TM special मध्य प्रदेश में पराली जलाने के मामले रिकॉर्ड स्तर पर, देश में पहले स्थान पर पहुंचा राज्य, जानिए कैसे निर्मित हुई यह स्थिति?

CREAMS और ICAR के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता, अप्रैल के 21 दिनों में ही 20 हजार से ज्यादा घटनाएं दर्ज
TM special मध्य प्रदेश में पराली जलाने के मामले रिकॉर्ड स्तर पर, देश में पहले स्थान पर पहुंचा राज्य, जानिए कैसे निर्मित हुई यह स्थिति?
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भोपाल। “हम पराली जलाना नहीं चाहते, लेकिन मजबूरी है…” विदिशा के एक किसान ने नाम न छापने की शर्त पर यह दर्द बयां करते हुए कहा कि गेहूं की कटाई के बाद खेत में बची पराली को हटाने के लिए उनके पास न तो पर्याप्त समय होता है और न ही महंगे मशीनों का खर्च उठाने की क्षमता।

उन्होंने बताया आगे की फसल की समय पर बुवाई का दबाव, संसाधनों की कमी और विकल्पों की जानकारी न होने के कारण किसान चाहकर भी पराली जलाने से बच नहीं पाते और मजबूरी में यह कदम उठाना पड़ता है। लेकिन इसका असर खेत की मिट्टी की गुणवत्ता के साथ लोगों की सेहत यानी प्रदूषण को तेजी से बढ़ा रहा है।

मध्य प्रदेश में गेहूं की कटाई के बाद पराली जलाने के मामलों में इस साल अभूतपूर्व तेजी देखने को मिल रही है। कंसोर्टियम फॉर रिसर्च ऑन एग्रोइकोसिस्टम मॉनिटरिंग एंड मॉडलिंग फ्रॉम स्पेस (CREAMS) और Indian Council of Agricultural Research (ICAR) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, राज्य देश में पराली जलाने के मामलों में पहले स्थान पर पहुंच गया है। 1 से 21 अप्रैल 2026 के बीच देश के पांच प्रमुख राज्यों में कुल 29,167 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें से लगभग 69 प्रतिशत यानी 20,164 मामले अकेले मध्य प्रदेश से सामने आए हैं। यह आंकड़ा न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह संकेत भी देता है कि आने वाले दिनों में यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है।

विदिशा और उज्जैन बने हॉटस्पॉट

राज्य के भीतर जिला स्तर पर स्थिति और अधिक गंभीर नजर आ रही है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के संसदीय क्षेत्र विदिशा में पराली जलाने की सबसे अधिक 2,086 घटनाएं दर्ज की गई हैं। इसके बाद उज्जैन में 2,053 और रायसेन में 1,982 मामले सामने आए हैं। होशंगाबाद (नर्मदापुरम) में 1,705 और सिवनी में 1,369 घटनाएं दर्ज की गईं। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि समस्या केवल सीमित क्षेत्रों तक नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर फैल चुकी है।

हालांकि, एक राहत की बात यह है कि इस साल के आंकड़े पिछले वर्ष की तुलना में थोड़े कम हैं। वर्ष 2025 में इसी अवधि के दौरान कुल 20,422 मामले दर्ज किए गए थे। बावजूद इसके, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो इस साल नए रिकॉर्ड बन सकते हैं।

उत्तर प्रदेश और हरियाणा पीछे, पंजाब में सबसे कम मामले

पराली जलाने के मामलों में मध्य प्रदेश के बाद उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है, जहां 1 से 21 अप्रैल के बीच 8,889 घटनाएं दर्ज की गईं। हालांकि यह संख्या मध्य प्रदेश की तुलना में काफी कम है। इसके बाद हरियाणा में 65 और पंजाब में मात्र 44 घटनाएं सामने आई हैं। यह अंतर साफ दर्शाता है कि मध्य प्रदेश में समस्या की तीव्रता अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक है।

कम समय और संसाधनों की कमी बनी मुख्य वजह

गंजबासौदा स्थित कृषि महाविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. आशीष श्रीवास्तव ने स्थानीय एक समाचार पत्र को बताए गए अनुसार, किसानों के पास समय की भारी कमी होती है। गेहूं की कटाई के तुरंत बाद किसान ग्रीष्मकालीन मूंग की बुवाई करना चाहते हैं, जिसके लिए खेत को जल्दी खाली करना जरूरी होता है। ऐसे में पराली जलाना उन्हें सबसे आसान और तेज विकल्प लगता है।

उन्होंने यह भी बताया कि मध्य प्रदेश में गेहूं की खेती बड़े पैमाने पर होती है, जिससे फसल अवशेष (पराली) की मात्रा भी अधिक होती है। पिछले पांच वर्षों में देश के कुल मामलों में से 50 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी अकेले मध्य प्रदेश की रही है।

वैकल्पिक उपाय मौजूद, लेकिन जागरूकता और संसाधनों की कमी

विशेषज्ञों का कहना है कि पराली जलाने के बजाय किसान कई आधुनिक कृषि यंत्रों का उपयोग कर सकते हैं, जैसे सुपरसीडर, रोटावेटर, मल्चर और रीपर। इसके अलावा, पूसा डीकंपोजर का उपयोग करके पराली को जैविक खाद में बदला जा सकता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ती है।

