पीजी नीट -40 कटऑफ विवाद: वरिष्ठ IRS अधिकारी ने कहा- ‘फर्जी नैरेटिव', SC/ST/OBC स्टूडेंट्स को बदनाम और आरक्षण को कमजोर करने की साजिश’

सच्चाई यह है कि टॉप 100 में आरक्षित वर्ग के छात्रों का दबदबा और प्रतिस्पर्धी ब्रांचों में कर रहे उत्कृष्ट प्रदर्शन
कम क्वालीफाइंग कटऑफ केवल कुछ विशेष परिस्थितियों तक सीमित है और एससी, एसटी तथा ओबीसी छात्रों के वास्तविक प्रदर्शन या चयन को प्रतिबिंबित नहीं करता।  यह केवल बायोकेमिस्ट्री जैसे गैर-क्लिनिकल कोर्सों पर लागू होता है, जहां आवेदकों की रुचि बेहद कम है। इन विषयों में सीटें अक्सर खाली रह जाती हैं क्योंकि मांग नहीं होती, जिससे निजी मेडिकल कॉलेज कम कटऑफ के लिए दबाव बनाते हैं ताकि पूरी फीस वसूल सकें।
कम क्वालीफाइंग कटऑफ केवल कुछ विशेष परिस्थितियों तक सीमित है और एससी, एसटी तथा ओबीसी छात्रों के वास्तविक प्रदर्शन या चयन को प्रतिबिंबित नहीं करता। यह केवल बायोकेमिस्ट्री जैसे गैर-क्लिनिकल कोर्सों पर लागू होता है, जहां आवेदकों की रुचि बेहद कम है। इन विषयों में सीटें अक्सर खाली रह जाती हैं क्योंकि मांग नहीं होती, जिससे निजी मेडिकल कॉलेज कम कटऑफ के लिए दबाव बनाते हैं ताकि पूरी फीस वसूल सकें।
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नई दिल्ली- वरिष्ठ भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) अधिकारी नेत्रपाल ने नीट पीजी 2025 परीक्षा में आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के लिए -40 अंकों के कटऑफ को लेकर फैल रहे दावों को 'फर्जी नैरेटिव' करार दिया है। सोशल मीडिया पर एक विस्तृत विश्लेषण पोस्ट करते हुए उन्होंने कहा कि यह भ्रामक सूचना देश के कई प्रमुख राजनेताओं, मीडिया संस्थानों और अखबारों द्वारा फैलाई जा रही है।

उनका तर्क है कि यह कम क्वालीफाइंग कटऑफ केवल कुछ विशेष परिस्थितियों तक सीमित है और एससी, एसटी तथा ओबीसी छात्रों के वास्तविक प्रदर्शन या चयन को प्रतिबिंबित नहीं करता। उलटे, रैंक के आंकड़े बताते हैं कि ये उम्मीदवार उच्चतम स्तर पर मजबूत प्रदर्शन कर रहे हैं और अत्यधिक मांग वाली क्लिनिकल ब्रांचों में प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।

शिवसेना सांसद की पोस्ट से शुरू हुई बहस

नीट पीजी 2025 कटऑफ विवाद की शुरुआत शिवसेना (यूबीटी) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी की एक सोशल मीडिया पोस्ट से हुई, जिसमें उन्होंने आरक्षित वर्गों (एससी, एसटी, ओबीसी) के लिए -40 अंकों के क्वालीफाइंग कटऑफ का जिक्र करते हुए एक प्रमुख अखबार की कटिंग शेयर की थी। 14 जनवरी को पोस्ट होते ही यह वायरल हो गई, क्योंकि हजारों यूजर्स ने इसे तेजी से शेयर किया, इसे 'मेरिट की मौत' बताते हुए आरक्षण व्यवस्था पर हमला बोला। लेकिन जल्द ही यह एक फर्जी नैरेटिव में बदल गया, जब बिना संदर्भ के इसे पूरे चयन प्रक्रिया पर थोप दिया गया, जबकि वास्तव में यह सिर्फ कम डिमांड वाले गैर-क्लिनिकल कोर्सेज (जैसे बायोकेमिस्ट्री) के लिए था। इसने मेहनती आरक्षित छात्रों की उपलब्धियों को नजरअंदाज कर समाज में विभाजन पैदा कर दिया, जिसका जवाब सीनियर आईआरएस अधिकारी नेथरपाल जैसे विशेषज्ञों ने डेटा से दिया।

