायर जनहित याचिका में मुख्य रूप से यह दलील दी गई है कि उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम के तहत किसी भी ग्राम प्रधान का कार्यकाल अधिकतम पांच वर्ष तक ही सीमित होता है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि सरकार द्वारा समय पर पंचायत चुनाव नहीं कराना और उसके बाद उन्हीं पुराने प्रधानों को प्रशासक का प्रभार सौंपना एक अनुचित कदम है।
याचिका के अनुसार, सरकार की इस प्रक्रिया ने प्रभावी रूप से निवर्तमान ग्राम प्रधानों के कार्यकाल को अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया है, जो पूरी तरह से स्थापित कानून और नियमों के विपरीत है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इस जनहित याचिका पर अगली सुनवाई 10 जुलाई को निर्धारित की है।
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