इसके बावजूद, इन विकल्पों का उपयोग सीमित है। मुख्य कारण है, मशीनों की उच्च लागत, जानकारी की कमी और छोटे किसानों की आर्थिक स्थिति। कई किसानों के पास इतनी बड़ी मात्रा में पराली को संभालने के लिए संसाधन उपलब्ध नहीं होते।

कानूनी प्रतिबंध के बावजूद जारी है पराली जलाना

देशभर में पराली जलाना प्रतिबंधित है और ऐसा करते पाए जाने पर प्रशासन द्वारा कार्रवाई की जाती है। नियमों के तहत किसानों पर ₹2,500 से ₹15,000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। बार-बार उल्लंघन करने पर सख्त कार्रवाई और सजा का भी प्रावधान है। इसके बावजूद, जमीनी स्तर पर इन नियमों का प्रभाव सीमित दिखाई देता है।

विदिशा के एक किसान ने नाम न छापने की शर्त पर द मूकनायक प्रतिनिधि को बताया कि गेहूं की कटाई के बाद खेत में काफी मात्रा में पराली बच जाती है। अगली फसल बोने के लिए उनके पास बहुत कम समय होता है। ऐसे में खेत को जल्दी साफ करने का सबसे आसान और सस्ता तरीका पराली जलाना ही लगता है। मजदूरी और मशीनों का खर्च भी इतना ज्यादा होता है कि छोटे किसान उसे वहन नहीं कर पाते।

किसान ने यह भी कहा कि उन्हें पराली न जलाने के विकल्पों के बारे में पूरी जानकारी नहीं है और जो मशीनें उपलब्ध हैं, वे महंगी हैं या समय पर मिल नहीं पातीं। इसलिए मजबूरी में वे पराली जलाते हैं, ताकि कम समय में खेत तैयार कर सकें और अगली फसल की बुवाई समय पर हो सके

भारतीय किसान संघ के नेता राहुल धूत ने कहा कि पराली जलाने की समस्या का समाधान केवल जुर्माना लगाने से नहीं होगा, बल्कि सरकार को जमीनी स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने होंगे। किसानों को यह समझाना जरूरी है कि पराली जलाने के क्या नुकसान हैं और इसके विकल्प क्या-क्या हैं। साथ ही, आधुनिक कृषि यंत्रों और तकनीकों तक किसानों की आसान पहुंच सुनिश्चित करनी होगी, ताकि वे व्यवहारिक रूप से इन विकल्पों को अपना सकें।

उन्होंने आगे कहा कि किसान पराली जलाना नहीं चाहता, लेकिन परिस्थितियां उसे ऐसा करने के लिए मजबूर कर देती हैं। जब समय कम होता है, संसाधन सीमित होते हैं और मशीनें या तो महंगी होती हैं या उपलब्ध नहीं होतीं, तब किसान के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता। इसलिए जरूरी है कि सरकार किसानों की इस मजबूरी को समझे और उन्हें सस्ती, सुलभ और प्रभावी समाधान उपलब्ध कराए।

पराली से बढ़ता है वायु प्रदूषण

द मूकनायक से बातचीत में पर्यावरणविद डॉ. सुभाष चन्द्र पांडेय ने कहा कि लगातार पराली जलाने से न सिर्फ वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ता है, बल्कि इसका सीधा असर कृषि भूमि की उर्वरक क्षमता पर भी पड़ता है। उन्होंने बताया कि पराली जलाने से मिट्टी के जरूरी पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, जिससे जमीन धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है और उसकी उत्पादकता घटने लगती है।

उन्होंने आगे कहा कि इस प्रक्रिया में मिट्टी के अंदर मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीव भी नष्ट हो जाते हैं, जो फसल की अच्छी पैदावार के लिए बेहद जरूरी होते हैं। इन जीवों के खत्म होने से फसल उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ता है और किसानों को लंबे समय में नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए पराली जलाने की समस्या को गंभीरता से लेते हुए इसके वैकल्पिक समाधान अपनाना बेहद जरूरी है।

पर्यावरण और स्वास्थ्य पर गंभीर असर

पराली जलाने का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह व्यापक पर्यावरणीय संकट को जन्म देता है। इससे निकलने वाला धुआं और PM2.5 कण वायु गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं, जिससे शहरों में स्मॉग की स्थिति बन जाती है। इसका सीधा असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है- सांस की बीमारियां, अस्थमा, एलर्जी और आंखों में जलन जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं।

इसके अलावा, पराली जलाने से मिट्टी के जरूरी पोषक तत्व और लाभकारी जीव नष्ट हो जाते हैं, जिससे जमीन की उर्वरता घटती है। कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य जहरीली गैसों का उत्सर्जन ग्लोबल वार्मिंग को भी तेज करता है। वहीं, धुएं के कारण सड़कों पर दृश्यता कम हो जाती है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।

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