नेत्रपाल बताते हैं कि यह विवाद राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) द्वारा घोषित संशोधित क्वालीफाइंग प्रतिशतक से उपजा है, जहां आरक्षित वर्गों के लिए थ्रेशोल्ड शून्यवाँ प्रतिशतक तक गिर गया, जो लगभग -40 अंकों के बराबर है। वे स्पष्ट करते हैं कि यह आंकड़ा भ्रामक है, क्योंकि यह केवल बायोकेमिस्ट्री जैसे गैर-क्लिनिकल कोर्सों पर लागू होता है, जहां आवेदकों की रुचि बेहद कम है। इन विषयों में सीटें अक्सर खाली रह जाती हैं क्योंकि मांग नहीं होती, जिससे निजी मेडिकल कॉलेज कम कटऑफ के लिए दबाव बनाते हैं ताकि पूरी फीस वसूल सकें। नेत्रपाल बताते हैं, "नेगेटिव कटऑफ का खेल गैर-क्लिनिकल कोर्सों के लिए है, जहां कोई मांग नहीं है और कोई बायोकेमिस्ट्री जैसे कोर्स में दाखिला नहीं लेना चाहता।" उन्होंने जोर देकर कहा कि इसका यह मतलब नहीं कि आरक्षित छात्रों को प्रमुख सीटें कम अंकों से मिल रही हैं; बल्कि प्रतिस्पर्धी क्षेत्रों में वास्तविक अलोटमेंट एक अलग ही कहानी बयां करते हैं।

रैंक सूची का गहन विश्लेषण करते हुए नेत्रपाल ने आरक्षित उम्मीदवारों के उच्च स्तर पर मजबूत प्रदर्शन को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, "सच्चाई यह है कि टॉप 100 में आरक्षित समुदायों के कई टॉपर्स हैं।" ये छात्र ढीले मानकों पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि उच्च अंकों से अपनी जगह बना रहे हैं। उदाहरण के लिए, मद्रास मेडिकल कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में रेडियोलॉजी और जनरल मेडिसिन जैसी लोकप्रिय विशेषज्ञताओं में आरक्षित उम्मीदवार सामान्य श्रेणी की सीटें हासिल कर रहे हैं। इसका अर्थ है कि वे बिना आरक्षण के लाभ के , सामान्य वर्ग के साथियों से बेहतर या बराबर प्रदर्शन कर रहे हैं। काउंसलिंग के आंकड़ों से पता चलता है कि इन ब्रांचों में नकारात्मक अंकों से कोई चयन नहीं हुआ; बल्कि क्लोजिंग रैंक सभी श्रेणियों में 500-700 अंकों के दायरे में हैं।

मद्रास मेडिकल कॉलेज में,  एससी/एसटी/ओबीसी उम्मीदवार ओपन सीटों में दिखाई देते हैं, जो दर्शाता है कि उनके अंक कई अनारक्षित आवेदकों से ऊपर हैं। यह पैटर्न टॉप कॉलेजों में बना रहता है, जहां आरक्षित स्टूडेंट्स  न सिर्फ क्वालीफाई कर रहे हैं बल्कि नेतृत्व कर रहे हैं।
मद्रास मेडिकल कॉलेज में, एससी/एसटी/ओबीसी उम्मीदवार ओपन सीटों में दिखाई देते हैं, जो दर्शाता है कि उनके अंक कई अनारक्षित आवेदकों से ऊपर हैं। यह पैटर्न टॉप कॉलेजों में बना रहता है, जहां आरक्षित स्टूडेंट्स न सिर्फ क्वालीफाई कर रहे हैं बल्कि नेतृत्व कर रहे हैं।

निजी कॉलेजों का दबाव और आरक्षित छात्रों की वास्तविक योग्यता

नेत्रपाल ने मीडिया और राजनीतिक हस्तियों पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि वे संदर्भ के बिना -40 के आंकड़े को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर समाज में विभाजन फैला रहे हैं। उन्होंने इनसे अपनी रिपोर्ट्स वापस लेने की मांग की है और तर्क दिया है कि ऐसी कवरेज झूठ फैलाती है तथा जनता का विश्वास तोड़ती है। नेत्रपाल ने लिखा, "कई प्रमुख राजनेताओं, मीडिया संस्थानों और अखबारों ने इस मुद्दे को बिना संदर्भ के उछाला है।"

उन्होंने उदाहरण दिया कि पिछले चक्रों में 440 अंक वाले उम्मीदवारों को भी सरकारी सीटें नहीं मिल पाई थीं। एक प्रतिक्रिया में उन्होंने आलोचकों से सवाल किया, "अगर गैर-क्लिनिकल कोर्सों में सामान्य श्रेणी का कटऑफ -10 हो और आरक्षित श्रेणी का -20 हो, तो क्या आप इसे स्वीकार करेंगे? क्या यह योग्यता का संकेत देता है?" इससे उन्होंने चुनिंदा आक्रोश को उजागर किया है, जो निजी सीटों की अधिकता जैसी प्रणालीगत समस्याओं के समाधान के लिए नहीं बल्कि आरक्षण को बदनाम करने के लिए लक्षित है।

उन्होंने विशेष रूप से बहुजन मीडिया आउटलेट्स से आग्रह किया है कि वे अपने विश्लेषण के मुख्य बिंदुओं जैसे टॉप-100 में आरक्षित टॉपर्स और क्लिनिकल ब्रांचों में सामान्य श्रेणी में योग्यता से सीटें जीतना आदि का इस्तेमाल कर गलत सूचना का मुकाबला करें। उन्होंने कहा, "बहुजन मीडिया इसे व्यापक रूप से साझा करे और प्रकाशित प्रमुख आंकड़ों का उपयोग कर समाचार बनाए तथा ऐसी सभी खबरों का जवाब दे।" उनका उद्देश्य वंचित पृष्ठभूमि के मेहनती छात्रों का मनोबल बनाए रखना है और यह याद दिलाना है कि "सभी सामान्य श्रेणी के छात्र 99 प्रतिशताइल वाले नहीं होते और सभी एससी-एसटी-ओबीसी छात्र शून्य प्रतिशताइल वाले नहीं होते।"

