इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला: सिर्फ बेहिसाब संपत्ति होना 'मनी लॉन्ड्रिंग' नहीं, अपराध से सीधा लिंक होना जरूरी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि PMLA के तहत कार्रवाई के लिए बेहिसाब संपत्ति का किसी 'अपराध' से सीधा संबंध होना अनिवार्य है। महज आय के अज्ञात स्रोत होने से उसे अपराध से अर्जित आय नहीं माना जा सकता।
Allahabad High Court
इलाहाबाद हाई कोर्ट
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प्रयागराज। धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत एक अहम फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आय के अज्ञात या बेहिसाब स्रोतों से प्राप्त संपत्ति को स्वतः ही 'अपराध से अर्जित आय' नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सख्त कार्रवाई के लिए उस संपत्ति का किसी निर्धारित अपराध से सीधा और स्पष्ट संबंध होना बेहद अनिवार्य है।

जस्टिस विक्रम डी. चौहान की पीठ ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपी संजय कुमार उर्फ संजय धीमान को जमानत देते हुए यह महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि किसी व्यक्ति के पास अज्ञात स्रोतों से अर्जित संपत्तियां हो सकती हैं। हालांकि, महज इस आधार पर यह मान लेना पूरी तरह गलत है कि वे संपत्तियां किसी निर्धारित अपराध के जरिए ही कमाई गई हैं।

यह पूरा मामला प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा हिमाचल प्रदेश में कथित अवैध खनन से जुड़ी कई प्राथमिकियों (एफआईआर) के आधार पर शुरू की गई कार्रवाई से जुड़ा है। जांच एजेंसी का आरोप था कि हिमाचल में अवैध खनन से कमाए गए पैसों का इस्तेमाल उत्तर प्रदेश में एक स्टोन क्रशर यूनिट खरीदने के लिए किया गया था। ईडी के मुताबिक, यह यूनिट भी बाद में अवैध खनन से जुड़े लेन-देन का हिस्सा बन गई।

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने अदालत के सामने मजबूती से तर्क रखा कि हिमाचल में दर्ज किसी भी एफआईआर में आरोपी का नाम शामिल नहीं है। अदालत को यह भी बताया गया कि उन मामलों की जांच के बाद पुलिस क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर चुकी है, जिनमें से कई को सक्षम अदालतों ने स्वीकार भी कर लिया है। इसके अलावा, यह दलील भी दी गई कि आरोपी 18 नवंबर 2024 से जेल में बंद है, जबकि मामले का ट्रायल अब तक ठीक से शुरू भी नहीं हो सका है।

दूसरी तरफ, जमानत याचिका का कड़ा विरोध करते हुए ईडी ने कहा कि आरोपी ने अवैध खनन से उत्पन्न धन को सफेद करने में अहम भूमिका निभाई है। जांच एजेंसी का तर्क था कि यूपी की स्टोन क्रशर यूनिट को उसी अवैध कमाई के जरिए खरीदा गया था।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने PMLA, 2002 के प्रावधानों की बारीकी से जांच की। अदालत ने पाया कि मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में 'अपराध से अर्जित आय' का किसी निर्धारित आपराधिक गतिविधि से उत्पन्न होना एक बुनियादी शर्त है। कोर्ट ने इस तथ्य पर विशेष गौर किया कि जिन एफआईआर को ईडी ने अपने केस (ECIR) का आधार बनाया था, उनमें क्लोजर रिपोर्ट लग चुकी है और चार मामलों में अदालतें उसे मान भी चुकी हैं। इस बिंदु ने ईडी के उस दावे को काफी कमजोर कर दिया कि जब्त किया गया पैसा अपराध की कमाई है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल बेहिसाब संपत्ति होने के आरोप से PMLA के वैधानिक प्रावधान पूरे नहीं होते हैं। ऐसी संपत्तियों पर अन्य मौजूदा कानूनों के तहत जरूर कार्रवाई हो सकती है, लेकिन जब तक किसी निर्धारित अपराध के साथ उसका सीधा संबंध (नेक्सस) स्थापित नहीं होता, तब तक PMLA नहीं लगाया जा सकता।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लंबी कैद पर सुप्रीम कोर्ट के हालिया ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि जब सुनवाई उचित समय के भीतर पूरी होने की कोई संभावना न हो, तो मुकदमे से पहले की हिरासत को सजा के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

आरोपी की हिरासत अवधि, जांच पूरी होने के तथ्य, एक सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिलने और मौजूद साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करते हुए हाई कोर्ट ने 1 जुलाई को पारित अपने आदेश में आरोपी की जमानत अर्जी मंजूर कर ली।

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