
भोपाल। मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के सातदेव क्षेत्र में आयोजित 21 दिवसीय महायज्ञ के समापन पर जब 11 हजार लीटर दूध नर्मदा नदी में प्रवाहित किया गया, तो यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहा यह एक ऐसा दृश्य बन गया जिसने आस्था और पर्यावरण के बीच टकराव को खुलकर सामने ला दिया। ड्रोन से सामने आए वीडियो में टैंकरों के जरिए नदी में दूध बहाते दृश्य तेजी से वायरल हुए। आयोजकों ने इसे परंपरा और श्रद्धा का प्रतीक बताया, लेकिन सवाल यह उठने लगा कि क्या आधुनिक समय में इस तरह की परंपराएं पर्यावरणीय जिम्मेदारी से ऊपर हो सकती हैं?
द मूकनायक ने इस पूरे मामले की पड़ताल की जिसमें एक्सपर्ट से बातचीत के बाद यह पता लगा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो दूध कोई साधारण द्रव्य नहीं, बल्कि उच्च जैविक तत्वों (Organic Load) से भरपूर पदार्थ है। जब इतनी बड़ी मात्रा में दूध नदी में डाला जाता है, तो पानी में मौजूद घुलित ऑक्सीजन तेजी से कम होने लगती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि दूध का Biological Oxygen Demand (BOD) बहुत अधिक होता है, जिसका सीधा मतलब है कि इसे विघटित करने में पानी की ऑक्सीजन बड़ी मात्रा में खर्च होती है। इसका परिणाम यह होता है कि नदी के भीतर मौजूद जलीय जीव, विशेषकर मछलियां ऑक्सीजन की कमी से जूझने लगती हैं।
यह स्थिति किसी औद्योगिक अपशिष्ट (Industrial Waste) के नदी में मिलने जैसी ही मानी जाती है। यानी धार्मिक अनुष्ठान के नाम पर जो किया गया, उसका प्रभाव वैज्ञानिक रूप से एक प्रदूषणकारी गतिविधि के समान है।
नर्मदा नदी में बड़ी मात्रा में दूध के अभिषेक के मामले पर पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। मध्य प्रदेश के जाने-माने पर्यावरणविद और वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने द मूकनायक से बातचीत करते हुए कहा कि “इतनी बड़ी मात्रा में कार्बनिक पदार्थ यदि नदी में डाले जाते हैं, तो यह पानी में घुलित ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) के स्तर को कम कर सकते हैं। इससे नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर सीधा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि नदी का संतुलन बहुत संवेदनशील होता है और इस तरह के कृत्य जलीय जीवों के जीवन के लिए खतरा बन सकते हैं।
अजय दुबे ने आगे कहा कि नर्मदा जैसी नदियों पर आसपास के गांवों और शहरों के लोग पीने के पानी के लिए निर्भर रहते हैं। ऐसे में इस प्रकार का कार्बनिक प्रदूषण न सिर्फ मछलियों और अन्य जलीय जीवों को प्रभावित करता है, बल्कि स्थानीय समुदायों के स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि धार्मिक आस्था से जुड़े कार्यक्रमों को पूरी तरह रोकने की जरूरत नहीं है, लेकिन उन्हें प्रतीकात्मक और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार तरीके से किया जाना चाहिए, ताकि प्रकृति और आस्था के बीच संतुलन बना रहे।
वहीं पर्यावरणविद सुभाष पांडे ने भी इस मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि “करीब 11,000 लीटर दूध किसी भी जलस्रोत के लिए एक बड़े कार्बनिक प्रदूषक के रूप में काम करता है।” उन्होंने बताया कि दूध में मौजूद फैट, प्रोटीन और अन्य तत्व पानी में जाकर जैविक अपघटन (Biodegradation) की प्रक्रिया को तेज करते हैं, जिससे ऑक्सीजन की खपत बढ़ती है और जल में रहने वाले जीवों के लिए संकट खड़ा हो जाता है।
