
प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बिना औपचारिक गिरफ्तारी के एक व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखने पर उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस खुद को ही कानून समझने लगी है और पूरी तरह से अपनी मनमानी कर रही है।
अपने 7 अक्टूबर के आदेश में कोर्ट ने नोएडा के एसीपी कमलेश कांत और जांच अधिकारी अनुज कुमार के रवैये की कड़ी आलोचना की। अदालत ने कहा कि ये दोनों अधिकारी बीएनएसएस (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की प्रक्रियाओं से पूरी तरह अनजान हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने वैधानिक आवश्यकताओं के प्रति उनके लापरवाही भरे रवैये पर भी सवाल उठाए।
इस गंभीर मामले का संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को एक अहम निर्देश दिया है। कोर्ट ने डीजीपी से बेहतर पुलिस ट्रेनिंग मॉड्यूल तैयार करने को कहा है, ताकि अधिकारियों को नागरिक स्वतंत्रता और गिरफ्तारी या हिरासत से पहले अपनाई जाने वाली उचित कानूनी प्रक्रियाओं के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने इस मामले में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने व्यक्ति की पुलिस हिरासत को 'गैरकानूनी' करार देते हुए याचिका मंजूर कर ली और आदेश दिया कि अगर वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने चिंता जताते हुए कहा कि यह मामला उत्तर प्रदेश पुलिस की दयनीय कार्यप्रणाली को दर्शाता है। कोर्ट के अनुसार, उनके सामने बार-बार ऐसे मामले आ रहे हैं जिनमें तय कानूनी प्रक्रियाओं का सही ढंग से पालन नहीं किया जा रहा है। ऐसा लगता है कि पुलिस द्वारा दस्तावेजों को सिर्फ एक औपचारिकता के तौर पर तैयार किया जाता है, जो पूरी तरह से गलतियों से भरे होते हैं।
घटना के तथ्यों का जिक्र करते हुए अदालत ने बताया कि 23 अगस्त को दो गुटों में झड़प हुई थी, जिसके बाद नोएडा पुलिस ने शाम 7:34 बजे दीपक (याचिकाकर्ता) समेत पांच लोगों को हिरासत में लिया। उसी दिन रात 9:39 बजे एक लिखित शिकायत के आधार पर एफआईआर दर्ज की गई, लेकिन दीपक की औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन 24 अगस्त को दोपहर 2:57 बजे दिखाई गई।
यह स्पष्ट था कि एफआईआर दर्ज होने से काफी पहले ही दीपक पुलिस की गिरफ्त में था। कोर्ट ने पाया कि इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि संबंधित दस्तावेज बाद में अपनी सुविधानुसार भरे गए। याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर एक सादे कागज पर लिए गए थे और जांच अधिकारी अनुज कुमार ने इस खाली कागज पर प्रतिहस्ताक्षर भी कर दिए थे, ताकि गिरफ्तारी के कारण बाद में अपनी मर्जी से गढ़े जा सकें।
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि स्थिति तनावपूर्ण थी और पुलिस ने हालात बिगड़ने से रोकने के लिए ऐसा कदम उठाया। लेकिन अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि कोई भी परिस्थिति पुलिस को कानून के खिलाफ जाकर काम करने की छूट नहीं देती है।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी और बीएनएसएस के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को जो भी सुरक्षा मिलती है, वह सीधे तौर पर अनुच्छेद 22(1) के तहत दी गई संवैधानिक गारंटी से जुड़ी हुई है। अदालत ने पुलिस द्वारा आम नागरिकों की स्वतंत्रता के प्रति दिखाई जा रही इस घोर लापरवाही पर गहरी नाराजगी व्यक्त की।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि भविष्य में प्रक्रिया की जानकारी न होने के बहाने ऐसी मनमानी कार्रवाइयों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत ने साफ कहा कि संदिग्धों को 24 घंटे से ज्यादा थाने में रखकर छोड़ देने के मामलों को अब से दुर्भावनापूर्ण माना जाएगा। इसके साथ ही, अदालत ने एसीपी कमलेश कांत और जांच अधिकारी अनुज कुमार के खिलाफ अपनी इस नाराजगी को उनकी संबंधित सर्विस बुक में दर्ज करने का कड़ा निर्देश दिया है।
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