MP: इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से 36 मौतों की न्यायिक जांच रिपोर्ट में खुलासा! 2019 में ही लग गई थी जानकारी, सिस्टम की लापरवाही ने बढ़ाई त्रासदी

2019 में ही पानी की गुणवत्ता को लेकर मिल चुकी थी चेतावनी, फिर भी नहीं हुई प्रभावी कार्रवाई; करीब 600 पेज की रिपोर्ट में पेयजल-सीवरेज व्यवस्था से लेकर टेंडर प्रक्रिया तक गंभीर खामियां सामने आईं
MP: इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से 36 मौतों की न्यायिक जांच रिपोर्ट में खुलासा! 2019 में ही लग गई थी जानकारी, सिस्टम की लापरवाही ने बढ़ाई त्रासदी
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भोपाल। मध्यप्रदेश, इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 36 लोगों की मौत के मामले में हुई न्यायिक जांच ने प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर किया है। हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जस्टिस सुशील गुप्ता की अध्यक्षता वाले जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट में माना है कि क्षेत्र के लोगों को ऐसा पानी सप्लाई किया जा रहा था, जो पीने योग्य नहीं था। आयोग के निष्कर्षों के मुताबिक यह ऐसी अचानक हुई त्रासदी नहीं थी, जिसे किसी भी स्थिति में रोका नहीं जा सकता था। पानी और सीवरेज व्यवस्था की निगरानी में कमी, रखरखाव में लापरवाही, शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई का अभाव और विभिन्न स्तरों पर अधिकारियों-कर्मचारियों की चूक ने हालात को गंभीर बनाया।

करीब 600 पेज की इस जांच रिपोर्ट में मुख्य रिपोर्ट लगभग 150 पेज की है, जबकि शेष दस्तावेजों में मरीजों के इलाज से जुड़े रिकॉर्ड, उनके बयान, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, नगर निगम की पाइपलाइन से संबंधित दस्तावेज और टेंडर प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड शामिल किए गए हैं। आयोग ने उपलब्ध दस्तावेजों और बयानों के आधार पर घटना के कारणों के साथ-साथ उन प्रशासनिक परिस्थितियों की भी पड़ताल की है, जिनके चलते दूषित पानी की समस्या समय रहते नियंत्रित नहीं हो सकी।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जांच में 60 ट्यूबवेल और हैंडपंपों का पानी मानकों पर खरा नहीं उतरा था

न्यायिक जांच रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भागीरथपुरा में पानी की खराब गुणवत्ता को लेकर प्रशासन को कई साल पहले ही चेतावनी मिल चुकी थी। आयोग ने 8 फरवरी 2019 की मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए बताया कि भागीरथपुरा क्षेत्र के 60 ट्यूबवेल और हैंडपंपों के पानी की जांच की गई थी। जांच में पानी निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं पाया गया था। बोर्ड की ओर से यह चेतावनी भी दी गई थी कि ऐसे पानी के इस्तेमाल से स्वास्थ्य संबंधी खतरा पैदा हो सकता है और पानी का उपयोग उचित क्लोरीनेशन के बाद ही किया जाना चाहिए।

आयोग ने माना कि इस चेतावनी के बाद तत्कालीन नगर निगम आयुक्त और अपर आयुक्त के स्तर पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई किए जाने का कोई ठोस रिकॉर्ड सामने नहीं आया। रिपोर्ट में इस बात पर गंभीर सवाल उठाया गया है कि जब पानी की गुणवत्ता को लेकर पहले ही आधिकारिक स्तर पर चेतावनी सामने आ चुकी थी, तो उसके बाद समस्या के स्थायी समाधान के लिए किस स्तर पर क्या कार्रवाई की गई। आयोग के मुताबिक यदि उस समय प्रभावी कदम उठाए जाते तो आगे चलकर पैदा हुई स्थिति को काफी हद तक टाला जा सकता था।

