उदयपुर पुलिस का 'गोपनीयता' खेल: CCTV फुटेज के लिए 'लोकहित' निबंध लिखवाएंगे? सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पानी फेरा!

भूपालपुरा पुलिस ने उड़ाई RTI एक्ट की धज्जियां!
उदयपुर के भूपालपुरा थाने ने RTI में CCTV फुटेज देने की बजाय 'लोकहित' का विस्तृत उल्लेख मांग लिया, RTI एक्ट की धज्जियां उड़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट के मानवाधिकार आदेशों का अपमान किया।
उदयपुर के भूपालपुरा थाने ने RTI में CCTV फुटेज देने की बजाय 'लोकहित' का विस्तृत उल्लेख मांग लिया, RTI एक्ट की धज्जियां उड़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट के मानवाधिकार आदेशों का अपमान किया।
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— ✍️ Jaywant Bherviya

पुलिस थानों में CCTV कैमरे क्यों लगवाए गए है? लगाने का उद्देश्य क्या है?

ये शायद आम जनता को पता हो या न हो लेकिन पुलिस विभाग को इसकी जानकारी न हो ऐसा संभव नही है, क्योंकि पुलिस थाने में न तो कोई चोरी हो सकती है और न ही वहाँ की सुरक्षा को कोई खतरा है, फिर CCTV कैमरे क्यों लगवाए गए ..? इसका जवाब है माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह सैनी प्रकरण में पूर्व में दिया गया वो फैसला जो कि आमजन के मानवाधिकारो की रक्षा से जुड़ा हुआ था , आदेश के बाद ही पुलिस थानों के चप्पे चप्पे पर CCTV कैमरे लगवाए जाने की शुरूआत हुई।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी उदयपुर के पुलिस थानों के CCTV कैमरों के फुटेज आम जनता को मिलना लगभग असंभव सा ही रहा है। जब भी आम जनता अपने साथ हुए किसी अन्याय के कारण थाने के CCTV फुटेज RTI के अंतर्गत माँगती तो विभिन्न तरह के फिक्स बहाने बनाकर और गोपनीयता का हवाला देकर सीसीटीवी फुटेज देने से मना कर दिया जाता।

कुछ आवेदकों ने हिम्मत की और राज्य सूचना आयोग तक पहुँचे तो आयोग ने थांनो के CCTV फुटेज देने के आदेश भी जारी किए फिर भी सिस्टम नही सुधरा , अब तक सुप्रीम कोर्ट, राज्य सूचना आयोग और स्टेट क्राइम रिकार्ड्स द्वारा पुलिस थानों के सीसीटीवी फुटेज देने के महत्वपूर्ण आदेश जारी किए गए है बावजूद इसके CCTV फुटेज प्राप्त करना लगभग असंभव कार्य है, यहाँ तक कि SCRB के आदेश को तो उदयपुर पुलिस ने रिकॉर्ड में होने से ही इनकार कर दिया था, जिसका प्रमाण विभाग द्वारा पूर्व में दिया गया जवाब है।

राजस्थान ने जैसे ही हिरासत में होने वाली मौतों और CCTV बंद होने के प्रकरणों में देश भर में टॉप पर स्थान प्राप्त किया, खबरें प्रकाशित हुई तो बात सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुँची, माननीय सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत स्वप्रसंज्ञान लिया और जनहित याचिका दर्ज कर ली जो वर्तमान में प्रक्रियाधीन है।

अब बात कि जाए उदयपुर के भूपालपुरा पुलिस थाने की जहाँ पूर्व में भी मानवाधिकार हनन की घटनाएं सामने आई है, पुलिस थाने के बाहर ही जनता के चालान बनाए जाते है और थाने के कुछ पुलिस कर्मी बिना हेलमेट व बिना वर्दी के बुलेट पर हीरोगिरी करते हुए रील बनाते रहते है, बावजूद इसके रील बाज कार्मिकों का कोई चालान तक नही बनता और उनके विधि विरुद्ध कार्यो की सूचना को निजी सूचना बताकर देने से ही मना कर दिया जाता है।

उदयपुर का भूपालपुरा थाना शहर का एक ऐसा पुलिस थाना है जहाँ महीनों से CCTV कैमरे बंद थे, हर बार कैमरे बंद होने का हवाला देकर CCTV फुटेज देने से मना कर दिया जाता था ,सुप्रीम कोर्ट में चल रहे प्रकरण के कारण स्टेट क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो ने पुनः आदेश जारी करते हुए निर्देश दिए :-

नागरिक अधिकारों के संरक्षण के लिए आवश्यक हो तो नागरिक धाने से दस्तावेज/फुटेज (सीसीटीवी) नियमानुसार प्राप्त कर सकतें हैं।" का डिस्पले (डिजिटल / प्रिटं डिस्पले) थाने के स्वागत कक्ष में लगाए जाए।

आदेश के बाद जब उदयपुर के भूपालपुरा थाने के CCTV फुटेज की मांग RTI के अंतर्गत की गई तो भूपालपुरा थाने के थानाधिकारी महोदय ने CCTV फुटेज न देने पड़े उसके लिए टालमटोल करने वाला विधि विरुद्ध जवाब दिया जो कि इस प्रकार है :-

निवेदन है कि चाही गई सूचना में आवेदक यह स्पष्ट करे कि चाही गई सूचना किस लोकहित एवं जनहित में चाही गई है आवेदक द्वारा आवेदन पत्र में विस्तृत उल्लेख करे कि आवेदक को उक्त सूचना किसी प्रकरण/परिवाद / घटना से संबंधित होने से चाही है तथा आवेदक से यह भी स्पष्ट रूप से अंकन करावे कि आवेदक के साथ दिनांक 19.12.2025 को दोपहर 2 बजे से 4 बजे के मध्य आवेदक के साथ कोई घटना थाना भुपालपुरा पर कारित हुई है/या नही हुई है ताकि उक्त सूचना आवेदक से संबंधित होने पर नियमानुसार उपलब्ध करायी जा सके।

सवाल उठते है कि :- क्या आवेदक को भूपालपुरा थाने के CCTV फुटेज प्राप्त करने के लिये पुनः नया आवेदन कर जनहित और लोकहित बताने का विस्तृत उल्लेख करने वाला निबंध लिखना होगा ?