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि एक तरफ देश में ऐसे कई परिवार हैं, जहां बच्चों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पा रहा है, वहीं दूसरी ओर इतनी बड़ी मात्रा में दूध को नदी में बहाना संसाधनों की बर्बादी है। लोगों का कहना है कि अगर यही दूध जरूरतमंदों और गरीब बच्चों में वितरित किया जाता, तो यह एक बड़ा सामाजिक और मानवीय कार्य होता।
विशेषज्ञों का मानना है कि आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना समय की जरूरत है। धार्मिक आयोजनों को इस तरह से आयोजित किया जाना चाहिए, जिससे प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा हो और समाज के कमजोर वर्गों के हितों का भी ध्यान रखा जा सके।
दूध में मौजूद नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्व नदी के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ सकते हैं। ये तत्व पानी में पहुंचकर शैवाल (Algae) की अत्यधिक वृद्धि को बढ़ावा देते हैं, जिसे वैज्ञानिक भाषा में Eutrophication कहा जाता है।
इस प्रक्रिया में नदी का पानी धीरे-धीरे हरा और जहरीला हो सकता है। सूर्य की रोशनी नीचे तक नहीं पहुंचती, ऑक्सीजन और कम हो जाती है और अंततः पूरा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।
यह वही प्रक्रिया है जो अक्सर प्रदूषित झीलों और नदियों में देखी जाती है, जहां जीवन धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
दूध एक जल्दी खराब होने वाला पदार्थ है। नदी में जाने के बाद इसमें बैक्टीरिया तेजी से पनपते हैं, जिससे पानी की गुणवत्ता और गिरती है। यह केवल जलीय जीवों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए भी खतरा बन सकता है। दूषित पानी, मच्छरों और अन्य कीटों के बढ़ने का कारण बनता है, जिससे डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है।
द मूकनायक से बातचीत में भोपाल के बायोटेक्निकल एक्सपर्ट विकास पिपरिया ने सरल शब्दों में बताया कि अगर बड़ी मात्रा में दूध पानी में डाला जाता है, तो वह धीरे-धीरे खराब होकर बैक्टीरिया के लिए भोजन बन जाता है। इससे पानी की गुणवत्ता बिगड़ने लगती है।
उन्होंने कहा कि 1-2 दिन में दूध सड़ने लगता है और बैक्टीरिया तेजी से बढ़ते हैं, जिससे पानी में ऑक्सीजन कम होने लगती है। 3-5 दिन बाद मछलियाँ ऑक्सीजन की कमी के कारण सतह पर आने लगती हैं और कुछ मर भी सकती हैं, साथ ही पानी से बदबू आने लगती है। करीब एक हफ्ते में पानी पूरी तरह गंदा हो सकता है, उसमें मच्छर और कीड़े बढ़ जाते हैं और वह उपयोग के लायक नहीं रहता।
इस आयोजन का नेतृत्व संत शिवानंद महाराज ने किया, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल हुए। आयोजकों का कहना है कि यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और इसे धार्मिक आस्था के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन बदलते समय के साथ यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या ऐसी परंपराएं, जिनका सीधा असर प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ता है, उन्हें बिना पुनर्विचार के जारी रखा जाना चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि धार्मिक आस्था को बनाए रखते हुए भी पर्यावरण-अनुकूल विकल्प अपनाए जा सकते हैं, जैसे प्रतीकात्मक अभिषेक या जरूरतमंदों के बीच दूध का वितरण।
नर्मदा केवल एक नदी नहीं, बल्कि मध्य भारत की जीवनरेखा है। ऐसे में हजारों लीटर दूध का उसमें प्रवाह केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि एक ऐसा हस्तक्षेप है जो पर्यावरण, पारिस्थितिकी और सार्वजनिक स्वास्थ्य तीनों पर असर डाल सकता है।
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