
लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि अब समय आ गया है जब विभागों या मातहतों की खामियों के लिए वरिष्ठ नौकरशाहों और शीर्ष प्रशासनिक प्रमुखों को पूरी तरह से जवाबदेह ठहराया जाए। अदालत का स्पष्ट मानना है कि जरूरत पड़ने पर इन बड़े अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
हाई कोर्ट ने यूपी के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वह अदालत के इस फैसले को मुख्यमंत्री के सामने पेश करें ताकि वे इन गंभीर चिंताओं पर व्यक्तिगत रूप से विचार कर सकें।
तीन जून को दिए गए अपने अहम आदेश में जस्टिस विनोद दिवाकर की पीठ ने कहा कि राज्य को अब "सुपीरियर रिस्पॉन्सिबिलिटी" (उच्चतर जिम्मेदारी) के सिद्धांत को अपनाना ही होगा। इस सिद्धांत के तहत प्रशासनिक पदानुक्रम में बैठे वरिष्ठ अधिकारियों को उनके अधीन काम करने वालों के आचरण के लिए जिम्मेदार माना जाता है।
अदालत ने टिप्पणी की कि सार्वजनिक सेवाओं का प्रभावी वितरण सुनिश्चित करना वरिष्ठ अधिकारियों की पेशेवर और प्रशासनिक जिम्मेदारी है, इसलिए उन्हें अपने से छोटे कर्मचारियों के प्रदर्शन के लिए जवाबदेह ठहराया जाना बेहद जरूरी है।
यह पूरा मामला अवनेश कुमार अग्रवाल नामक याचिकाकर्ता से जुड़ा है। उन्होंने बरेली की एक विशेष अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) की मांग को खारिज कर दिया गया था।
याचिकाकर्ता के अनुसार, उन पर दर्ज दो आपराधिक मामलों के कारण उन्हें एनओसी देने से इनकार कर दिया गया था। इनमें से एक मामला भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम से संबंधित था, जिसकी वजह से यह पूरी कानूनी लड़ाई शुरू हुई।
इस मामले में जांच की गति प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। एक मामले की जांच लगभग दो दशकों तक लंबित रही, जबकि दूसरी एफआईआर के मामले में 18 साल की लंबी देरी के बाद साल 2024 में जाकर चार्जशीट दाखिल की गई। अधिकारियों की इसी लेटलतीफी और लापरवाही को लेकर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए गहरी चिंता व्यक्त की है।
अदालत ने सुनवाई के दौरान 'मनीष कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले में साल 2023 में दिए गए अपने एक पुराने आदेश का भी प्रमुखता से हवाला दिया। उस समय हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को सरकारी विभागों द्वारा दर्ज भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के मामलों की निगरानी के लिए एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति बनाने का निर्देश दिया था। उस फैसले में खंडपीठ ने साफ कहा था कि जांच को चरणबद्ध तरीके से और जल्द से जल्द पूरा किया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत को जब यह बताया गया कि 2023 के स्पष्ट फैसले के बावजूद समिति का गठन दिसंबर 2025 में ही हो सका, तो पीठ हैरान रह गई। यह गठन भी तब हुआ जब अदालत ने मौजूदा मामले का संज्ञान लिया।
इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि अदालती निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन में सबसे बड़ी बाधा नौकरशाही के एक विशेष वर्ग की मानसिकता है। इनका दृष्टिकोण समावेशी नहीं होता और वे अपनी विवेकाधीन शक्तियों को अपने पास बनाए रखने को ही अपना अंतिम लक्ष्य मानते हैं।
अदालत ने आगे कहा कि अपने अधिकार खोने का यही डर लोक प्रशासन में पनप रही 'लालफीताशाही' का सबसे बड़ा कारण है। पीठ ने तीन महीने पहले ही अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था और इस दौरान वह समिति के निर्णयों की प्रगति का इंतजार कर रही थी, लेकिन फैसला सुनाए जाने की तारीख तक उसे कोई भी आधिकारिक जानकारी नहीं मिली।
इस पूरी स्थिति को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए पीठ ने अतिरिक्त महाधिवक्ता को याद दिलाया कि मुख्य सचिव राज्य प्रशासन के ढांचे की अहम कड़ी हैं, इसलिए उनका प्रतिनिधित्व करने वालों को असाधारण सतर्कता बरतनी चाहिए।
अदालत ने बहुत ही साफ शब्दों में कहा कि अतिरिक्त महाधिवक्ता को यह समझना चाहिए कि मुख्य सचिव कैबिनेट और मंत्रिपरिषद के सचिव के रूप में कार्य करते हैं। वह नागरिक प्रशासन, नीति कार्यान्वयन और अंतर-विभागीय समन्वय के सभी महत्वपूर्ण मामलों पर मुख्यमंत्री व मंत्रिपरिषद के प्रमुख सलाहकार भी होते हैं। उनका पद बेहद विशेषाधिकार वाला है और वे हर मायने में राज्य प्रशासन के ढांचे की नींव का सबसे महत्वपूर्ण पत्थर हैं।
इन तमाम सख्त टिप्पणियों के साथ पीठ ने अपने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया कि वे तुरंत मुख्य सचिव को इस फैसले की एक प्रति भेजें। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति की कार्यवाही समयबद्ध और प्रभावी तरीके से पूरी हो।
अदालत ने याचिका को स्वीकार करते हुए क्षेत्रीय पासपोर्ट प्राधिकरण, बरेली को यह आदेश दिया है कि वे निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए याचिकाकर्ता के पक्ष में तत्काल पासपोर्ट जारी या नवीनीकृत करें।
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