
नई दिल्ली: वंचित बहुजन आघाड़ी (VBA) के प्रमुख और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के पोते एडवोकेट प्रकाश आंबेडकर ने गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) कानून के दुरुपयोग पर तीखा हमला बोलते हुए भाजपा और कांग्रेस दोनों को घेरा है। उन्होंने आरोप लगाया है कि दोनों पार्टियां अपने शासित राज्यों में इस कठोर कानून को विपक्षी आवाजों, दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदायों को दबाने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं।
आंबेडकर ने कहा कि कांग्रेस ने 2019 में BJP द्वारा लाए गए UAPA संशोधनों का विधायी समर्थन किया और वोट दिया था। उन्होंने छतीसगढ़ और तेलंगाना में कांग्रेस शासन के दौरान UAPA के इस्तेमाल के उदाहरणों का जिक्र किया। तेलंगाना में हाल ही में कांग्रेस सरकार पर सोशल मीडिया हैंडल 'तेलुगु स्क्राइब' के खिलाफ UAPA लागू करने का आरोप लगा है, जिसे आलोचना दबाने की कोशिश बताया जा रहा है।
आंबेडकर खुद 2022 से बॉम्बे हाईकोर्ट में UAPA के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। UAPA 1967 में बना भारत का मुख्य आतंकवाद विरोधी कानून है। इसके माध्यम से भारत की संप्रभुता और अखंडता को खतरे में डालने वाली गतिविधियों को रोका और दंडित किया जाता है। इसके तहत केंद्र सरकार किसी भी व्यक्ति या संगठन को आधिकारिक राजपत्र (Gazette) के माध्यम से आतंकवादी घोषित कर सकती है। इस कानून के अंतर्गत आजीवन कारावास और मृत्युदंड तक का प्रावधान है। इसके तहत गिरफ्तार व्यक्तियों को जमानत मिलना बहुत कठिन होता है। यदि अदालत को प्रथम दृष्टया आरोप सही लगते हैं, तो जमानत नहीं दी जाती है।
आंबेडकर ने निवारक हिरासत (Preventive Detention) को लेकर गंभीर संवैधानिक सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि निवारक हिरासत किसी अपराध की सजा नहीं, बल्कि भविष्य में संभावित खतरे को रोकने की सावधानीपूर्ण शक्ति है, जो सार्वजनिक व्यवस्था या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीमित परिस्थितियों में ही इस्तेमाल होनी चाहिए।
1978 में जनता पार्टी सरकार ने संविधान (44वें संशोधन) अधिनियम के तहत अनुच्छेद 22 से संबंधित संशोधन किया था। इस संशोधन की धारा 3 को आज तक अधिसूचित नहीं किया गया है। आंबेडकर का तर्क है कि अधिसूचना की अनुपस्थिति में अनुच्छेद 22 निष्क्रिय (dormant) हो गया है।
1981 के ए.के. रॉय बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने कहा था कि अधिसूचना न होने के बावजूद पुराना अनुच्छेद 22(4) लागू रहेगा। आंबेडकर इसे न्यायपालिका द्वारा संसद की भूमिका छीनने वाला "अजीब" फैसला बताते हैं। उनका कहना है कि विभिन्न संशोधन संबंधी फैसलों के आलोक में यह टिकता नहीं है।
आंबेडकर का मुख्य सवाल है कि यदि अनुच्छेद 22 निष्क्रिय है तो निवारक हिरासत कानून संवैधानिक रूप से वैध कैसे टिक सकते हैं? और क्या निवारक हिरासत को आपराधिक सजा के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है?
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