MP: भोपाल में सीवेज प्रदूषण का मामला NGT पहुँचा, निजी मेडिकल कॉलेज पर गंभीर आरोप!

मामले की अगली सुनवाई अब 12 मार्च को भोपाल बेंच में होगी। याचिका में कॉलेज पर भारी पर्यावरणीय जुर्माना लगाने, समुचित एसटीपी की व्यवस्था होने तक कॉलेज के संचालन पर तत्काल रोक लगाने और खेतों तक सीवेज पहुंचाने वाली अवैध नाली को बंद कराने की मांग की गई है।
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भोपाल। राजधानी के कोलार क्षेत्र में पर्यावरण और जनस्वास्थ्य को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। यहां स्थित एक निजी डेंटल और आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज द्वारा बिना उपचार (ट्रीटमेंट) के सीवेज पानी को खुले खेतों में छोड़े जाने के आरोपों पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने संज्ञान लिया है। ग्राम हिनोतिया आलम निवासी रामलाल मीणा की याचिका पर एनजीटी की प्रिंसिपल बेंच ने मामले को सुनवाई योग्य मानते हुए इसे एनजीटी सेंट्रल जोन बेंच, भोपाल को स्थानांतरित कर दिया है। याचिका में दावा किया गया है कि इस दूषित सीवेज के कारण क्षेत्र की लगभग 20 प्रतिशत आबादी गंभीर बीमारियों के जोखिम में है।

खेतों में बहाया सीवेज का पानी

याचिकाकर्ता रामलाल मीणा के अनुसार, कोलार रोड के समीप बने निजी डेंटल व आयुर्वेदिक कॉलेज से प्रतिदिन भारी मात्रा में निकलने वाला सीवेज बिना किसी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) के सीधे खेतों में बहाया जा रहा है। यह गंदा पानी खेतों से गुजरते हुए मिलन कॉलोनी, फॉर्च्यून स्टेट कॉलोनी और कोलार के इस्कॉन मंदिर क्षेत्र तक पहुंच रहा है। याचिका में कहा गया है कि इस सीवेज से लगभग 130 एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई की जा रही है, जहां उगाई गई सब्जियां, गेहूं और चावल भोपाल के बड़े हिस्से में खपत के लिए पहुंच रहे हैं। इससे खाद्य श्रृंखला के माध्यम से व्यापक जनस्वास्थ्य संकट पैदा होने की आशंका जताई गई है।

याचिका में यह भी उल्लेख है कि कॉलेज परिसर में रहने वाले लगभग 700 छात्र-छात्राओं और स्टाफ का मलमूत्र इसी अवैध नाली के जरिए खेतों में छोड़ा जा रहा है। बिना किसी वैज्ञानिक उपचार के इस तरह का अपशिष्ट खुले में बहाए जाने से संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि लंबे समय से बदबू, मच्छरों की भरमार और गंदे पानी के कारण सामान्य जीवन प्रभावित हो रहा है, लेकिन शिकायतों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

बोरवेल प्रभावित होने का दावा

शिकायत के अनुसार, आसपास की कॉलोनियों के बोरवेल भी इस सीवेज से प्रभावित हो चुके हैं। पानी से तेज दुर्गंध आती है और पीने योग्य नहीं रहा। याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि दूषित पानी के कारण क्षेत्र में कैंसर, हैजा, टाइफाइड, मलेरिया, किडनी और लिवर संबंधी रोगों के साथ-साथ त्वचा रोगों के मामले बढ़ रहे हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि बच्चों और बुजुर्गों में बीमारियों की आशंका अधिक बनी रहती है, जिससे चिकित्सा खर्च भी बढ़ रहा है।

एनजीटी की प्रिंसिपल बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे भोपाल स्थित सेंट्रल जोन बेंच को भेजते हुए स्पष्ट किया है कि पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन यदि सिद्ध होता है तो जिम्मेदार संस्थान पर सख्त कार्रवाई की जा सकती है। ट्रिब्यूनल ने यह भी संकेत दिए हैं कि सीवेज प्रबंधन जैसे बुनियादी दायित्वों में लापरवाही को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

12 मार्च को होगी सुनवाई

मामले की अगली सुनवाई अब 12 मार्च को भोपाल बेंच में होगी। याचिका में कॉलेज पर भारी पर्यावरणीय जुर्माना लगाने, समुचित एसटीपी की व्यवस्था होने तक कॉलेज के संचालन पर तत्काल रोक लगाने और खेतों तक सीवेज पहुंचाने वाली अवैध नाली को बंद कराने की मांग की गई है। सुनवाई के दौरान संबंधित विभागों से रिपोर्ट तलब किए जाने की संभावना है। स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि ट्रिब्यूनल के हस्तक्षेप से न केवल प्रदूषण पर रोक लगेगी, बल्कि क्षेत्र में सुरक्षित पानी और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार भी सुनिश्चित हो सकेगा।

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