
भोपाल। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU) में 18 से 20 अगस्त तक आयोजित हो रहे नवागत विद्यार्थियों के प्रबोधन कार्यक्रम "अभ्युदय-2026" की वक्ता सूची ने सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। तीन दिनों के इस बड़े आयोजन में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, लेखक एवं अभिनेता पीयूष मिश्रा, राज्यसभा सदस्य रजनीश अग्रवाल समेत विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े कई नामचीन वक्ताओं को मंच दिया गया है, लेकिन कार्यक्रम की जारी सूची में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग से एक भी वक्ता का स्पष्ट प्रतिनिधित्व नजर नहीं आता। सवाल यह है कि समाज के इन बड़े वर्गों से क्या विश्वविद्यालय को एक भी ऐसा पत्रकार, शिक्षाविद, लेखक या विशेषज्ञ नहीं मिला, जिसे विद्यार्थियों के सामने अपनी बात रखने के लिए आमंत्रित किया जा सके?
यह स्थिति इसलिए भी ज्यादा चुभती है क्योंकि बात किसी निजी आयोजन की नहीं, बल्कि पत्रकारिता और संचार की शिक्षा देने वाले एक विश्वविद्यालय के मंच की है। जिस संस्थान से निकलने वाले विद्यार्थी समाज की हर आवाज को खबर और विमर्श में जगह देने की जिम्मेदारी संभालेंगे, उसी संस्थान के बड़े कार्यक्रम में यदि दलित और आदिवासी समाज की आवाज दिखाई ही न दे तो प्रतिनिधित्व की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है। कार्यक्रम में वक्ताओं की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन सामाजिक विविधता के लिहाज से तस्वीर बेहद एकतरफा नजर आती है। संविधान सामाजिक न्याय और समान अवसर की बात करता है, ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं कि मंच पर कौन मौजूद है, बल्कि यह भी है कि इस मंच से किन आवाजों को जगह नहीं मिली।
इसी को लेकर मध्य प्रदेश कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने विश्वविद्यालय प्रबंधन और कार्यक्रम की आयोजन समिति पर तीखा हमला बोला है। अहिरवार ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय का पूरा वातावरण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा से प्रभावित नजर आता है और इसी मानसिकता के कारण कार्यक्रम में सामाजिक न्याय तथा समान प्रतिनिधित्व की भावना दिखाई नहीं दे रही है।
प्रदीप अहिरवार ने कहा कि “पूरा विश्वविद्यालय RSS की मानसिकता से घिरा हुआ है। इसी कारण इस कार्यक्रम की सूची को देखने पर सामाजिक न्याय और किसी भी तरह का व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व दिखाई नहीं देता। इतने बड़े पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग का एक भी वक्ता नहीं होना बेहद निंदनीय है।”
कांग्रेस नेता ने कहा कि माखनलाल विश्वविद्यालय केवल एक सामान्य शैक्षणिक संस्थान नहीं है, बल्कि पत्रकारिता और संचार के क्षेत्र में देशभर में अपनी पहचान रखने वाला विश्वविद्यालय है। यहां से विद्यार्थी पत्रकारिता और मीडिया के क्षेत्र में जाते हैं। ऐसे संस्थान के कार्यक्रमों में समाज के सभी वर्गों की भागीदारी दिखाई देना जरूरी है।
अहिरवार के मुताबिक, “अगर पत्रकारिता जैसे बड़े संस्थान और विश्वविद्यालय के मंच पर ही सामाजिक न्याय और समान अवसर दिखाई नहीं देगा तो निश्चित तौर पर सवाल उठेंगे। सवाल यह है कि समाज के जिन वर्गों की आबादी मध्य प्रदेश में बड़ी है, उन्हें इस तरह के मंचों पर प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिया जा रहा है?”
उन्होंने कहा कि कार्यक्रम में बड़ी संख्या में वक्ताओं को बुलाया गया है। अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों को विद्यार्थियों के साथ संवाद के लिए आमंत्रित किया गया है, लेकिन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग से किसी वक्ता का नाम सामने नहीं आना विश्वविद्यालय की चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करता है।
प्रदीप अहिरवार ने कहा कि यह सवाल किसी व्यक्ति की योग्यता पर नहीं बल्कि वक्ताओं के चयन की प्रक्रिया पर है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में दलित और आदिवासी समाज से बड़ी संख्या में पत्रकार, लेखक, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ हैं।
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, “क्या विश्वविद्यालय को अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला, जिसे विद्यार्थियों के सामने बोलने के लिए बुलाया जा सके? अगर इतने बड़े कार्यक्रम में दर्जनों वक्ताओं का चयन हो सकता है तो फिर इन वर्गों से एक-दो वक्ताओं को मंच देने में क्या परेशानी थी?”