क्या आवेदक को अपने से सम्बंधित घटना कारित का अंकन करना होगा तब नियम ढूंढेंगे कि आवेदक को सूचना दी जाए अथवा नहीं थानाधिकारी महोदय को RTI की सूचना में लोकहित व जनहित ढूंढने की क्या आवश्यकता पड़ी ?

यदि कोई पीड़ित अपने साथ हुई किसी घटना की CCTV फुटेज मांगेगा तो फिर क्या उस पीड़ित को धमकाया नही जाएगा ? सवाल तो और भी है लेकिन जवाब नहीं मिल पाएंगे।

उदयपुर के भूपालपुरा थाने ने RTI में CCTV फुटेज देने की बजाय 'लोकहित' का विस्तृत उल्लेख मांग लिया, RTI एक्ट की धज्जियां उड़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट के मानवाधिकार आदेशों का अपमान किया।
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अब बात करते है RTI नियमों की:

(1) सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 की धारा 6(2)  यह कहती है कि सूचना मांगने वाले आवेदक से कोई कारण बताने या कोई व्यक्तिगत विवरण देने की अपेक्षा नहीं की जाएगी, सिवाय उन विवरणों के जो उससे संपर्क करने के लिए आवश्यक हों, जैसे पता या फोन नंबर, ताकि उसे मांगी गई सूचना भेजी जा सके।

यह धारा आवेदन को सरल बनाती है, जिससे कोई भी नागरिक बिना किसी औपचारिकता के जानकारी मांग सकता है, बस उसे अपना संपर्क विवरण देना होता है।

मुख्य बिंदु (Key Points):

1. कारण की आवश्यकता नहीं: आपको यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि आपको यह जानकारी क्यों चाहिए।

2. व्यक्तिगत विवरण की छूट: केवल संपर्क करने के लिए ज़रूरी जानकारी (नाम, पता, फोन नंबर) देना ही काफी है।

3. सादे कागज पर आवेदन: आप यह आवेदन एक सादे कागज़ पर कर सकते हैं, इसके लिए कोई विशेष फॉर्म नहीं है।

उद्देश्य: यह अधिनियम का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि "जो जानकारी संसद या राज्य विधानमंडल को नहीं दी जा सकती, वह किसी व्यक्ति को भी नहीं दी जानी चाहिए"।

संक्षेप में, धारा 6(2) आवेदकों को सूचना मांगने के लिए प्रोत्साहित करती है और प्रक्रिया को सरल बनाती है, जिससे नागरिकों को सशक्त बनाया जा सके।

सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 की धारा 19(5) यह कहती है कि जब कोई सूचना अस्वीकार की जाती है और उसकी अपील की जाती है, तो यह साबित करने का भार कि इनकार सही था, उस लोक सूचना अधिकारी (PIO) पर होगा जिसने उसे अस्वीकार किया था, न कि आवेदक पर; इसे ' जस्टिफिकेशन का भार ' (Onus to prove) कहते हैं, जिससे नागरिकों के लिए अपील करना आसान हो जाता है।

धारा 19(5) का मुख्य बिंदु भार (Onus): अपील की कार्यवाही के दौरान, यह साबित करने की ज़िम्मेदारी कि सूचना देने से मना करना उचित था, केंद्रीय या राज्य लोक सूचना अधिकारी (PIO) की होती है, जिसने आवेदन को अस्वीकार किया था।

आवेदक की सुविधा: यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि आवेदक को यह साबित नहीं करना पड़े कि उसे सूचना मिलनी चाहिए थी, बल्कि अधिकारी को यह साबित करना होगा कि क्यों नहीं मिलनी चाहिए थी, जिससे पारदर्शिता बढ़ती है और जवाबदेही तय होती है।

आश्चर्य की बात है कि थानाधिकारी महोदय प्रशासनिक सुधार विभाग के आदेशों की भी धज्जिया उड़ा रहे है और RTI एक्ट की भी, आवेदन पर निर्णय लेने का अधिकार विभाग के लोक सूचना अधिकारी का होता है, न कि थानाधिकारी महोदय का, फिर भी उदयपुर का भूपालपुरा पुलिस थाना RTI एक्ट की धज्जियां उड़ा रहा है और थाने के CCTV फुटेज को RTI में देने पर ताला लगा दिया है, फिर कैसे होगी आमजनता के मानवाधिकारो की रक्षा ?, कैसे बढ़ेगा आमजन का विश्वास ? कैसे किया जाएगा सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान ?

-लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट हैं।

उदयपुर के भूपालपुरा थाने ने RTI में CCTV फुटेज देने की बजाय 'लोकहित' का विस्तृत उल्लेख मांग लिया, RTI एक्ट की धज्जियां उड़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट के मानवाधिकार आदेशों का अपमान किया।
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