सिर्फ जातिसूचक शब्द कहना SC/ST Act के तहत अपराध नहीं, अपमानित करने का इरादा होना जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने के लिए केवल जातिसूचक शब्द कहना काफी नहीं है, बल्कि इसके पीछे व्यक्ति को अपमानित या नीचा दिखाने की स्पष्ट मंशा साबित होना जरूरी है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट
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उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज मुकदमों को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि केवल किसी व्यक्ति को उसकी जाति के नाम से पुकारना इस कानून के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। जब तक कि ऐसा कहने के पीछे संबंधित व्यक्ति को अपमानित या नीचा दिखाने की स्पष्ट मंशा न हो, तब तक इसे अपराध नहीं माना जा सकता।

जस्टिस संतोष राय की पीठ ने बरेली के रहने वाले वेगराज सिंह द्वारा दायर एक आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। इसके साथ ही अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के तहत 21 मार्च, 2025 को वेगराज के खिलाफ जारी किए गए समन आदेश को भी रद्द कर दिया है।

बीते 13 अगस्त को पारित किए गए अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि केवल 'चमार' शब्द का इस्तेमाल कर लेना ही अपने आप में यह साबित नहीं करता कि इसका प्रयोग पीड़िता को उसकी जाति के आधार पर अपमानित करने के इरादे से किया गया था। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे मामलों में अपराध साबित करने के लिए मंशा का होना सबसे जरूरी तत्व है।

इस पूरे कानूनी विवाद की शुरुआत साल 2024 में हुई थी। बरेली के इज्जतनगर पुलिस स्टेशन में दुष्कर्म और डराने-धमकाने के आरोप में एक एफआईआर दर्ज की गई थी। पुलिस ने अपनी गहन जांच के बाद मुख्य आरोपी हिम्मत सिंह के खिलाफ तो चार्जशीट दाखिल कर दी थी, लेकिन उसके पिता वेगराज और बड़े भाई दौलत को क्लीन चिट देते हुए उनके नाम आरोप पत्र से हटा दिए थे।

हालांकि, जब इस मामले का ट्रायल शुरू हुआ, तो पीड़िता ने अचानक यह आरोप लगाया कि आरोपियों ने उसके खिलाफ जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल किया था। पीड़िता के इस नए बयान के आधार पर निचली अदालत ने संज्ञान लेते हुए वेगराज और दौलत को भी मुकदमे का सामना करने के लिए तलब कर लिया।

निचली अदालत के इसी समन आदेश को आरोपियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। बचाव पक्ष के वकीलों ने दलील दी कि सीआरपीसी की धारा 161 और 164 के तहत दर्ज कराए गए पीड़िता के शुरुआती बयानों में कथित जातिसूचक टिप्पणियों को लेकर आरोपियों की कोई विशेष भूमिका नहीं बताई गई थी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा 'हरदीप सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब' मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले का भी हवाला दिया। अदालत ने दोहराया कि सीआरपीसी की धारा 319 के तहत अदालतों को दी गई शक्ति असाधारण है और इसका इस्तेमाल बहुत ही संयम के साथ किया जाना चाहिए। किसी को समन करने के लिए प्रथम दृष्टया मामले से कहीं अधिक मजबूत सबूतों की आवश्यकता होती है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले के अंत में सख्त लहजे में कहा कि अपीलकर्ता की संलिप्तता की ओर स्पष्ट रूप से इशारा करने वाले किसी भी विश्वसनीय और ठोस सबूत के अभाव में निचली अदालत ने यह कदम उठाया है। पीठ ने माना कि बीएनएसएस की धारा 358 के तहत उन्हें तलब करके निचली अदालत ने कानूनी भूल की है और यह समन बहुत ही लापरवाही के साथ जारी किया गया था।

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