अहिरवार ने कहा कि विश्वविद्यालय प्रबंधन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कार्यक्रम के लिए वक्ताओं के चयन का आधार क्या था और क्या चयन समिति ने सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर कोई चर्चा की थी।
कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि सामाजिक न्याय केवल संविधान की किताबों या राजनीतिक भाषणों में चर्चा करने का विषय नहीं है, बल्कि इसे संस्थानों की कार्यप्रणाली में भी दिखाई देना चाहिए।
उन्होंने कहा, “सामाजिक न्याय की बात करना अलग बात है और उसे संस्थानों में लागू करना अलग बात है। जब किसी सार्वजनिक विश्वविद्यालय में इतने बड़े कार्यक्रम का आयोजन होता है तो वहां समाज के हर वर्ग की भागीदारी दिखाई देनी चाहिए। दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों को भी यह महसूस होना चाहिए कि उनके समाज से आने वाले लोग विश्वविद्यालय के मंच पर मौजूद हैं।”
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता का काम समाज के हर वर्ग की आवाज को सामने लाना है। ऐसे में पत्रकारिता की शिक्षा देने वाले संस्थान को अपने स्तर पर भी सामाजिक विविधता का उदाहरण पेश करना चाहिए।
प्रदीप अहिरवार ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के सामाजिक न्याय के मुद्दे का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी लगातार जातिगत जनगणना और समाज के सभी वर्गों को उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिए जाने की मांग करते रहे हैं।
अहिरवार ने कहा, “हमारे नेता राहुल गांधी लगातार सामाजिक न्याय की बात करते रहे हैं। देश में कोई कुछ भी कर ले, जातिगत जनगणना होकर रहेगी। समाज में जिसकी जितनी संख्या है, उसके अनुपात में उसे अवसर और प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। यही सामाजिक न्याय की मूल भावना है।”
उन्होंने कहा कि सत्ता और संस्थानों में भागीदारी केवल कुछ चुनिंदा सामाजिक समूहों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। देश की आबादी में अलग-अलग समुदायों की हिस्सेदारी के आधार पर अवसरों और प्रतिनिधित्व की व्यवस्था मजबूत की जानी चाहिए।
अहिरवार ने कहा कि कांग्रेस सामाजिक न्याय और समान अवसर के मुद्दे को लगातार उठाती रही है। उन्होंने कहा कि “जिसकी जितनी संख्या है, उसके अनुसार उसे प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। यह किसी पर एहसान नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में समान भागीदारी का सवाल है।”
उन्होंने कहा कि आने वाले समय में सामाजिक न्याय की लड़ाई और मजबूत होगी और जातिगत जनगणना के आंकड़ों के आधार पर प्रतिनिधित्व की बहस को आगे बढ़ाया जाएगा।
विश्वविद्यालय की ओर से जारी कार्यक्रम के अनुसार तीन दिनों में कई सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। 18 अगस्त को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मुख्य अतिथि के रूप में कार्यक्रम में शामिल होंगे। इसी दिन विशेष संवाद में पीयूष मिश्रा विद्यार्थियों से संवाद करेंगे। 19 अगस्त को विभिन्न सत्रों में पत्रकारिता, साहित्य और अन्य क्षेत्रों से जुड़े कई वक्ताओं को आमंत्रित किया गया है। 20 अगस्त को कार्यक्रम के अंतिम दिन भी अलग-अलग सत्रों में वक्ताओं की मौजूदगी रहेगी और समापन सत्र में राज्यसभा सदस्य रजनीश अग्रवाल मुख्य अतिथि होंगे।
कार्यक्रम की सूची में बड़ी संख्या में वक्ताओं के नाम होने के बावजूद SC और ST वर्ग से किसी वक्ता का स्पष्ट प्रतिनिधित्व नहीं दिखाई देना अब चर्चा का विषय बन गया है।
हालांकि यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी व्यक्ति की जाति केवल उसके नाम या उपनाम के आधार पर तय नहीं की जा सकती। इसलिए कार्यक्रम में शामिल प्रत्येक वक्ता की सामाजिक पृष्ठभूमि के संबंध में अनुमान लगाना उचित नहीं होगा। लेकिन विश्वविद्यालय की जारी सूची में वक्ताओं की सामाजिक पृष्ठभूमि का कोई उल्लेख नहीं है और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग का स्पष्ट प्रतिनिधित्व नजर नहीं आता, सवाल इसी बिंदु पर है।
विश्वविद्यालय को देना चाहिए जवाब
प्रदीप अहिरवार ने कहा कि विश्वविद्यालय प्रबंधन को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि कार्यक्रम में सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई गई।
उन्होंने कहा, “यह सवाल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं है। सवाल पूरी व्यवस्था से है। अगर विश्वविद्यालय सामाजिक न्याय की बात करता है तो उसके कार्यक्रमों में भी सामाजिक न्याय दिखाई देना चाहिए। विश्वविद्यालय प्रबंधन को बताना चाहिए कि इतने बड़े आयोजन में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग से किसी वक्ता को क्यों नहीं बुलाया गया।”
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के विद्यार्थियों को समाज की विविधता को समझना जरूरी है और इसके लिए अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों को सुनना आवश्यक है।
मध्य प्रदेश की सामाजिक संरचना को देखें तो 2011 के जनगणना के अनुसार अनुसूचित जनजाति (ST) की आबादी करीब 21.1% और अनुसूचित जाति (SC) की करीब 15.6% है, यानी दोनों वर्ग मिलकर राज्य की लगभग 36.7% आबादी हैं।
इसके बावजूद ‘अभ्युदय-2026’ की जारी वक्ता सूची में SC-ST वर्ग का स्पष्ट प्रतिनिधित्व नजर नहीं आना सवाल खड़े करता है। इतनी बड़ी आबादी के बावजूद मंच पर इन वर्गों की आवाज क्यों नहीं? यही सवाल इस आयोजन की सामाजिक प्रतिनिधित्व की तस्वीर पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के इस कार्यक्रम को लेकर उठे सवाल अब केवल वक्ताओं की सूची तक सीमित नहीं हैं। मामला सामाजिक प्रतिनिधित्व, विश्वविद्यालय की चयन प्रक्रिया और संस्थान के सार्वजनिक मंचों पर संविधान की समानता एवं सामाजिक न्याय की भावना के पालन से जुड़ गया है।
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