
नई दिल्ली: बेंगलुरु में इन दिनों अवैध प्रवासियों की पहचान के लिए 'ऑपरेशन मुक्ता' नामक एक अभियान चलाया जा रहा है। इस सख्त कदम ने इलेक्ट्रॉनिक्स सिटी के हुलीमंगला इलाके में रहने वाले पश्चिम बंगाल के लगभग 400 प्रवासी मजदूरों की रातों की नींद उड़ा दी है।
दरअसल, पुलिस ने इस इलाके के मकान मालिकों को हाल ही में कारण बताओ नोटिस जारी किए हैं। यह कार्रवाई कथित तौर पर बिना अनुमति के चल रहे कचरा पृथक्करण (गारबेज सेग्रीगेशन) केंद्रों को लेकर की गई है।
प्रशासन ने स्वास्थ्य और स्वच्छता संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए मकान मालिकों से जवाब तलब किया है। आरोप है कि ये इकाइयां बिना किसी वैध अनुमति के संचालित की जा रही थीं। इस स्थिति ने मजदूरों को गहरे तनाव में डाल दिया है, जिन्हें डर है कि उन्हें जल्द ही अपना आशियाना खाली करने के लिए मजबूर किया जाएगा।
कूड़ा बीनने और उसे अलग करने का काम करने वाले एक मजदूर अलाउद्दीन ने अपनी पीड़ा व्यक्त की। उनका कहना है कि वे पिछले 11 सालों से ठेकेदारों के अधीन इस शहर में काम कर रहे हैं और अब पुलिस हर दिन आकर उनसे जगह खाली करने को कहती है।
अलाउद्दीन ने चिंता जताते हुए कहा कि अब उनके पास जाने के लिए कोई और जगह नहीं है। उन्होंने अपनी जीवन भर की जमापूंजी लगाकर ये कच्ची झोपड़ियां और घर बनाए थे, जो अब छिनने की कगार पर हैं।
हुलीमंगला का यह इलाका सिर्फ कचरा बीनने वालों का ही ठिकाना नहीं है। यहां निर्माण कार्य में लगे मजदूर, दिहाड़ी कामगार, घरेलू सहायक और सुरक्षा गार्ड भी अपने परिवारों के साथ रहते हैं। कार्यस्थल के करीब और काफी सस्ता होने की वजह से ज्यादातर प्रवासी कामगार इन्हीं बस्तियों पर निर्भर हैं।
एक अन्य मजदूर ने अपनी पहचान को लेकर होने वाली रोजमर्रा की परेशानी साझा की। उनका कहना है कि वैध सरकारी दस्तावेज होने के बावजूद उन्हें बार-बार अपनी नागरिकता साबित करनी पड़ती है।
मजदूर ने स्पष्ट किया कि वे हमेशा अपना आईडी कार्ड साथ रखते हैं, लेकिन बंगाली भाषा बोलने के कारण कई स्थानीय लोग उन्हें बांग्लादेशी समझ लेते हैं। उन्होंने कहा कि सारे भारतीय कागजात होने के बाद भी उन्हें बेवजह शक की नजर से देखा जाता है और निशाना बनाया जाता है।
इन प्रवासी मजदूरों के लिए यह खौफ कोई नया नहीं है। मजदूर जबीर शेख ने बताया कि करीब चार साल पहले भी ठीक ऐसी ही स्थिति पैदा हुई थी। उस वक्त भी पुलिस ने उन्हें बेदखल करने की कोशिश की थी, लेकिन तब राज्य मानवाधिकार आयोग के दखल के बाद उन्हें बड़ी राहत मिल गई थी।
सभी प्रवासी मजदूरों ने एक सुर में कहा है कि वे किसी भी गैरकानूनी गतिविधि में शामिल नहीं हैं। उन्होंने प्रशासन से अपील की है कि सालों से बेंगलुरु के विकास में योगदान दे रहे असली भारतीय मजदूरों और अवैध घुसपैठियों के बीच का फर्क समझा जाए।
दूसरी तरफ, इलेक्ट्रॉनिक्स सिटी के डीसीपी एम. नारायण ने मजदूरों को जबरन निकाले जाने के दावों को पूरी तरह खारिज किया है। उन्होंने साफ किया कि पुलिस की यह कार्रवाई इलाके में सक्रिय अवैध कचरा माफियाओं के खिलाफ है और किसी को भी जबरन बेदखल नहीं किया जा रहा है।
डीसीपी ने बताया कि पुलिस ने ऐसे अवैध केंद्रों की पहचान कर नियमानुसार नोटिस भेजे हैं, क्योंकि इन इकाइयों के पास ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (GBA) या किसी भी अन्य सक्षम अधिकारी की अनुमति नहीं थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रशासन को अब इन नोटिसों के जवाब का इंतजार है, जिसके आधार पर ही आगे की कानूनी कार्रवाई तय की जाएगी।
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