नई दिल्ली: मेडिकल इमरजेंसी के दौरान अब समलैंगिक और अविवाहित जोड़े भी अपने पार्टनर की ओर से स्वास्थ्य से जुड़े अहम फैसले ले सकेंगे। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) ने बुधवार को दिल्ली उच्च न्यायालय में एक हलफनामा दायर कर यह महत्वपूर्ण जानकारी साझा की है।
आयोग ने स्पष्ट किया है कि आपात स्थिति में ऐसे पार्टनर्स मेडिकल निर्णय ले सकते हैं, बशर्ते उन्हें मरीज के अक्षम होने की स्थिति के लिए पहले से नामित या अधिकृत किया गया हो।
एनएमसी ने यह हलफनामा एक याचिका के जवाब में दाखिल किया है। इस याचिका में सरकार से मांग की गई थी कि समलैंगिक और अविवाहित पार्टनर्स को मेडिकल इमरजेंसी में सहमति देने का अधिकार देने के लिए उचित दिशा-निर्देश बनाए जाएं।
याचिकाकर्ता अर्शिया ठक्कर ने इस मामले में अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने भारतीय चिकित्सा परिषद (व्यावसायिक आचरण, शिष्टाचार और नैतिकता) विनियम, 2002 के नियम 7.16 को चुनौती दी है।
मौजूदा नियम 7.16 के तहत किसी भी मरीज या नाबालिग के इलाज और मेडिकल प्रक्रियाओं के लिए केवल पति, पत्नी, माता-पिता या अभिभावक की सहमति को ही अनिवार्य माना गया है।
इससे पहले 20 अगस्त को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने इस मुद्दे पर सरकार से कड़े सवाल किए थे। कोर्ट ने पूछा था कि आपात स्थिति में समलैंगिक और अविवाहित जोड़ों को एक-दूसरे के लिए फैसले लेने के अधिकार से बाहर क्यों रखा गया है।
अदालत ने अपनी अहम टिप्पणी में कहा था कि लिव-इन रिलेशनशिप को मान्यता मिलने के साथ ही इससे जुड़े अधिकार भी मिलने चाहिए। कोर्ट का यह भी मानना था कि जब कोई व्यक्ति समाज के बहुसंख्यक वर्ग से अलग रास्ता चुनता है, तो अक्सर उसे निशाना बनाया जाता है और समाज उसे आसानी से स्वीकार नहीं करता।
अपने हलफनामे में एनएमसी ने एक और बड़ी राहत की बात कही है। आयोग के अनुसार यदि पार्टनर ने पहले से कोई नॉमिनेशन नहीं भी किया है, तब भी उचित परिस्थितियों में समलैंगिक या लिव-इन पार्टनर को यह अधिकार मिल सकता है।
ऐसे मामलों में मौजूदा कानूनों, सत्यापन और सुरक्षा उपायों के अधीन रहते हुए पार्टनर को 'देखभाल के रिश्ते' (रिलेशनशिप ऑफ केयर) या 'नेक्स्ट फ्रेंड' के रूप में माना जा सकता है। इससे वे अपने अक्षम पार्टनर की ओर से चिकित्सा निर्णय लेने के योग्य हो जाएंगे।
हलफनामे में जोर देकर कहा गया है कि यदि किसी वयस्क ने अपनी अक्षमता की स्थिति के लिए अपने पार्टनर को अधिकृत किया है, तो उसे महज लिंग, जेंडर या यौन रुझान के आधार पर रोकना पूरी तरह गलत है।
आयोग ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि उनका रिश्ता पारंपरिक विवाह की श्रेणी में नहीं आता, उन्हें इस अधिकार से वंचित करने का कोई चिकित्सीय या नैतिक आधार नहीं है। एनएमसी ने सुझाव दिया कि नियम 7.16 को कानूनी ढांचे के साथ व्यापक दृष्टिकोण से पढ़ा जाना चाहिए।
चिकित्सा शिक्षा और पेशेवरों को विनियमित करने वाले इस निकाय ने सुप्रीम कोर्ट के अक्टूबर 2023 के फैसले का भी हवाला दिया। उस फैसले में शीर्ष अदालत ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इनकार कर दिया था, लेकिन यह जरूर कहा था कि राज्य का दायित्व है कि वह ऐसे रिश्तों को पहचाने और उन्हें जरूरी लाभ दे।
इसी फैसले के आधार पर एनएमसी ने बताया कि अगस्त 2024 की एक एडवाइजरी में क्वीर (queer) समुदाय के पार्टनर्स को राशन कार्ड के उद्देश्य से एक ही परिवार का सदस्य मानने की अनुमति दी गई है।
हलफनामे में यह भी बताया गया कि केंद्रीय वित्त मंत्रालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि क्वीर समुदाय के लोगों को जॉइंट बैंक खाता खोलने या अपने पार्टनर को नॉमिनी बनाने पर कोई पाबंदी नहीं है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी क्वीर समुदाय के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और भेदभाव को खत्म करने के कई कदम उठाए हैं। इन उपायों के तहत गंभीर रूप से बीमार मरीजों के मामले में, रिश्तेदार या परिवार के सदस्य के उपलब्ध न होने पर दोस्तों या करीबियों को देखभाल से जुड़े फैसले लेने की अनुमति दी गई है।
अब इस बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर को होगी। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ इस हलफनामे पर विस्तार से विचार करेगी।
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