MP: दलित लड़की की हत्या और न्याय की अधूरी लड़ाई का दस्तावेज़, सेवाग्राम में ‘अंजना’ पुस्तक का विमोचन

द मूकनायक के उप संपादक अंकित पचौरी की दूसरी पुस्तक विमोचित
कुल 16 अध्यायों में लेखक ने अंजना अहिरवार और उसके परिवार के संघर्ष, पीड़ा और न्याय की तलाश को विस्तार से दर्ज किया है।
कुल 16 अध्यायों में लेखक ने अंजना अहिरवार और उसके परिवार के संघर्ष, पीड़ा और न्याय की तलाश को विस्तार से दर्ज किया है।ग्राफिक- आसिफ निसार
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नई दिल्ली। पत्रकार और द मूकनायक के उप संपादक अंकित पचौरी की दूसरी पुस्तक 'अंजना' का विमोचन रविवार को सेवाग्राम में आयोजित विकास संवाद के मैत्री मेला में किया गया। इस अवसर पर पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, अधिवक्ता और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर काम कर रहे कई लोग मौजूद रहे।

‘अंजना’ एक ऐसी किताब है, जो सिर्फ़ एक घटना का वर्णन नहीं करती, बल्कि उस सामाजिक संरचना पर सवाल खड़े करती है, जिसमें जन्म के साथ ही इंसान की हैसियत तय कर दी जाती है। पुस्तक मध्यप्रदेश के सागर ज़िले के छोटे से गाँव बरोदिया नोनागिर में घटे दलित हत्याकांड की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। कुल 16 अध्यायों में लेखक ने अंजना अहिरवार और उसके परिवार के संघर्ष, पीड़ा और न्याय की तलाश को विस्तार से दर्ज किया है।

अंकित पचौरी ने बताया कि बरोदिया नोनागिर बाहर से एक आम भारतीय गाँव जैसा दिखता है, मिट्टी की सोंधी गंध, सूखते तालाब, बारिश की राह ताकती फसलें, गलियों में खेलते बच्चे और चौपाल पर बैठे बुज़ुर्ग। लेकिन इसी सामान्य-से दिखने वाले गाँव के भीतर एक ऐसा ज़ख्म है, जो आज भी हरा है। यह ज़ख्म है दलित परिवार की लड़की अंजना अहिरवार की अधूरी कहानी का- महज़ 24 साल की उम्र में छिन गया वह जीवन, जिसने बचपन से ही अपमान, अन्याय और भेदभाव को झेला।

पुस्तक का कवर पेज
पुस्तक का कवर पेज

पुस्तक में क्या?

160 पन्नों की किताब बताती है कि अंजना की मौत सिर्फ़ एक बेटी का अंत नहीं थी, बल्कि उस सपने का भी अंत थी, जो उसने अपने परिवार के लिए देखा था। लेखक उन काँपते हाथों और पथराई आँखों की दास्तान सामने रखते हैं, जो पुलिस-प्रशासन और अदालतों के चक्कर लगाते रहे, लेकिन न्याय की राह लगातार कठिन होती गई।

‘अंजना’ के पन्ने पाठक को उन गलियों तक ले जाते हैं, जहाँ न्याय का सूरज कभी नहीं उगा, उन चौपालों तक, जहाँ अपराध के बाद भी सन्नाटा पसरा रहा और उन अदालतों तक, जहाँ तारीख़ों के बोझ तले सच्चाई दबती चली गई। यह पुस्तक भारतीय संविधान के मूल्यों- बराबरी, स्वतंत्रता और गरिमा, पर भी सवाल उठाती है।

लेखक इस पुस्तक के ज़रिए सत्ता और समाज- दोनों से सीधे सवाल करते हैं। यह किताब केवल दर्द की कहानी नहीं, बल्कि एक दस्तावेज़ है- उस गाँव का, उस परिवार का और उस लोकतंत्र का, जहाँ आज़ादी और बराबरी के सपनों के बीच अब भी गहरा सन्नाटा पसरा है।

कौन हैं अंकित पचौरी?

अंकित पचौरी मध्य प्रदेश के पत्रकार और लेखक हैं। वे हिंदी समाचार पोर्टल द मूकनायक में उप-संपादक के रूप में कार्यरत हैं और लंबे समय से दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्गों, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर ग्राउंड रिपोर्टिंग और लेखन करते आ रहे हैं। उनकी पत्रकारिता सत्ता और समाज के हाशिये पर खड़े लोगों की आवाज़ को केंद्र में लाने पर केंद्रित रही है। अंकित पचौरी ने पुस्तक लेखन के माध्यम से भी सामाजिक यथार्थ और संघर्षों को दर्ज किया है, उनकी पहली पुस्तक 'आदिवासी रिपोर्टिंग' थी, जिसकी काफी सराहना की गई।

कुल 16 अध्यायों में लेखक ने अंजना अहिरवार और उसके परिवार के संघर्ष, पीड़ा और न्याय की तलाश को विस्तार से दर्ज किया है।
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कुल 16 अध्यायों में लेखक ने अंजना अहिरवार और उसके परिवार के संघर्ष, पीड़ा और न्याय की तलाश को विस्तार से दर्ज किया है।
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