
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 के बढ़ते दुरुपयोग पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि नौकरशाही और राज्य तंत्र इस कानून को आम नागरिकों के 'उत्पीड़न के एक साधन' के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। अधिकारियों को चेतावनी देते हुए कोर्ट ने कहा कि अगर इस तरह के आचरण पर रोक नहीं लगी, तो उन्हें दंडात्मक हर्जाने का सामना करना पड़ेगा।
जस्टिस संदीप जैन ने 10 सितंबर को दिए अपने आदेश में इस बात पर जोर दिया कि महज एक या दो आपराधिक मुकदमों के आधार पर किसी भी व्यक्ति पर 'गुंडा' होने का ठप्पा नहीं लगाया जा सकता। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रशासन जानबूझकर इन स्पष्ट कानूनी सिद्धांतों की अनदेखी कर रहा है और स्थापित नियमों के विपरीत जाकर लगातार आदेश पारित कर रहा है।
न्यायालय ने अपनी सख्त टिप्पणी में कहा कि अब समय आ गया है जब नौकरशाही को एक कड़ा संदेश दिया जाए। उन्हें इस तरह के मनमाने रवैये को तत्काल रोकना होगा, अन्यथा अधिकारियों को दंडात्मक कार्रवाई और आर्थिक दंड भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए।
इस अहम फैसले के साथ ही हाईकोर्ट ने गाजियाबाद निवासी अभिषेक त्यागी की याचिका को मंजूर कर लिया। अदालत ने उनके खिलाफ गुंडा एक्ट के तहत शुरू की गई सभी कार्यवाहियों को रद्द करते हुए उन्हें 50,000 रुपये का हर्जाना देने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार को यह छूट भी दी है कि वह मुआवजे की यह राशि उन संबंधित अधिकारियों के वेतन से सीधे वसूल सकती है जिन्होंने यह गलत आदेश पारित किया था।
इस कानूनी प्रक्रिया में उच्च न्यायालय ने गाजियाबाद के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त और मेरठ मंडल के आयुक्त द्वारा पारित किए गए पुराने आदेशों को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। अभिषेक त्यागी के खिलाफ यह पूरी कार्रवाई केवल दो दर्ज आपराधिक मामलों को आधार बनाकर शुरू की गई थी।
गाजियाबाद के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त ने 18 सितंबर 2025 को एक आदेश जारी किया था। उस आदेश के तहत त्यागी को छह महीने तक अपने स्थायी पते पर ही रहने और हर महीने के दूसरे व चौथे शनिवार को संबंधित थाने में अनिवार्य रूप से हाजिरी लगाने का निर्देश दिया गया था।
अभिषेक त्यागी ने पुलिस के इस फैसले को चुनौती दी थी। हालांकि, 10 दिसंबर 2025 को मेरठ मंडल के आयुक्त ने उनकी अपील को खारिज कर दिया था, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
मामले की विस्तृत सुनवाई करते हुए अदालत ने पाया कि त्यागी पर दर्ज दोनों मुकदमों के बीच तीन साल का लंबा अंतर है। यह तथ्य स्पष्ट करता है कि वह कोई आदतन अपराधी नहीं हैं। कोर्ट ने अपने अंतिम निष्कर्ष में कहा कि यह साफ तौर पर जाहिर होता है कि प्रशासन द्वारा इस अधिनियम के मूल उद्देश्यों को दरकिनार कर इसे केवल उत्पीड़न के एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।
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