
नई दिल्ली: बीते 10 अक्टूबर को दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने और उनके घायल होने की घटनाओं के बाद प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) ने एक बेहद अहम कदम उठाया है। पीसीआई ने प्रदर्शनों और रैलियों की रिपोर्टिंग करने वाले मीडियाकर्मियों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन नए नियमों का मुख्य उद्देश्य पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, जिम्मेदार पत्रकारिता को बढ़ावा देना और मीडिया संस्थानों व पुलिस प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना है।
नई गाइडलाइंस में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों को अपना वैध प्रेस पहचान पत्र हमेशा प्रमुखता से पहनना चाहिए। यह कार्ड उनके मीडिया संस्थान, प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) या फिर राज्य सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय द्वारा जारी किया हुआ होना चाहिए। गले में पहने जाने वाले डोरी (लैनयार्ड) को अच्छी तरह से बांधकर रखने की सलाह दी गई है ताकि भीड़ के बीच चलते समय या किसी टकराव की स्थिति में इसके फंसने का खतरा न रहे।
दिशा-निर्देशों के अनुसार, कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा रोके जाने पर पत्रकारों को बिना घबराए शांत रहकर अपनी पहचान बतानी चाहिए। मीडियाकर्मियों को पूरी तरह से तटस्थ और पेशेवर रुख अपनाने को कहा गया है। उन्हें किसी भी प्रदर्शन का हिस्सा बनने, किसी एक पक्ष का समर्थन करने, उकसावे वाली कार्रवाई करने या पुलिस व प्रदर्शनकारियों के बीच किसी भी तरह का दखल देने से सख्त मना किया गया है।
पीसीआई ने पत्रकारों को हिदायत दी है कि वे पुलिस के आदेशों का सम्मान करें और तनावपूर्ण स्थिति में बहस करने से बचें। सुरक्षा कारणों से दिए गए पुलिस के निर्देशों का तुरंत पालन करना चाहिए। इसके साथ ही तनाव बढ़ने या पुलिस कार्रवाई की आशंका होने पर पत्रकारों को एक सुरक्षित दूरी बनाए रखनी चाहिए। मीडियाकर्मियों को किसी भी पुलिस बैरिकेड या वाहनों पर अपने कैमरे और रिकॉर्डिंग उपकरण लगाने से बचने को कहा गया है, जिससे आवाजाही बाधित न हो और सरकारी संपत्ति को कोई नुकसान न पहुंचे।
भीड़ के बीच सुरक्षित रूप से चलने के लिए मीडियाकर्मियों को छोटे कदम रखने की सलाह दी गई है ताकि गिरने या कुचले जाने का खतरा कम हो सके। पत्रकारों को हर समय अपने आस-पास के माहौल, भीड़ के बदलते व्यवहार, शोर और संभावित खतरों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए। इसके साथ ही एक सुरक्षित निकास मार्ग हमेशा ध्यान में रखना अनिवार्य बताया गया है। आंसू गैस या धुएं की स्थिति में सुरक्षित रास्तों का इस्तेमाल करते हुए भीड़ के और ज्यादा अंदर जाने के बजाय प्रभावित इलाके से तुरंत बाहर निकलने की सलाह दी गई है।
निजी सुरक्षा को लेकर पीसीआई ने कहा है कि पत्रकारों को अपने साथ एक छोटी आपातकालीन किट जरूर रखनी चाहिए। इसमें प्राथमिक उपचार का सामान, जरूरी दवाएं, पानी, उच्च प्रोटीन वाले स्नैक्स, फ्लैशलाइट, तौलिया और आंखों के बचाव के लिए चश्मा होना चाहिए। खतरे की आशंका को देखते हुए हेलमेट या बॉडी आर्मर भी पहना जा सकता है। हालांकि, यह भी स्पष्ट किया गया है कि सुरक्षा उपकरणों के भरोसे बेवजह के जोखिम नहीं उठाने चाहिए।
इसके अलावा, जमीन पर पड़े आंसू गैस के गोले या फ्लैश-बैंग डिवाइस को छूने या उठाने से सख्त मना किया गया है, क्योंकि वे गर्म हो सकते हैं, फट सकते हैं या उनमें खतरनाक रसायन हो सकता है।
रिपोर्टिंग के दौरान न्यूजरूम के साथ लगातार संपर्क बनाए रखना बेहद जरूरी बताया गया है। मीडिया संस्थानों को एक ऐसा संपर्क व्यक्ति नियुक्त करना चाहिए जो मौके पर मौजूद पत्रकारों की लोकेशन पर नजर रख सके और आपात स्थिति में तुरंत मदद पहुंचा सके।
फ्रीलांस पत्रकारों को भी अपने किसी भरोसेमंद संपादक को अपनी लोकेशन और वापसी के समय की पूर्व जानकारी देनी चाहिए। मौके पर मौजूद सभी पत्रकारों को सहकर्मियों के साथ संवाद बनाए रखने और एक-दूसरे की सुरक्षा का ध्यान रखने की भी सलाह दी गई है। पूर्वनियोजित प्रदर्शनों के मामले में मीडिया संस्थानों को पुलिस अधिकारियों के साथ समन्वय स्थापित करने को कहा गया है।
पत्रकारिता के उच्च मापदंडों का जिक्र करते हुए दिशा-निर्देशों में निष्पक्ष और सटीक रिपोर्टिंग पर जोर दिया गया है। पत्रकारों को अफवाहों, आरोपों और सत्यापित तथ्यों के बीच हमेशा फर्क करना चाहिए। किसी भी जानकारी को प्रकाशित करने से पहले कई स्रोतों से उसकी पुष्टि करना आवश्यक है। चश्मदीदों से बात करते समय उनकी विश्वसनीयता, उनके नजरिए और घटना स्थल से उनकी दूरी का सही आकलन करना भी जरूरी बताया गया है।
पीसीआई ने स्पष्ट किया है कि प्रदर्शनकारियों, पुलिस या सरकारी अधिकारियों के बयानों को समान रूप से परखा जाना चाहिए। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पुलिस की रणनीतिक गतिविधियों या निकास मार्गों का रियल-टाइम (सीधा) प्रसारण नहीं किया जाना चाहिए। लोगों की मंशा पर अपनी तरफ से कोई राय बनाने के बजाय जो असल में दिख रहा है, सिर्फ वही रिपोर्ट करना चाहिए।
नाबालिगों, घायलों और संकट में फंसे आम नागरिकों की तस्वीरें या वीडियो बनाते समय विशेष संवेदनशीलता बरतने को कहा गया है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी भी कवरेज से उनकी निजता का हनन न हो या उन्हें किसी खतरे में न डाला जाए। किसी भी एक्सक्लूसिव फुटेज या लाइव ब्रॉडकास्ट के दबाव में पत्रकारों को कभी भी सुरक्षा से समझौता नहीं करना चाहिए।
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