क्रॉस कनेक्शन, बैकफ्लो और लीकेज की निगरानी में लापरवाही को माना गया अहम कारण

जांच आयोग ने भागीरथपुरा की पेयजल और सीवरेज व्यवस्था के तकनीकी पहलुओं की भी जांच की। रिपोर्ट में पाइपलाइन नेटवर्क की डिजाइन, रखरखाव और उसकी निगरानी में निर्धारित नियमों के पालन पर सवाल उठाए गए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया कि पेयजल और सीवरेज की पाइपलाइनों के बीच पर्याप्त दूरी और जरूरी सुरक्षा उपाय होना आवश्यक है। जहां दोनों नेटवर्क की पाइपलाइन एक-दूसरे को क्रॉस करती हैं, वहां अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है ताकि सीवेज का पानी किसी भी परिस्थिति में पेयजल लाइन में प्रवेश न कर सके।

रिपोर्ट में सीवर लाइन को संभव होने पर पेयजल लाइन से नीचे रखने, गलत कनेक्शन की रोकथाम, बैकफ्लो और लीकेज की लगातार निगरानी तथा पेयजल लाइन के प्रेशर और पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच पर जोर दिया गया है। आयोग के निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि इन व्यवस्थाओं की निगरानी और रखरखाव में पर्याप्त सतर्कता नहीं बरती गई। यही कारण रहा कि दूषित पानी की समस्या सामने आने से पहले संभावित जोखिमों को प्रभावी तरीके से नियंत्रित नहीं किया जा सका।

टेंडर प्रक्रिया में देरी ने भी बढ़ाई मुश्किल

भागीरथपुरा में संबंधित कामों की टेंडर प्रक्रिया को लेकर भी न्यायिक आयोग ने गंभीर टिप्पणियां की हैं। रिपोर्ट के अनुसार 15 अक्टूबर 2025 को अपर कमिश्नर रोहित सिसोनिया के स्तर पर इस संबंध में चर्चा हुई। इसके बाद 18 दिसंबर को संजीव श्रीवास्तव के साथ चर्चा हुई और 26 दिसंबर को वित्तीय बोली खोली गई। आयोग ने इस पूरी प्रक्रिया में हुई देरी को टाला जा सकने वाला माना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि फाइलें अलग-अलग स्तरों पर लंबित रहीं और प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता था।

टेंडर प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका का भी रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है। इनमें कार्यकारी इंजीनियर संजीव कुमार श्रीवास्तव, सहायक अभियंता सरताज कुमार प्रजापति, उप अभियंता सम्यक जैन, प्रभारी तकनीकी अधिकारी रोहित राय, टेंडर उप अभियंता श्वेता सिंह और टेंडर क्लर्क प्रज्ञा तिवारी सहित अन्य अधिकारी-कर्मचारी शामिल हैं। निवास बागरी और शरद सोनी की जिम्मेदारियों का भी रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है। एक स्थान पर तत्कालीन एडिशनल कमिश्नर भव्या मित्तल की जिम्मेदारी तय किए जाने की बात भी सामने आती है।

आयोग ने पूछा- किस स्तर पर कितनी देरी हुई और उसके लिए कौन जिम्मेदार था?

आयोग ने टेंडर के विभिन्न चरणों में हुई देरी को भी गंभीर माना है। रिपोर्ट के अनुसार टेंडर फाइलों की प्रोसेसिंग में हुई देरी की जिम्मेदारी तय करने के लिए संबंधित समिति की भूमिका की जांच आवश्यक है। आयोग ने यह निर्धारित करने की जरूरत बताई है कि प्रक्रिया में किस स्तर पर कितनी देरी हुई और उसके पीछे वास्तविक कारण क्या था।

इस समिति में संजीव कुमार श्रीवास्तव, श्रीकांत कांटे, देवधर दरवाई और अभय राजनगांवकर शामिल थे। आयोग की टिप्पणी के बाद अब यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि टेंडर प्रक्रिया से जुड़े निर्णयों और फाइलों के निस्तारण में किस स्तर पर देरी हुई और क्या समय पर प्रक्रिया पूरी होने से भागीरथपुरा की स्थिति को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती थी।

