सुप्रीम कोर्ट का फैसला: POCSO आरोपी की जमानत रद्द, कहा- गवाहों को धमकाने और सबूत मिटाने का खतरा एक गंभीर चिंता

इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश पलटा: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सबूतों से छेड़छाड़ और गवाहों पर दबाव का खतरा नहीं किया जा सकता नजरअंदाज, आरोपी को 2 हफ्ते में सरेंडर करने का निर्देश।
सुप्रीम कोर्ट
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों (POCSO) से जुड़े मामलों में जमानत देने को लेकर एक महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे गंभीर मामलों में जमानत मिलने के बाद सबूतों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित करने की संभावना एक वैध और बेहद चिंताजनक विषय है।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने उत्तर प्रदेश के शामली जिले के एक युवक को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। इस युवक पर हथियार के बल पर एक नाबालिग के साथ बार-बार दुष्कर्म (penetrative sexual assault) करने और ब्लैकमेल करने के इरादे से उस कृत्य का वीडियो बनाने का आरोप है।

'समाज की अंतरात्मा को झकझोरने वाला अपराध'

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सख्त लहजे में कहा कि इस तरह का आचरण न केवल "पीड़ित के जीवन पर विनाशकारी प्रभाव" डालता है, बल्कि यह "समाज की सामूहिक अंतरात्मा को भी झकझोर कर रख देता है।" अदालत ने जोर देकर कहा कि पीड़ित की सुरक्षा और अदालती कार्यवाही (ट्रायल) की पवित्रता बनाए रखना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।

हाईकोर्ट के फैसले में मिलीं खामियां

अपने 21 पन्नों के फैसले में, शीर्ष अदालत ने कहा कि यद्यपि जमानत देने से यांत्रिक रूप से इनकार नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन तथ्यों की गलत समझ या महत्वपूर्ण अनदेखी के आधार पर जमानत देना भी न्याय का गला घोंटने जैसा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत "तथ्यों की गलत दिशा और महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार न करने" का परिणाम थी, जिससे वह आदेश कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण हो गया था।

अदालत ने कहा कि जब फैसले में ऐसी गंभीर खामियां हों, तो सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करने का पूरा अधिकार है। शीर्ष अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि हाईकोर्ट आरोपी द्वारा किए गए अपराध की प्रकृति, गंभीरता और POCSO अधिनियम के तहत अनिवार्य कानूनी सख्ती पर विचार करने में विफल रहा।

आरोपी को दो सप्ताह में सरेंडर करने का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को निर्देश दिया है कि वह दो सप्ताह के भीतर संबंधित क्षेत्राधिकार वाली अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करे। यदि वह ऐसा करने में विफल रहता है, तो ट्रायल कोर्ट को कानून के मुताबिक उसकी हिरासत सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं।

POCSO मामलों में तेजी से सुनवाई की जरूरत

पीठ ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि POCSO अधिनियम बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाया गया एक विशेष कानून है और इसके तहत कार्यवाही के लिए संवेदनशीलता और तत्परता की आवश्यकता होती है। फैसले में कहा गया, "इस न्यायालय ने लगातार POCSO मामलों के शीघ्र निपटारे पर जोर दिया है। साथ ही, यह सुनिश्चित करने के लिए कि कानून की प्रक्रिया दमनकारी न बने, अभियोजन पक्ष की सावधानीपूर्वक न्यायिक जांच भी होनी चाहिए।"

उसके बाद, सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया है कि इस मामले को प्राथमिकता दी जाए और कानून के अनुसार मुकदमे की सुनवाई जल्द से जल्द पूरी की जाए।

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