
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि किसी आरोपी के रिश्तेदारों को पुलिस द्वारा प्रताड़ित करना या परेशान करना पूरी तरह से एक 'औपनिवेशिक प्रथा' है। कोर्ट के अनुसार, यह कृत्य भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मूल अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए अदालत ने पुलिस अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं। पुलिस को अब याचिकाकर्ताओं को बेवजह थाने बुलाने, उन्हें हिरासत में रखने या किसी भी बहाने से धमकाने से रोक दिया गया है।
यह अहम टिप्पणी जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने की है। यह बेंच एक महिला द्वारा दायर आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें प्रयागराज पुलिस पर प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाए गए थे।
याचिकाकर्ता महिला ने अदालत को बताया कि उसके बेटे पर एक लड़की को बहला-फुसलाकर भगाने का आरोप है। भागे हुए जोड़े की तलाश के नाम पर पुलिस लगातार उसे और उसके परिवार के अन्य सदस्यों को परेशान कर रही थी। परिजनों को रोजाना थाने बुलाया जाता था, उन्हें दिनभर वहीं बैठाए रखा जाता और फिर शाम होने पर ही घर जाने दिया जाता था।
पुलिस के इस रवैये पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने कहा कि आज के आधुनिक युग में जांच के तरीके बदलने चाहिए। अदालत ने नसीहत दी कि पुलिस को आरोपी के निर्दोष रिश्तेदारों को डराने-धमकाने के बजाय उसकी तलाश के लिए आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने अपने 8 मई के आदेश में इस पूरे घटनाक्रम पर जवाब तलब किया है। अदालत ने पुलिस उपायुक्त (यमुनापार, प्रयागराज), एसएचओ (करछना, यमुनापार) और प्रयागराज पुलिस कमिश्नरेट को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
इन सभी पुलिस अधिकारियों को न्यायालय के समक्ष यह स्पष्ट करना होगा कि आखिर किन परिस्थितियों और किस अधिकार के तहत याचिकाकर्ताओं को हर रोज थाने बुलाकर बैठाया जा रहा था।
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