प्रयागराज: गुरुवार को घोषित हुए उत्तर प्रदेश बोर्ड के इंटरमीडिएट परीक्षा परिणामों में प्रयागराज के होनहारों ने अपनी सफलता का डंका बजाया है। शहर की हरि नगर मलिन बस्ती और चुंगी परेड इलाके के पांच छात्रों ने अपनी कड़ी मेहनत से प्रथम श्रेणी (फर्स्ट डिवीजन) हासिल की है। इनकी यह शानदार कामयाबी दृढ़ निश्चय की एक अनोखी मिसाल बन गई है।
इन होनहारों में चार छात्र और एक छात्रा शामिल हैं। ये सभी ऐसे परिवारों से ताल्लुक रखते हैं, जहां गरीबी, अस्थिर आय और रहने की कठिन परिस्थितियां रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। इसके बावजूद, उनकी इस बड़ी सफलता ने न केवल उनके परिवारों में खुशियां भर दी हैं, बल्कि मलिन बस्तियों के अन्य परिवारों में भी शिक्षा के प्रति एक नई उम्मीद जगाई है।
बोर्ड परीक्षा में अमित ने 73 प्रतिशत अंक हासिल किए हैं, जबकि नाजो ने 70 प्रतिशत अंक प्राप्त कर अपनी प्रतिभा साबित की है। वहीं, दीपक विश्वकर्मा ने 67 फीसदी, दीपक कोरी ने 65 फीसदी और रितिक ने 61 प्रतिशत अंकों के साथ सफलता का परचम लहराया है।
इन बच्चों की सफलता की कहानियां सालों के संघर्ष से बुनी गई हैं। अमित के पिता एक दिहाड़ी मजदूर हैं और उनकी मां दूसरों के घरों में साफ-सफाई का काम करके परिवार का पेट पालती हैं। भारी आर्थिक तंगी के बीच भी अमित ने अपनी पढ़ाई जारी रखी और अब वह सूचना प्रौद्योगिकी (इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) में डिप्लोमा करने का सपना देख रहे हैं।
ऑटोरिक्शा चालक की बेटी नाजो 70 प्रतिशत अंक हासिल करके अपने इलाके की लड़कियों के लिए गर्व का विषय बन गई हैं। वह भविष्य में एक नर्स बनकर स्वास्थ्य सेवाओं के जरिए लोगों की मदद करना चाहती हैं।
65 प्रतिशत अंक पाने वाले दीपक कोरी पहले एक होटल में वेटर का काम करते थे। उनकी मां घरों में काम करती हैं, जबकि उनके पिता बीमार रहते हैं और नशे की लत के कारण घर तक ही सीमित हैं।
67 प्रतिशत अंक लाने वाले दीपक विश्वकर्मा की पारिवारिक स्थिति भी कुछ ऐसी ही है, जहां उनकी मां घरेलू कामकाज करके घर चलाती हैं।
दूसरी ओर, रितिक के परिवार ने बेहद कठिन दौर का सामना किया है। उनके पिता ठेले पर सब्जियां बेचते हैं, लेकिन परिवार की कमाई अक्सर नशे की भेंट चढ़ जाती है, जिससे उनकी आर्थिक हालत और भी खराब रहती है।
इन विषम परिस्थितियों के बावजूद इन छात्रों ने अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी। कभी उन्होंने सब्जी के ठेले के पास बैठकर अपने पाठ याद किए, तो कभी बिना बिजली वाली झोपड़ियों में मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ाई की। कई दिन ऐसे भी आए जब उन्हें भूखे पेट सोना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी स्कूल जाने का हौसला नहीं हारा।
इन बच्चों के इस संघर्षपूर्ण सफर में 'शुरुआत: एक ज्योति शिक्षा की' नामक संस्था ने बहुत बड़ा योगदान दिया है। यह संस्था प्रयागराज में मलिन बस्तियों के बच्चों के लिए करीब एक दशक से काम कर रही है। लगभग 10 साल पहले, इस संस्था ने इन बच्चों का विभिन्न स्कूलों में दाखिला करवाया था और धीरे-धीरे उनकी पूरी शिक्षा की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली।
संस्था से जुड़े शिक्षकों ने इन छात्रों को मुख्य विषयों की मुफ्त कोचिंग दी और बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी के लिए रोजाना कई घंटे कड़ी मेहनत की। बच्चों को स्वतंत्र सिंह ने गणित, विकास कुमार ने भौतिक विज्ञान (फिजिक्स), रूबी ने रसायन विज्ञान (केमिस्ट्री) और अनुश्री घोष व केपी सिंह ने अंग्रेजी पढ़ाई।
संस्था के संस्थापक अभिषेक शुक्ला के अनुसार, इस प्रयास की शुरुआत मलिन बस्तियों के झिझकने वाले परिवारों को अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए राजी करने से हुई थी। इनमें से ज्यादातर परिवार अपनी रोजी-रोटी के लिए दिहाड़ी मजदूरी, ठेका मजदूरी, कूड़ा बीनने, घरेलू काम और रेहड़ी-पटरी लगाने पर निर्भर थे।
शुक्ला ने बताया कि करीब 10 साल पहले उन्होंने इन बच्चों का नाम अलग-अलग स्कूलों में लिखवाया था और उन्हें सही शिक्षा दिलाने का जिम्मा उठाया था। उन्होंने यह भी बताया कि संस्था के शिक्षक रोजाना छह से आठ घंटे तक कक्षाएं चलाते थे और उनकी इसी निरंतर मेहनत का नतीजा आज सबके सामने है।
इन पांचों छात्रों की यह उपलब्धि अब केवल एक व्यक्तिगत मील का पत्थर नहीं रह गई है। जिन इलाकों में बच्चे अक्सर काम करने के लिए बीच में ही स्कूल छोड़ देते हैं, वहां इनकी सफलता ने एक सशक्त उदाहरण पेश किया है कि शिक्षा ही अभावों के अंधकार से बाहर निकलने का सबसे सही रास्ता है।
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