एम्स दिल्ली में सामान्य वर्ग में अंतिम रैंक 48 थी, ओबीसी में 207 और एससी में 644 थी। पिछले वर्षों के एक विश्लेषण से पता चला कि एम्स में एससी वर्ग की अंतिम रैंक में अंकों का अंतर मात्र 2% और ओबीसी वर्ग में 0.4% था। आमतौर पर सभी शीर्ष संस्थान उच्च अंकों वाले आरक्षित उम्मीदवारों में से सर्वश्रेष्ठ को ही प्रवेश देते हैं।
एम्स दिल्ली में सामान्य वर्ग में अंतिम रैंक 48 थी, ओबीसी में 207 और एससी में 644 थी। पिछले वर्षों के एक विश्लेषण से पता चला कि एम्स में एससी वर्ग की अंतिम रैंक में अंकों का अंतर मात्र 2% और ओबीसी वर्ग में 0.4% था। आमतौर पर सभी शीर्ष संस्थान उच्च अंकों वाले आरक्षित उम्मीदवारों में से सर्वश्रेष्ठ को ही प्रवेश देते हैं। नेत्रपाल

नेत्रपाल के आधिकारिक रैंक आंकड़ों का विश्लेषण -40 के मिथक को और तोड़ता है। हालांकि अवांछित गैर-क्लिनिकल क्षेत्रों के लिए क्वालीफाइंग सीमा कम की जा सकती है ताकि रिक्तियां न रहें, लेकिन क्लिनिकल सीटों के लिए योग्यता का स्तर मुश्किल बना हुआ है। नेत्रपाल कहते हैं कि आरक्षित छात्र रेडियोलॉजी जैसी ब्रांचों में सामान्य श्रेणी के आवंटन में प्रवेश पा रहे हैं, जहां सटीकता और प्रतिस्पर्धा अत्यधिक है। मद्रास मेडिकल कॉलेज में, उदाहरण के लिए, एससी/एसटी/ओबीसी उम्मीदवार सामान्य श्रेणी की सीटों में दिखाई देते हैं, जो दर्शाता है कि उनके अंक कई अनारक्षित आवेदकों से ऊपर हैं। यह पैटर्न शीर्ष कॉलेजों में बना हुआ है, जहां आरक्षित श्रेणी के उत्कृष्ट छात्र न केवल योग्यता प्राप्त कर रहे हैं बल्कि अग्रणी स्थान भी हासिल कर रहे हैं।

Summary

नेत्रपाल -40 के नेरेटिव को एक सोची-समझी रणनीति मानते हैं, क्योंकि यह खाली पड़े गैर-क्लिनिकल सीटों के लिए एक तकनीकी योग्यता मानदंड को अलग करके पेश करता है और फिर उसे सभी आरक्षित उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने के लिए इस्तेमाल करता है। यह उनकी टॉप-100 रैंक और क्लिनिकल क्षेत्रों में सामान्य श्रेणी में योग्यता से सीटें हासिल करने जैसी उपलब्धियों को नजरअंदाज करता है। इससे अक्षमता की एक झूठी तस्वीर पेश होती है, जिसका उद्देश्य आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करना है। नेत्रपाल ने अपनी पोस्ट में इंगित किया, "यह फर्जी नैरेटिव झूठ फैलाकर गरिमा को ठेस पहुंचाता है और पुराने पदानुक्रम को बनाए रखता है।"

कम क्वालीफाइंग कटऑफ केवल कुछ विशेष परिस्थितियों तक सीमित है और एससी, एसटी तथा ओबीसी छात्रों के वास्तविक प्रदर्शन या चयन को प्रतिबिंबित नहीं करता।  यह केवल बायोकेमिस्ट्री जैसे गैर-क्लिनिकल कोर्सों पर लागू होता है, जहां आवेदकों की रुचि बेहद कम है। इन विषयों में सीटें अक्सर खाली रह जाती हैं क्योंकि मांग नहीं होती, जिससे निजी मेडिकल कॉलेज कम कटऑफ के लिए दबाव बनाते हैं ताकि पूरी फीस वसूल सकें।
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कम क्वालीफाइंग कटऑफ केवल कुछ विशेष परिस्थितियों तक सीमित है और एससी, एसटी तथा ओबीसी छात्रों के वास्तविक प्रदर्शन या चयन को प्रतिबिंबित नहीं करता।  यह केवल बायोकेमिस्ट्री जैसे गैर-क्लिनिकल कोर्सों पर लागू होता है, जहां आवेदकों की रुचि बेहद कम है। इन विषयों में सीटें अक्सर खाली रह जाती हैं क्योंकि मांग नहीं होती, जिससे निजी मेडिकल कॉलेज कम कटऑफ के लिए दबाव बनाते हैं ताकि पूरी फीस वसूल सकें।
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