
भोपाल। मध्यप्रदेश में इंदौर के भागीरथपुरा दूषित पानी कांड की जांच रिपोर्ट अब ऑनलाइन उपलब्ध होगी। सोमवार को मामले से जुड़ी सात जनहित याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई हुई। इस दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया कि जांच रिपोर्ट ऑनलाइन उपलब्ध नहीं होने के कारण उसका अध्ययन करने और उसके आधार पर आगे के तर्क तैयार करने में परेशानी हो रही है। वकीलों ने रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग करते हुए आवेदन भी प्रस्तुत किया।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर और न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की पीठ ने की। सभी पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने जांच रिपोर्ट को अपनी वेबसाइट पर ऑनलाइन अपलोड करने का आदेश दिया। अब संबंधित अधिवक्ता रिपोर्ट का अध्ययन कर उसके आधार पर अपने तर्क कोर्ट के सामने रख सकेंगे। मामले में अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को होगी।
दूषित पानी से हुई थीं 36 मौतें
दिसंबर-जनवरी के दौरान इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी की शिकायतों के बाद बड़ी संख्या में लोग बीमार हुए थे। इस मामले में 36 लोगों की मौत की बात सामने आई थी। घटना को लेकर हाई कोर्ट में सात जनहित याचिकाएं दायर की गई हैं।
इन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने मामले की जांच के लिए एक सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया था। आयोग करीब दो महीने पहले अपनी सीलबंद रिपोर्ट हाई कोर्ट को सौंप चुका है।
हालांकि, एक याचिकाकर्ता के वकील की ओर से रिपोर्ट सार्वजनिक किए जाने का विरोध किए जाने के बाद कोर्ट ने रिपोर्ट को सार्वजनिक करने पर रोक लगा दी थी। इसके बाद कोर्ट ने याचिकाओं से जुड़े अधिवक्ताओं को रजिस्ट्रार कार्यालय में जाकर रिपोर्ट का अवलोकन करने की अनुमति दी थी।
वकीलों ने कहा- रिपोर्ट सार्वजनिक होना जरूरी
रिपोर्ट ऑनलाइन उपलब्ध कराने की मांग को लेकर अधिवक्ता मनीष यादव, रितेश इनाणी और अन्य ने हाई कोर्ट में आवेदन प्रस्तुत किया था। सोमवार को इसी आवेदन पर सुनवाई हुई।
अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि भागीरथपुरा कांड की वजह से इंदौर की छवि प्रभावित हुई है। इसलिए यह सामने आना जरूरी है कि दूषित पानी की समस्या किस वजह से पैदा हुई और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी थी। उन्होंने कहा कि घटना में कई परिवारों ने अपने लोगों को खोया है, ऐसे में जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक किए बिना प्रभावित लोगों को पूरी जानकारी से दूर रखना उचित नहीं होगा।
जांच आयोग ने इन बिंदुओं पर की जांच
जांच आयोग को दूषित पानी कांड से जुड़े कई महत्वपूर्ण बिंदुओं की जांच की जिम्मेदारी दी गई थी। इनमें मुख्य रूप से यह पता लगाना शामिल था कि पानी दूषित होने का कारण क्या था और क्या भागीरथपुरा में वितरित किया जा रहा पेयजल दूषित था।
आयोग को दूषित पानी के स्रोत और उसकी प्रकृति की भी जांच करनी थी। इसमें सीवेज के पानी में मिलने, औद्योगिक कारण, पाइपलाइन क्षतिग्रस्त होने या किसी अन्य कारण की जांच शामिल थी।
इसके अलावा दूषित पानी से हुई वास्तविक मौतों की संख्या, उससे होने वाली बीमारी, प्रथमदृष्ट्या जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की पहचान तथा प्रभावित लोगों को दिए जाने वाले मुआवजे से जुड़े बिंदुओं की भी जांच की गई।
रिपोर्ट के अंतिम हिस्से में जांच का सार
जांच रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट का अवलोकन कर चुके अधिवक्ताओं के अनुसार इसके अंतिम करीब 100 पेजों में जांच का सार दिया गया है।
अधिवक्ताओं के मुताबिक, आयोग ने अपनी जांच में यह उल्लेख किया है कि शहर के बड़े हिस्से में दूषित पानी की समस्या की जानकारी अधिकारियों को वर्ष 2018 से थी। इसके बावजूद समस्या के समाधान के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए।
रिपोर्ट के अनुसार, भागीरथपुरा के रहवासी सितंबर से लगातार गंदे पानी की शिकायत कर रहे थे, लेकिन उनकी शिकायतों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
नई पेयजल लाइन के टेंडर में 20 महीने की देरी
रिपोर्ट में नई पेयजल लाइन के टेंडर की प्रक्रिया में करीब 20 महीने की देरी का भी उल्लेख होने की बात सामने आई है। अधिवक्ताओं के अनुसार, जांच में यह भी कहा गया है कि टेंडर स्वीकृति से जुड़ी फाइलों को लंबे समय तक लंबित रखा गया।
आयोग ने पेयजल और ड्रेनेज लाइन बिछाने के दौरान हुई कथित गड़बड़ियों की ओर भी इशारा किया है। रिपोर्ट में दोनों लाइनों के एक साथ बिछाए जाने से पेयजल दूषित होने की स्थिति बनने की बात कही गई है।
अलग जल-मल बोर्ड बनाने की सिफारिश
जांच आयोग ने पेयजल और ड्रेनेज व्यवस्था से जुड़ी व्यवस्थाओं में सुधार के लिए नगर निगम से पेयजल और ड्रेनेज का काम अलग कर एक स्वतंत्र जल-मल बोर्ड गठित करने की सिफारिश किए जाने की बात भी सामने आई है। अब हाई कोर्ट के आदेश के बाद जांच रिपोर्ट ऑनलाइन उपलब्ध होने से मामले से जुड़े सभी पक्ष उसका विस्तृत अध्ययन कर सकेंगे।
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