एसिड अटैकर्स के लिए 'दया' की कोई जगह नहीं, पूरा सिस्टम उनके खिलाफ खड़ा हो; CJI सूर्यकांत

CJI सूर्यकांत ने 16 साल से पेंडिंग केस पर जताई नाराजगी, कहा- 'अगर देश की राजधानी इंसाफ नहीं दे सकती, तो कौन देगा?', एसिड अटैक सर्वाइवर्स को दिव्यांगता श्रेणी में लाने पर केंद्र से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट
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नई दिल्ली: एसिड हमलों की बढ़ती भयावहता और पीड़ितों के लंबे संघर्ष को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (4 दिसंबर, 2025) को एक अहम और सख्त टिप्पणी की है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि तेजाब से हमला करने वालों के प्रति अदालतों को रत्ती भर भी सहानुभूति नहीं दिखानी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसे जघन्य अपराध करने वालों के खिलाफ "पूरे सिस्टम" को एकजुट होकर जवाब देना होगा।

यह टिप्पणी तब आई जब सुप्रीम कोर्ट की बेंच एसिड अटैक सर्वाइवर शाहीन मलिक की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में मांग की गई है कि एसिड हमले के पीड़ितों को 'दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016' (RPwD Act) के तहत औपचारिक रूप से 'विशिष्ट दिव्यांगता' वाले व्यक्तियों के रूप में मान्यता दी जाए।

सरकार का समर्थन: 'अपराधियों के साथ हो उतनी ही निर्दयता'

केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने CJI की बात का पूर्ण समर्थन किया। उन्होंने अदालत में कहा कि जो अपराधी महिलाओं और नाबालिगों को जीवन भर के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से छलनी कर देते हैं, उनके साथ "उतनी ही निर्दयता बरती जानी चाहिए, जितनी उन्होंने अपने पीड़ितों के साथ दिखाई थी।"

तुषार मेहता ने स्वीकार किया कि कोई भी प्रतिवादी इस मांग का विरोध नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि पीड़ितों को दिव्यांग माना जाना चाहिए और उन्हें अधिनियम के दायरे में लाया जाना ही होगा। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र से इस विषय पर अध्यादेश (Ordinance) लाने पर विचार करने को भी कहा।

16 साल से इंसाफ का इंतजार: कोर्ट रह गया स्तब्ध

सुनवाई के दौरान अदालत यह जानकर हैरान रह गई कि याचिकाकर्ता शाहीन मलिक का अपना केस पिछले 16 साल से लंबित है। 2009 में हरियाणा में जब उन पर हमला हुआ था, तब वह 26 वर्ष की थीं और एमबीए की पढ़ाई कर रही थीं। वह अपने कार्यस्थल के बाहर इस हमले का शिकार हुईं और तब से अब तक उनकी 25 रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी हो चुकी हैं।

शाहीन मलिक ने 2021 में 'ब्रेव सोल्स' (Brave Souls) नामक संस्था की स्थापना की, जो आज पूरे भारत में एसिड अटैक सर्वाइवर्स को कानूनी और चिकित्सीय मदद मुहैया करा रही है।

"यह सिस्टम का मजाक है"

याचिकाकर्ता ने बेंच को बताया कि 2009 में हुए हमले के बाद 2013 तक उनके केस में कुछ नहीं हुआ। जब CJI सूर्यकांत ने पूछा कि क्या आरोपियों को सजा मिली, तो मलिक ने बताया कि रोहिणी (दिल्ली) की ट्रायल कोर्ट में अभी भी "अंतिम बहस" ही चल रही है। बता दें कि यह केस हरियाणा से दिल्ली ट्रांसफर किया गया था।

इस देरी पर मुख्य न्यायाधीश ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा, "अगर देश की राजधानी इन चुनौतियों का जवाब नहीं दे सकती, तो कौन देगा? यह सिस्टम का मजाक है।"

CJI ने शाहीन मलिक को सलाह दी कि वे एक अलग अर्जी दाखिल करें ताकि सुप्रीम कोर्ट उनके केस का स्वतः संज्ञान (Suo Motu cognizance) ले सके और यह सुनिश्चित करे कि ट्रायल रोजाना (Day-to-day) चले।

विशेष अदालतें बनाने का प्रस्ताव

मुख्य न्यायाधीश ने एसिड अटैक के मामलों के लिए विशेष अदालतें (Special Courts) गठित करने का प्रस्ताव दिया, ताकि इन मुकदमों का निपटारा तेजी से हो सके। कोर्ट ने सभी राज्य उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि वे देश भर में पेंडिंग एसिड अटैक के मुकदमों का पूरा ब्यौरा उपलब्ध कराएं।

अंदरूनी जख्म जो दिखाई नहीं देते

शाहीन मलिक ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि पुलिस से भरोसा उठने के बाद वह केवल "मुआवजे" की उम्मीद कर रही थीं, न कि सजा की। हालांकि, एक महिला न्यायिक अधिकारी के हस्तक्षेप ने उन्हें न्यायपालिका पर दोबारा भरोसा दिलाया।

बेंच में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची और मुख्य न्यायाधीश को अपनी याचिका का मर्म समझाते हुए शाहीन ने कहा, "कई पीड़ित ऐसे हैं जिन्हें जबरन तेजाब निगलने पर मजबूर किया गया। मेरे निशान तो फिर भी दिखाई देते हैं, लेकिन उनके जख्म शरीर के अंदर हैं। वे मेरी तरह ही तड़पते हैं। कइयों को बार-बार अस्पताल जाना पड़ता है, कुछ चल नहीं पाते, तो कुछ कृत्रिम आहार नली के सहारे जी रहे हैं। दुखद यह है कि उन्हें न तो कोई सरकारी लाभ मिलता है और न ही दिव्यांगता पेंशन।"

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