
भोपाल/छतरपुर। "हमारी जमीन छीन ली जा रही है, मगर बदले में न तो उचित मुआवजा तय है और न ही पुनर्वास का कोई ठिकाना तय हुआ है. हम जाएं तो जाएं कहां…?” यह सवाल पूछते हुए मनहारी गांव की कल्लों बाई की आवाज भर्रा जाती है। वह कहती हैं कि अब उनके पास पीछे लौटने का कोई रास्ता नहीं बचा, इसलिए वे यहीं बैठकर अपने हक और अस्तित्व की लड़ाई लड़ेंगी। उनकी यह पीड़ा सिर्फ एक महिला की नहीं, बल्कि उन तमाम विस्थापित परिवारों की कहानी है जो अपनी जमीन और पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कल्लों बाई की आंखों में थकान है, लेकिन आवाज में अब भी जिद बाकी है। वह पिछले 9 दिनों से आंदोलन स्थल पर सैकड़ों आदिवासी किसानों के साथ डटी हुई हैं।
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना को लेकर संघर्ष अब खुलकर सामने आ गया है। एक ओर जहां हजारों आदिवासी, महिलाएं और बच्चे विस्थापन के विरोध में आंदोलन को तेज करते हुए ‘मिट्टी सत्याग्रह’ और भूख हड़ताल जैसे कदम उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशासन परियोजना के तहत जमीन खाली कराने की प्रक्रिया को सहमति और मुआवजे के आधार पर आगे बढ़ाने का दावा कर रहा है। इन दोनों तस्वीरों ने पूरे मामले को संवेदनशील और जटिल बना दिया है।
द मूकनायक के प्रतिनिधि ने मौके पर पहुंचकर देखा कि आंदोलन अब एक बड़े जनसैलाब में बदल चुका है। छतरपुर मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर विजावर तहसील अंतर्गत केन नदी के किनारे सैकड़ों की संख्या में आदिवासी, महिलाएं और बच्चे चिचलाती धूप में खुले आसमान के नीचे डटे हुए हैं। कई लोग शरीर पर मिट्टी लपेटे ‘मिट्टी सत्याग्रह’ कर रहे हैं, तो कुछ भूख हड़ताल पर बैठे हैं। इससे पहले आंदोलनकारियों ने अर्थी पर लेटकर भी अपना विरोध दर्ज कराया था, जिसने पूरे माहौल को और अधिक भावुक बना दिया।
नदी किनारे “जल, जंगल, जमीन” के नारे गूंज रहे हैं। महिलाएं अपने बच्चों के साथ धरने पर बैठी हैं, वहीं बुजुर्ग अपनी जमीन और पहचान बचाने की बात करते हुए भावुक हो उठते हैं। वहां मौजूद हर व्यक्ति के चेहरे पर थकान के साथ एक दृढ़ संकल्प भी दिखाई देता है, अपने हक और अस्तित्व की इस लड़ाई को किसी भी कीमत पर जारी रखने का।
आंदोलन के नौवें दिन स्थिति और अधिक गंभीर हो गई है, जब सोमवार सुबह बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी केन नदी में उतर गए। उन्होंने अपने शरीर पर गीली मिट्टी लपेटकर ‘मिट्टी सत्याग्रह’ शुरू किया और “जल, जंगल, जमीन” के नारे लगाते हुए अपने अधिकारों की आवाज बुलंद की। आंदोलनकारियों का कहना है कि वे इस भूमि के मूल निवासी हैं और बिना उचित मुआवजा व पुनर्वास के किसी भी कीमत पर अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे। कई बुजुर्गों ने भावुक होकर कहा कि यदि उन्हें जबरन हटाया गया तो वे इसी मिट्टी में दफन होना पसंद करेंगे।
आंदोलन के दौरान विरोध के अनोखे और मार्मिक तरीके भी सामने आए हैं। ‘मिट्टी सत्याग्रह’ के तहत आंदोलनकारियों ने अपने शरीर पर मिट्टी मलकर यह संदेश दिया कि वे इसी जमीन के मूल मालिक हैं और इससे उनका गहरा संबंध है। कई बुजुर्गों ने भावुक होकर कहा कि यदि उन्हें बिना न्याय के उनकी जमीन से बेदखल किया गया, तो वे इसी मिट्टी में दफन होना पसंद करेंगे। वहीं ‘आकाश सत्याग्रह’ के तहत तपती धूप और खुले आसमान के नीचे हजारों विस्थापित बिना अन्न ग्रहण किए जमीन पर लेटकर विरोध जता रहे हैं। भूख और भीषण गर्मी के कारण कई महिलाओं की हालत गंभीर बनी हुई है, जिससे आंदोलन की स्थिति और चिंताजनक हो गई है।
प्रदर्शन का स्वरूप केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक पीड़ा से भी भरा हुआ है। भीषण गर्मी के बीच खुले आसमान के नीचे ‘आकाश सत्याग्रह’ जारी है, जहां हजारों लोग जमीन पर लेटकर बिना अन्न ग्रहण किए विरोध कर रहे हैं। सामूहिक भूख हड़ताल के 48 घंटे पूरे हो चुके हैं, जिसके कारण कई महिलाओं और बुजुर्गों की तबीयत बिगड़ने लगी है।
मौके पर पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी ने स्थिति को और चिंताजनक बना दिया है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि प्रशासन उनकी हालत को नजरअंदाज कर रहा है और अब तक कोई वरिष्ठ अधिकारी उनसे बातचीत के लिए नहीं पहुंचा है।
जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पिछले दो दिनों से कई परिवारों के घरों में चूल्हे नहीं जले हैं, बावजूद इसके प्रशासन ने कोई ठोस पहल नहीं की है। उनका कहना है कि विस्थापन की प्रक्रिया में कानूनी प्रावधानों, जैसे धारा 11, 15 और 18 की अनदेखी की जा रही है और लोगों को जबरन हटाने का प्रयास हो रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल्द ही समाधान नहीं निकला तो आंदोलन और उग्र होगा।
जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर ने द मूकनायक से बातचीत में प्रशासन पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि आंदोलन के 9वें दिन भी प्रशासन की चुप्पी यह साबित करती है कि गरीब आदिवासियों की जान की कोई कीमत नहीं समझी जा रही है। उन्होंने बताया कि पिछले 48 घंटों से आंदोलनकारियों के घरों में चूल्हे तक नहीं जले हैं, लेकिन इसके बावजूद कोई जिम्मेदार अधिकारी उनकी सुध लेने नहीं पहुंचा है।
इसी बीच, प्रशासन ने जिले के विस्थापित ग्राम डुगरिया में जमीन खाली कराने की कार्रवाई शुरू कर दी है। अधिकारियों के अनुसार, यहां 14 मकानों को हटाया गया है, प्रशासन ने दावा किया है, यह पूरी प्रक्रिया ग्रामीणों की सहमति और मुआवजा प्राप्त करने के बाद ही की गई। प्रशासन का कहना है कि 5 ग्रामीणों ने स्वयं आगे आकर अपने मकान हटाने के लिए बुलडोजर की मांग की, जिसे उपलब्ध कराया गया। इसके अलावा 9 ऐसे मकान हटाए गए जिनके मालिक पहले ही दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके थे या जिनके पास गांव में एक से अधिक घर थे।
प्रशासन ने यह भी दावा किया है कि कार्रवाई के दौरान मानवीय दृष्टिकोण अपनाया गया है। जिन परिवारों के पास केवल एक ही घर है या जिन्होंने अभी तक पुनर्वास की व्यवस्था नहीं की है, उनके मकानों को नहीं छुआ गया। साथ ही जिन घरों में शादी या अन्य सामाजिक कार्यक्रम प्रस्तावित हैं, उन्हें भी फिलहाल मोहलत दी गई है। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी परिवार को बेघर नहीं होने दिया जाएगा और पूरी प्रक्रिया संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ाई जा रही है।
छतरपुर के स्थानीय पत्रकार संतोष सेन ने द मूकनायक से बातचीत में बताया कि केन-बेतवा परियोजना के विरोध में चल रहा आंदोलन अब धीरे-धीरे बड़ा रूप लेता जा रहा है। उन्होंने कहा कि आज सैकड़ों लोग नदी के किनारे बैठकर शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और उनकी संख्या लगातार बढ़ रही है।
संतोष सेन के मुताबिक, यह आंदोलन सिर्फ विस्थापन का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि आदिवासी समुदाय अपने “जल, जंगल, जमीन” के संरक्षण और अपनी संस्कृति को बचाने की लड़ाई भी लड़ रहा है। लोगों में अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर गहरी चिंता साफ दिखाई दे रही है, जो इस आंदोलन को और व्यापक बना रही है।
केन-बेतवा लिंक परियोजना को देश की महत्वाकांक्षी योजनाओं में गिना जाता है, जिसका उद्देश्य जल संसाधनों का बेहतर उपयोग और सूखा प्रभावित क्षेत्रों को राहत देना है। लेकिन इस परियोजना की जमीनी हकीकत यह भी दिखा रही है कि विकास और विस्थापन के बीच संतुलन बनाना कितना चुनौतीपूर्ण है। जहां एक तरफ प्रशासन चरणबद्ध तरीके से पुनर्वास और मुआवजे की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रभावित समुदाय अपने अस्तित्व और अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है।
फिलहाल केन नदी के किनारे हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। एक तरफ आंदोलनकारियों का आक्रोश और उनकी बिगड़ती सेहत है, तो दूसरी तरफ प्रशासनिक कार्रवाई और परियोजना को आगे बढ़ाने का दबाव।
केन-बेतवा लिंक परियोजना देश की पहली नदी जोड़ो योजना (River Linking Project) के तहत तैयार की गई एक महत्वाकांक्षी योजना है, जिसका उद्देश्य मध्य प्रदेश की केन नदी के पानी को उत्तर प्रदेश की बेतवा नदी तक पहुंचाना है। इस परियोजना का मकसद बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की कमी को दूर करना, सिंचाई सुविधाएं बढ़ाना और पेयजल उपलब्ध कराना है। इसके तहत केन नदी पर एक बड़ा बांध (दौधन बांध) बनाया जा रहा है, जिससे पानी को नहरों के जरिए बेतवा बेसिन तक ले जाया जाएगा। इससे लाखों हेक्टेयर जमीन की सिंचाई और लाखों लोगों को पेयजल मिलने का दावा किया जाता है।
इस परियोजना की परिकल्पना कई दशक पहले की गई थी, लेकिन इसे वास्तविक रूप देने की दिशा में बड़ा कदम साल 2021 में उठा, जब केंद्र सरकार और मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश की सरकारों के बीच समझौता (MoU) हुआ। इसके बाद परियोजना को औपचारिक मंजूरी मिली और काम शुरू किया गया। हालांकि, जहां एक ओर इसे विकास और जल संकट के समाधान के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके कारण बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र और गांवों के डूब में आने तथा हजारों लोगों के विस्थापन को लेकर लगातार विरोध भी सामने आ रहा है।
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