
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि निर्वाचन अधिकरण (चुनाव ट्रिब्यूनल) के पास किसी भी जाति प्रमाण पत्र को फर्जी घोषित करने या उसकी सत्यता परखने का अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि किसी चुनाव याचिका के माध्यम से उम्मीदवार के जाति प्रमाण पत्र की वैधता को न तो चुनौती दी जा सकती है और न ही उसकी जांच की जा सकती है।
यह अहम टिप्पणी जस्टिस नीरज तिवारी की पीठ ने राधा चरण द्वारा दायर एक चुनाव याचिका को खारिज करते हुए की। इस याचिका में कुशीनगर जिले की रामकोला (335) विधानसभा सीट से विधायक विनय प्रकाश गोंड के निर्वाचन को अदालत में चुनौती दी गई थी।
गौरतलब है कि साल 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान रामकोला विधानसभा सीट अनुसूचित जाति (एससी) के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित थी। याचिकाकर्ता ने अपनी दलील में आरोप लगाया था कि विनय प्रकाश गोंड मूल रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से ताल्लुक रखते हैं। याचिका के मुताबिक, उन्होंने इस आरक्षित सीट से नामांकन दाखिल करने के लिए फर्जी तरीके से अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र बनवाया था।
इस मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने साल 1994 के 'कुमारी माधुरी पाटिल बनाम अपर आयुक्त' केस के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति और जाति के दावों की पुष्टि करने का विशेष अधिकार केवल तथ्य-खोजने वाली विशेषज्ञ जांच समितियों के पास ही सुरक्षित है।
अदालत ने अपने आदेश में इस बात का भी संज्ञान लिया कि राज्य सरकार ने जाति प्रमाण पत्रों की वैधता की गहन जांच के लिए पहले से ही एक त्रिस्तरीय जांच समिति का गठन किया हुआ है। केवल इन्हीं विशेष समितियों के पास किसी भी जाति प्रमाण पत्र को वैध या अवैध घोषित करने का पूर्ण एकाधिकार प्राप्त है।
अपने 6 जुलाई के फैसले में हाईकोर्ट ने मामले का निपटारा करते हुए कहा कि उपरोक्त तथ्यों और पुराने कानूनी फैसलों के आलोक में यह बिल्कुल स्पष्ट है कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किए गए किसी भी जाति प्रमाण पत्र को चुनाव ट्रिब्यूनल के समक्ष चुनाव याचिका में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
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