
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए एक व्यक्ति को हिरासत में रखने पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने जांच अधिकारी (आईओ) के इस कृत्य को अधिकारों का दुरुपयोग और 'सत्ता का अहंकार' करार देते हुए, पांच दिनों तक अवैध पुलिस हिरासत में रखे गए व्यक्ति को 1.25 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने 29 अक्टूबर को यह अहम फैसला सुनाया। अदालत ने देवरिया निवासी चंदन राजभर की रिहाई के लिए ज्ञान्ती देवी और दो अन्य लोगों द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका को स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया।
हाईकोर्ट ने राजभर की अवैध हिरासत के हर एक दिन के लिए 25,000 रुपये का मुआवजा तय किया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मुआवजा पीड़ित को हर्जाने के लिए पुलिस विभाग के खिलाफ अलग से दावा पेश करने से नहीं रोकेगा। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि विभागीय जांच में जांच अधिकारी दोषी पाया जाता है, तो उसकी इस जानबूझकर की गई गलती के लिए उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
इस मामले की शुरुआत 18 जुलाई को हुई थी, जब देवरिया जिले के सलेमपुर थाने में भारतीय न्याय सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 87 के तहत एक प्राथमिकी दर्ज की गई थी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि राजभर उनकी 18 वर्षीय बेटी को भगा ले गया है। वहीं, याचिकाकर्ताओं का कहना था कि राजभर और उस लड़की ने बाद में बिहार के सीवान स्थित एक दुर्गा मंदिर में शादी कर ली थी और वे दोनों पति-पत्नी के रूप में पुणे में रह रहे थे।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, 24 और 25 अगस्त की दरम्यानी रात पुलिसकर्मी लड़की के पिता के साथ उनके पुणे स्थित आवास पर पहुंचे और दंपति को हिरासत में ले लिया। इसके बाद 27 और 28 अगस्त की दरम्यानी रात उन्हें संबंधित थाने लाया गया। राजभर का दावा था कि उसे 28 अगस्त से 2 सितंबर तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया और उसकी गिरफ्तारी का मेमो 2 सितंबर को ही तैयार किया गया।
सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने 21 अक्टूबर की एक जांच रिपोर्ट की ओर अदालत का ध्यान आकर्षित किया। यह रिपोर्ट सर्किल ऑफिसर (सीओ) राजेश चतुर्वेदी द्वारा तैयार की गई थी और देवरिया के एसपी अभिजीत आर. शंकर को भेजी गई थी। इस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया था कि जांच अधिकारी (आईओ) दीप नारायण यादव ने जानबूझकर राजभर को 28 अगस्त को हिरासत में लिया और 2 सितंबर तक अवैध रूप से बंदी बनाए रखा, जब उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दिखाई गई। इस रिपोर्ट के आधार पर देवरिया एसपी ने 21 अक्टूबर को ही आरोपी आईओ के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू कर दी थी।
अदालत ने मामले में सीओ द्वारा सच्चाई सामने लाने में दिखाई गई ईमानदारी और निष्पक्षता की जमकर सराहना की। साथ ही, एसपी द्वारा की गई त्वरित कार्रवाई की भी तारीफ की। कोर्ट ने कहा कि पुलिस की इस पूरी कवायद से यह बात साफ हो जाती है कि अवैध हिरासत को लेकर याचिकाकर्ता का दावा पूरी तरह सत्य है।
मुआवजे के दावे पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी के रवैये की कड़ी आलोचना की। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि जिस तरह से जांच अधिकारी ने बिना सोचे-समझे और तय कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना याचिकाकर्ता को पूरे पांच दिन तक हिरासत में रखा, वह सीधे तौर पर 'सत्ता के अहंकार' को दर्शाता है।
अदालत ने निर्देश दिया कि राजभर को दिया जाने वाला मुआवजा उन लोगों से वसूला जा सकता है, जो जांच के बाद उसे अवैध रूप से हिरासत में रखने के दोषी पाए जाएंगे। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार करते हुए, हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि यदि राजभर किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।
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