
नई दिल्ली- देश की शिक्षा व्यवस्था और न्यायपालिका के बीच गुरूवार को एक अभूतपूर्व टकराव देखने को मिला जब सुप्रीम कोर्ट ने NCERT की कक्षा 8 की नई सामाजिक विज्ञान की किताब 'Exploring Society: India and Beyond, Vol II' पर तत्काल प्रभाव से पूर्ण प्रतिबंध (Blanket Ban) लगा दिया।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में बेहद सख्त रुख अपनाते हुए अध्याय 4, "The Role of Judiciary in our Society" (पृष्ठ 125-142) में शामिल सामग्री पर गहरी आपत्ति जताई है, जिसमें न्यायपालिका के भीतर "भ्रष्टाचार" और "प्रणालीगत खामियों" (Corruption in the Judiciary) को प्रमुखता से दर्शाया गया था। बेंच ने कहा कि हालांकि यह पब्लिकेशन हमारे समाज में ज्यूडिशियरी की भूमिका पर एक पूरा चैप्टर डालता है, लेकिन यह सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट के शानदार इतिहास और डेमोक्रेटिक ताने-बाने को बनाए रखने में इंस्टीट्यूशन की भूमिका को नज़रअंदाज़ कर देता है।
अदालत ने इस सामग्री को देखने के बाद तीखी टिप्पणी करते हुए इसे एक "गहरी साजिश" और "सोचा-समझा कदम" (Calculated Move) करार दिया, जिसका उद्देश्य स्कूली बच्चों के मन में देश की न्यायिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करना है। कोर्ट की नाराजगी इस कदर थी कि उसने न केवल किताब के वितरण पर रोक लगाई, बल्कि NCERT के निदेशक और शिक्षा मंत्रालय के सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी कर यह पूछा है कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।
NCERT की एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड (क्लास 8, वॉल्यूम 2)' में 'हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका' चैप्टर के हिस्से के तौर पर 'न्यायपालिका में भ्रष्टाचार' पर एक सेक्शन है। इस मुद्दे का ज़िक्र सबसे पहले सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने बुधवार को किया था, जब कोर्ट ने बताया कि उसने पहले ही इस मुद्दे पर संज्ञान ले लिया है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए NCERT ने तुरंत अपनी गलती स्वीकार करते हुए एक आधिकारिक माफीनामा जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि यह "निर्णय की एक अनजाने में हुई चूक" (Error of Judgement) थी और संस्था न्यायपालिका को संविधान के रक्षक के रूप में सर्वोच्च सम्मान देती है। शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग ने भी इस पर संज्ञान लेते हुए किताब के वितरण को "सख्त होल्ड" पर रख दिया है और NCERT ने स्पष्ट किया है कि अब इस अध्याय को उचित अधिकारियों और कानूनी विशेषज्ञों की सलाह से पूरी तरह दोबारा लिखा जाएगा।
गुरूवार को मामले में सुनवाई हुई, सुप्रीम कोर्ट केवल माफी से संतुष्ट नहीं दिखा और उसने उन सभी सदस्यों के विवरण मांगे हैं जिन्होंने इस पाठ्यक्रम को तैयार किया और मंजूरी दी थी। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी संवैधानिक संस्था की गरिमा के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि किताब में शब्दों और बातों का चुनाव कोई मूल गलती नहीं लगती। सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि उसके द्वारा शुरू की गई कार्रवाई न्यायपालिका की सही आलोचना को दबाने के लिए नहीं है, बल्कि शिक्षा की अखंडता बनाए रखने के लिए है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग और NCERT के डायरेक्टर डॉ. दिनेश प्रसाद सकलानी को कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट्स एक्ट के तहत नोटिस जारी किया और उनसे पूछा कि उनके या गलत चैप्टर के पीछे जो लोग हैं, उनके खिलाफ सही एक्शन क्यों न लिया जाए।
खास तौर पर, कोर्ट ने NCERT और केंद्र और राज्य शिक्षा विभागों को यह भी आदेश दिया कि वे यह पक्का करें कि किताब की सभी कॉपी, चाहे वह हार्ड कॉपी हो या डिजिटल, पब्लिक एक्सेस से हटा दी जाएं।
कोर्ट ने आदेश दिया, "NCERT को यूनियन और स्टेट एजुकेशन डिपार्टमेंट के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया जाता है कि किताब की सभी कॉपी, हार्ड कॉपी या सॉफ्ट कॉपी, चाहे वे रिटेल दुकानों या स्कूलों में हों, पब्लिक एक्सेस से हटा दी जाएं। सभी फिजिकल और डिजिटल प्लेटफॉर्म से तुरंत हटा दी जानी चाहिए। एक कम्प्लायंस रिपोर्ट फाइल की जानी चाहिए। NCERT के डायरेक्टर की यह ज़िम्मेदारी होगी कि वे ऐसे स्कूलों के कैंपस में भेजी गई सभी किताबों को तुरंत ज़ब्त करें और एक कम्प्लायंस रिपोर्ट जमा करें। हम निर्देश देते हैं कि सब्जेक्ट बुक की फिजिकल या डिजिटल कॉपी के आधार पर कोई इंस्ट्रक्शन न दिया जाए। सभी राज्यों के डिपार्टमेंट ऑफ़ एजुकेशन के प्रिंसिपल सेक्रेटरी को निर्देश दिया जाता है कि वे यहां जारी निर्देशों का पालन करें और 2 हफ़्ते के अंदर कम्प्लायंस रिपोर्ट जमा करें।"
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