तत्कालीन निगम आयुक्तों के खिलाफ जिम्मेदारी तय करने लायक विशेष चूक का रिकॉर्ड नहीं मिला

जांच रिपोर्ट में तत्कालीन नगर निगम आयुक्त शिवम वर्मा को जिम्मेदार नहीं माना गया है। आयोग ने कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड में उनके स्तर पर ऐसी कोई विशेष चूक सामने नहीं आई, जिसके आधार पर उन्हें इस मामले के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सके। इसी तरह पूर्व नगर निगम आयुक्त प्रतिभा पाल को भी आयोग ने क्लीन चिट दी है।

इस तरह रिपोर्ट में एक ओर जहां व्यवस्था के विभिन्न स्तरों पर लापरवाही और प्रक्रिया में देरी को लेकर सवाल उठाए गए हैं, वहीं तत्कालीन निगम आयुक्तों की भूमिका को लेकर उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर आयोग ने उन्हें सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं माना है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि आयोग ने जिम्मेदारी तय करते समय अधिकारियों के पद के बजाय उनके स्तर पर सामने आए रिकॉर्ड और विशिष्ट कार्रवाई या चूक को आधार बनाया।

सुरक्षित पेयजल को प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी बताते हुए पाइपलाइन नेटवर्क की लगातार निगरानी पर जोर

न्यायिक जांच आयोग ने भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कई महत्वपूर्ण सिफारिशें भी की हैं। रिपोर्ट में पेयजल की गुणवत्ता की नियमित जांच, पाइपलाइन नेटवर्क का समय-समय पर निरीक्षण और उसके रखरखाव को अनिवार्य रूप से प्रभावी बनाने पर जोर दिया गया है। आयोग ने कहा है कि पानी की लाइन में लीकेज, कम प्रेशर, गंदगी, अवैध कनेक्शन अथवा पाइपलाइन में खराबी जैसी शिकायतों को सामान्य समस्या मानकर लंबित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि उन पर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए।

आयोग ने सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी बताया है। रिपोर्ट का व्यापक निष्कर्ष यही है कि भागीरथपुरा जैसी त्रासदी को केवल एक घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यदि पानी की गुणवत्ता से जुड़ी पुरानी चेतावनियों, पाइपलाइन और सीवरेज नेटवर्क की कमजोरियों, शिकायतों और रखरखाव संबंधी समस्याओं पर समय रहते गंभीरता से कार्रवाई होती, तो हालात इतने भयावह होने से रोके जा सकते थे।

36 मौतों की त्रासदी ने खोली व्यवस्था की पोल

भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई 36 मौतों की घटना ने न केवल पेयजल व्यवस्था की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए, बल्कि यह भी सामने ला दिया कि सरकारी तंत्र में किसी खतरे की शुरुआती चेतावनी मिलने के बाद उस पर कितनी गंभीरता से अमल किया जाता है। न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में 2019 की पानी की गुणवत्ता संबंधी चेतावनी से लेकर पाइपलाइन और सीवरेज नेटवर्क की निगरानी, शिकायतों के निस्तारण और टेंडर प्रक्रिया में हुई देरी तक कई स्तरों पर खामियां दर्ज की गई हैं।

रिपोर्ट का सबसे गंभीर संदेश यही है कि लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी केवल किसी एक विभाग या अधिकारी की नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की है। भागीरथपुरा की घटना में सामने आई कमियों को दूर करने के लिए केवल जिम्मेदारी तय करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पेयजल और सीवरेज नेटवर्क की नियमित तकनीकी जांच, समयबद्ध रखरखाव, पानी की गुणवत्ता की लगातार निगरानी और शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई की ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिससे भविष्य में किसी क्षेत्र को दूषित पानी की कीमत अपनी जान देकर न चुकानी पड़े।

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